श्री शशांक शेखर शुल्ब ( ज्योतिर्विद )-
✓•भूमिका: भारतीय ज्योतिष का सम्पूर्ण ढाँचा ‘नवग्रह’ के सिद्धांत पर आधारित है। यद्यपि आधुनिक खगोलशास्त्र अनेक ग्रहों की खोज को प्रमाणित करता है, परन्तु वैदिक-ज्योतिष की ग्रह-व्यवस्था खगोलीय-भौतिक ग्रहों की संख्या पर नहीं, बल्कि काल-नियमन, कर्म-फल-वितरण, तथा ज्योतिषीय प्रभावों के गणितीय-आध्यात्मिक तंत्र पर आधारित है। अतः यह शोधप्रबंध नवग्रह की मूल अवधारणा, उनके चयन के आधार, तथा आधुनिक दूरस्थ ग्रहों को जोड़ने की आवश्यकता अथवा अनावश्यकता का शास्त्रीय एवं तर्कसंगत विवेचन प्रस्तुत करता है।
✓•१. नवग्रह की मूल अवधारणा:
भारतीय ज्योतिष में 'नवग्रह' शब्द का अर्थ केवल नौ दृश्यमान ग्रहों से नहीं, बल्कि नौ प्रकार के काल-बल एवं कर्म-शक्ति से है। ये हैं—
१. सूर्य, २. चन्द्र, ३. मङ्गल, ४. बुद्ध, ५. गुरू, ६. शुक्र, ७. शनि, ८. राहु, ९. केतु।
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✓•१.१ शास्त्रीय प्रमाण:
बृहत्पाराशर होराशास्त्र (अध्याय २):
“ग्रहास्तु नव प्रोक्ता नक्षत्राणां पतयस्तथा।”
अर्थात—'जो नौ ग्रह हैं, वे ही नक्षत्रों के अधिपति तथा फलदायक शक्तियाँ हैं।'
सूर्यसिद्धान्त (१.५८–६०):
यह ग्रन्थ सूर्य, चन्द्र तथा पंचतारा-ग्रहों (मंगल–शनि) की गति को ‘काल-निर्णायक’ बताता है। राहु–केतु को ग्रहण-कारक मानकर ग्रह-तंत्र में सम्मिलित किया गया।
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✓•१.२ ‘ग्रह’ का अर्थ:
संस्कृत में ‘ग्रह’ का अर्थ है—“गृहीतुम् शक्तः” अर्थात—जो जीव के कर्मफल को ग्रहण कर के उसे भोग के रूप में प्रदान करे।
अतः ‘ग्रह’ का पारिभाषिक अर्थ आकाशीय पिंड नहीं, बल्कि कर्म-फल का नियामक तत्त्व है।
✓•१.३ नवग्रह-तंत्र की संरचना:
नवग्रह किसी यांत्रिक-खगोलीय प्रणाली का ही परिणाम नहीं है; यह एक ऋषि-दृष्ट कार्य-कारण तंत्र है।
इन नौ ग्रहों द्वारा संचालित घटक:
* जीवन का नव-वर्गीय मॉडल (नवभाव),
* नवधा धातु/रस,
* नवद्वार–देह-योजना,
* नवरस,
* नवचित्त-स्थिति।
स्पष्ट है कि यह संरचना पूर्ण है और स्वयं में बंद तंत्र (closed system) है।
✓•२. नवग्रह केवल ‘दृश्यता’ पर आधारित नहीं हैं:
अनेक विचारक यह मानते हैं कि चूँकि भारतीय ज्योतिष केवल नंगी आँख से दृश्य ग्रहों को स्वीकार करता था, अतः यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो को इसलिए नहीं जोड़ा गया। यह कथन आंशिक है।
✓•२.१ वैदिक खगोलशास्त्र का मानदण्ड:
वैदिक ज्योतिष ग्रहों का चयन इन आधारों पर करता है—
•(क) पृथ्वी पर दीर्घकालिक और प्रत्यक्ष गुरुत्वीय तथा दैहिक प्रभाव।
•(ख) मनोवैज्ञानिक तथा चित्त-गतिक प्रभाव।
•(ग) सप्तचक्र, नाड़ी एवं प्राण में स्पन्दन।
•(घ) काल-चक्र में योगदान (दिन–रात्रि, पक्ष–मास, वर्ष)।
•(ङ) ग्रहण-व्यवस्था में भूमिका (राहु–केतु)।
इन मानदण्डों के आधार पर केवल वही खगोलीय बिन्दु ग्रह कहलाते हैं जो—
•(१) पृथ्वी के ‘सौर-काल-चक्र’ में प्रत्यक्ष भूमिका निभाते हैं।
•(२) प्राचीन ऋषियों द्वारा ‘कर्म-फल-वितरण’ के तत्त्व के रूप में अनुभवित हुए हैं।
✓•२.२ दीर्घकालिक दृष्टि:
* यूरेनस की परिक्रमा अवधि: ८४ वर्ष
* नेपच्यून की: १६५ वर्ष
* प्लूटो की: २४८ वर्ष
इनकी अत्यधिक दीर्घ कक्षाएँ मानव-व्यक्तिगत स्तर पर सूक्ष्म, लगभग नगण्य प्रभाव देती हैं।
ज्योतिष का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत कर्मफल का प्रादुर्भाव देखना है, न कि सहस्राब्दियों के सामूहिक-युगीय परिवर्तनों को।
✓•३. राहु–केतु को ग्रह क्यों माना गया?
आधुनिक विज्ञान के अनुसार राहु–केतु भौतिक ग्रह नहीं, बल्कि छाया-बिन्दु (Nodes) हैं।
परंतु भारतीय ज्योतिष में इन्हें ग्रह इस कारण माना गया कि—
•(१) ये ग्रहण-कारक हैं; सूर्य–चन्द्र पर सीधा प्रभाव डालते हैं।
•(२) मानव-मस्तिष्क एवं चित्त पर ‘अचेतन-ऊर्जा’ का केन्द्रीय प्रभाव।
•(३) नाड़ियों में प्राण-संचार के राहु (प्रवृत्ति)–केतु (निवृत्ति) रूपी दो मूल प्रवाह।
शास्त्रीय प्रमाण:
बृहत्पाराशर होराशास्त्र:
“राहुकेतू तमो ग्रहौ।”
दोनों को ‘तमोगुण से युक्त ग्रह’ कहा है।
अतः ज्योतिष में ग्रहत्व ‘भौतिकता’ पर नहीं, ‘प्रभाव' पर आधारित है।
इससे स्पष्ट है कि ग्रहत्व में ‘भौतिक अस्तित्व’ अनिवार्य नहीं।
✓•४. क्या नए ग्रहों को नवग्रह में जोड़ा जाना चाहिए?
यह प्रश्न आधुनिक ज्योतिषीय विमर्श का महत्वपूर्ण विषय है।
✓•४.१ पाराशरी प्रणाली का ढाँचा पूर्ण है:
बृहत्पाराशर होराशास्त्र का नवग्रह–मॉडल एक संपूर्ण तंत्र है जिसमें—
* नवभाव,
* नक्षत्राधिपति,
* दशा-प्रणाली (विंशोत्तरी),
* दिशाबल, कालबल,
* षड्बल,
* तत्वाधार (पंचमहाभूत)
—सभी नवग्रहों पर आधारित हैं।
यदि आधुनिक ग्रहों को जोड़ा जाए तो—
•(१) दशा-प्रणाली का गणित टूट जाएगा।
•(२) भाव–ग्रह सम्बन्धों का संतुलन बिगड़ जाएगा।
•(३) पंचतत्वीय सम्बन्ध असंगत हो जाएँगे।
•(४) नाड़ी-ज्योतिष की प्रणालियाँ चलना असम्भव हो जाएँगी।
✓•४.२ नए ग्रहों की ज्योतिषीय भूमिका – आधुनिक मत:
कुछ आधुनिक ज्योतिषी यूरेनस (हरनु), नेपच्यून (वरुण), प्लूटो (यम) को निम्नलिखित विषयों से जोड़ते हैं—
* यूरेनस – आकस्मिक घटनाएँ, क्रांति
* नेपच्यून – भ्रम, अध्यात्म
* प्लूटो – परिवर्तन, मृत्यु
किन्तु इन प्रभावों को भारतीय ज्योतिष पहले से ही दे चुका है—
* शनि – आकस्मिक कष्ट, बाधा, क्रांति
* राहु – भ्रम, अनिश्चितता, मायावी तत्त्व
* केतु – मृत्यु, मोक्ष, अनास्था
अतः नए ग्रह प्रभाव-सिद्ध दृष्टिकोण से ‘अतिरिक्त’ नहीं।
✓•४.३ नाड़ी–ज्योतिष में ग्रहत्व:
तमिल नाड़ी ज्योतिष, केरल के प्रणव-ज्योतिष तथा पराशरी परम्परा—सभी नौ ग्रहों पर आधारित हैं।
सूक्ष्मतम फलादेश इन्हीं से होते हैं।
यदि अतिरिक्त ग्रह जोड़े जाएँ तो नाड़ी-पद्धति अप्रयुक्त हो जाएगी।
✓•५. ऋषियों की दृष्टि: नवग्रह एक आध्यात्मिक–गणितीय तंत्र
ग्रहों का चयन ऋषि-दृष्टि द्वारा हुआ। यह दृष्टि—
•(क) मनोवैज्ञानिक,
•(ख) प्राण-ऊर्जा,
•(ग) चित्त-तरंग,
•(घ) कर्म-उद्गम
इन सभी श्रेणियों को समेटकर देखती है।
✓√५.१ नवग्रह और प्राण–तत्व:
* सूर्य – प्राण
* चन्द्र – मन
* मंगल – वीर्य
* बुध – बुद्धि
* गुरु – जीव
* शुक्र – शरीर-सुख
* शनि – आयु, कर्म
* राहु – प्रवृत्ति
* केतु – निवृत्ति
नए ग्रह प्राण-तंत्र के किसी मूल-तत्व का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
✓•५.२ नवग्रह का गणितीय औचित्य:
नवग्रह प्रणाली पर आधारित है—
* नवांश
* नवदृष्टि (दृष्टि-सिद्धांत)
* नवदशा—विंशोत्तरी (१२० वर्ष = १२×१०)
* नवग्रह-वार
यदि (१०वाँ, ११वाँ, १२वाँ) ग्रह जोड़ें तो संपूर्ण भारतीय गणितीय ढांचा परिवर्तित करना पड़ेगा।
✓•६. आधुनिक ग्रहों का उपयोग – एक वैकल्पिक मत:
यद्यपि शास्त्र पाराशरी में इनका उल्लेख नहीं है, किन्तु कुछ आधुनिक विद्वान इन्हें निम्न कारणों से उपयोगी मानते हैं—
•(१) विश्व-राजनीति, जन-आन्दोलन, वैश्विक क्रांति, महामारियों की भविष्यवाणी में अतिरिक्त संकेत।
•(२) दीर्घकालीन ‘सामूहिक-चक्र’ (collective cycles) की व्याख्या।
•(३) मनोवैज्ञानिक ज्योतिष (depth psychology) में सूक्ष्म संकेत।
किन्तु ये सभी क्षेत्र ‘व्यक्तिगत फलादेश’ के बजाय ‘समाज-चक्र’ से सम्बन्धित हैं।
भारतीय ज्योतिष मूलतः व्यक्तिगत कर्मफल को प्रकट करता है।
✓•७. शास्त्रीय निर्णय – नए ग्रह आवश्यक नहीं:
सभी शास्त्रीय ग्रंथ निम्न प्रकार निष्कर्ष देते हैं:
✓•७.१ सूर्य सिद्धान्त:
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि – सप्तग्रह
राहु–केतु – छाया ग्रह
कुल: नवग्रह
✓•७.२ पराशरी सिद्धांत:
* विन्शोत्तरी दशा केवल नवग्रहों पर आधारित है।
* दृष्टि, अंश, गुण, तत्व और बल – सभी ९ ग्रहों से।
* 'नवग्रह' के अतिरिक्त किसी ग्रह का एक भी श्लोक में उल्लेख नहीं।
✓•७.३ जातक–पारिजात:
नवग्रह को ही फल-नियामक बताया है।
✓•७.४ बृहत् जत्रिका, सारावली, फलदीपिका:
सभी ग्रन्थों ने केवल नवग्रहों के आधार पर ही जातक-विज्ञान को व्यवस्थित किया।
✓•८. निष्कर्ष:
वैदिक-ज्योतिष का नवग्रह-तंत्र दृश्य ग्रहों की संख्या पर आधारित नहीं, बल्कि निम्न तत्त्वों के एकीकृत ढाँचे पर आधारित है—
•(१) कर्म-फल-वितरण का नौ ऊर्जा-बिंदुओं वाला मॉडल
•(२) प्राण, मन, बुद्धि, जीव और शरीर के नौ मूलतत्त्व
•(३) ज्योतिषीय गणित (दशा, दृष्टि, नवांश, बल)
•(४) ग्रहण-व्यवस्था (राहु–केतु)
(५) नाड़ी-ज्योतिष की अंतःसंरचना
आधुनिक ग्रह—यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो—
* वैदिक गणितीय प्रणाली में तर्कसंगत रूप से सामंजस्य नहीं बैठाते,
* मानव-व्यक्तिगत फलादेश में निर्णायक प्रभाव नहीं देते,
* पराशरी तंत्र में वर्णित नाहीं,
* नवग्रह की आध्यात्मिक एवं प्राण-मूलक संरचना से मेल नहीं खाते।
अतः शास्त्रीय दृष्टि से नवग्रह में नए ग्रह जोड़ना न केवल अनावश्यक है, बल्कि विद्यमान भारतीय ज्योतिषीय तंत्र का संतुलन भी बिगाड़ सकता है।
यदि आधुनिक ग्रहों का उपयोग किया भी जाए तो वह—
सामूहिक-स्तर की भविष्यवाणी में सहायक हो सकता है,
परन्तु पाराशरी, नाड़ी, ताजिक, जायमिनी, प्राच्य-ज्योतिष—सभी में नवग्रह-तंत्र ही सर्वोपरि एवं पर्याप्त है।
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