श्रीहनुमदवतार सेवा, चरित्र और प्रेम का आदर्श

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  • 30 March 2026
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(श्रीविष्णुदत्तरामचन्द्रनी दुबे)-


श्रीहनुमान्जी रुद्रावतार हैं। गोस्वामी जी ने दोहावली (दोहा १४२) में लिखा है-

जेहि सरीर रत्ति राम साँ सोढ़ आदरहिं सुजान। रुद्रदेह तजि नेहबस बानर थे हनुमान ॥

अर्थात् चतुर लोग उसी शरीर का आदर करते हैं, जिस शरीर से श्रीरामजी में प्रेम होता है। इस प्रेम के कारण ही श्रीशंकरजी अपने रुद्रदेह को त्यागकर वानररूप हनुमान् बन गये।

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चैत्र शुक्ल १५, मंगलवार शुभ मुहूर्त में भगवान् शिव अपने अंश ग्यारहवें रुद्र से माता अञ्जनी के गर्भ से पवनपुत्र हनुमान्‌ के रूप में इस धरा पर अवतरित हुए। अञ्जनी केसरी नामक वानर की पत्नी थीं। कुछ लोग इनका प्राकट्यकाल कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी और कुछ चैत्र शुक्ल पूर्णिमा मानते हैं। कल्पभेद से एवं भक्त की भावना से सब सत्य है।

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श्रीहनुमान्‌जी नवधा भक्ति में दास्यभक्ति के आचार्य माने जाते हैं। स्वामी की आज्ञा का पालन कर उन्हें सुख पहुँचाना सेवक का परम धर्म है। उसी के आदर्श हैं श्रीहनुमान्‌जी। कहते हैं साधना के द्वारा सभी सिद्धियाँ इनके वश में है तथा ये 'अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता' भी हैं। ये ज्ञानियों में अग्रगण्य तथा चारों वेदों के ज्ञाता है।

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हनुमान्जीको माता परम तपस्विनी सद्‌गुणों से युक्त एवं सदाचारिणी थीं। दिन में वे पूजन के पश्चात् एवं रात्रि में शयन के पूर्व हनुमान्जी को पुराणों की कथाएँ एवं महापुरुषों के चरित्र सुनातीं और बार-बार बालक हनुमान्जी  से पूछर्ती। रामकथा सुनते-सुनते हनुमान्जी भावविभोर हो जाते और उनके नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगती। प्रभु श्रीराम का ध्यान करने के लिये वे कभी अरण्य, पर्वत की गुफा, नदी तट पर चले जाते। ये बचपन में ही सूर्य को निगल गये 'बाल समय रवि भक्षि लियो।'

हनुमान्जी  के गुणों के सम्बन्ध में श्रीराम महर्षि अगस्त्यजी से कहते हैं-

शौर्य दाध्ये बले पर्यं प्राज्ञता नवसाधनम्।
विक्रमश्च  प्रभावश्च हनूमति कृतालयाः ॥

(वा०रा० ७।३५१३)

शूरता, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम तथा प्रभुत्व-इन सभी सद्‌गुणों ने श्रीहनुमान्‌जी के भीतर घर कर रखा है।

इसी का समर्थन करते हुए महर्षि अगस्त्य कहते हैं-

संसार में ऐसा कौन है जो पराक्रम, उत्साह, बुद्धि, प्रताप, सुशीलता, मधुरता, नीति-अनीति के विवेक, गम्भीरता, चतुरता, उत्तम बल और धैर्य में हनुमान्‌जी से बढ़कर हो? युद्धभूमि में जब रामानुज लक्ष्मण को अमोघ शक्ति लगी तब हनुमान्‌जी लंका से सुषेण वैद्य को उनके भवनसहित ले आये, पुनः उनकी आज्ञा से द्रोणपर्वत के सहित सञ्जीवनी बूटी ले आये जिसे सुधाने से लक्ष्मणजी को मूर्च्छा दूर हुई। यह हनुमान्जी के अतुलित बल का द्योतक है।

रावण के कहने से अहिरावण श्रीराम-लक्ष्मण को लेकर देवी के सम्मुख बलि चढ़ाने के लिये पाताललोक चला गया, जब यह बात हनुमान्‌जी को ज्ञात हुई, वे उसी क्षण पाताल में पहुँचे और अहिरावण का वध कर राम-लक्ष्मण को लेकर वानर-भालुओं की सभा के बीच उपस्थित हो गये। यह हनुमान्‌जी का अपने स्वामी के प्रति अनन्य प्रेम एवं कर्तव्यनिष्ठा थी।

समुद्र पारकर जब हनुमान्‌जी ने लङ्कामें प्रवेश किया, उस समय अतिलघुरूप धारण कर अशोक वाटिका में अशोकवृक्ष के पत्तोंमें छिपकर जगज्जननी सीताजी के दर्शन किये और अपने इष्ट श्रीराम का सारा वृत्तान्त सुनाकर मुद्रिका उन्हें दी। सीताजी ने भक्त प्रवर हनुमान्‌जी को अजर-अमर, गुणनिधान होने तथा प्रभु को प्रसन्नताप्राप्ति के अनेक आशीर्वाद दिये। तत्पश्चात् बृहदाकार रूप धारण कर उन्होंने सारी सोने की लङ्का जलाकर भस्म कर दी, किंतु विभीषण के भवन एवं सौताजी पर आँच तक नहीं आयी।

उन्होंने भगवान् श्रीराम एवं सुग्रीव को प्रत्येक आज्ञा का पालन किया। श्रीराम की सेवा में प्रधानरूप से सहायता की और अनेक राक्षसों का संहार किया।

श्रीराम के अभिषेक के लिये ये चारों समुद्रों और पाँच सौ नदियों से जल ले आये थे। शक्ति का धोतक है।

लंका के राजमहल में मौ सीता का अनुसन्धान करते हुए हनुमान्‌जी को अनेक सुषत स्त्रियों  को देखना पड़ा , किंतु उनके मन में किसी भी प्रकार का विकार नहीं आया।

एक समय की बात है-माता जानकी जी ने उपहाररूप में बहुमूल्य मणियों को एक माला हनुमान्‌जी को दी। उसमें प्रभु राम कौ मूर्ति दिखायी न देने से उन्होंने सब मणियों को फोड़ दिया, इस पर विभीषणजी ने पूछा-क्या आपकी विशाल काया में भी प्रभु को झाँकीके दर्शन होते हैं? तत्क्षण पवनपुत्र हनुमान्जी ने अपने तीक्ष्ण नखों से वक्षः स्थल को विदीर्ण कर वहाँ विराजित सीता-राम की मूर्ति के दर्शन सबको करा दिये। उनके रोम-रोम से 'राम' नाम की ध्वनि हो रही थी। भगवान् राम ने उनको हृदय से लगा लिया और भगवान्‌ के कर स्पर्श से उनका शरीर पूर्ववत् हो गया। हनुमान्‌जी  प्रभुके अन्तरङ्ग पार्षद हैं।

जहाँ श्रीरघुनाथजी की कथा होती है, वहाँ वे तत्क्षण उपस्थित हो जाते हैं। जीवमात्र को प्रभु के पादपयों में पहुंचाकर उनका कल्याण करने के लिये वे आतुर रहते हैं। हनुमान्जी के वीर और दास दोनों रूपों की उपासना होती है, विपत्तिनिवारणार्थ वीर रूप की और सुख शान्ति प्राप्त्यर्थ दासरूप की। उनकी उपासना से सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। वे दुःखी आतंकी पुकार सुनकर उसका दुःख दूर कर देते
है। ने चाहते हैं कि प्राणी आधि-व्याधि, दुःख-आदि से मुक्ति प्राप्तकर प्रभु के चरणकमलों का चञ्चरीक बने। अपने आराध्य श्रीरघुनाथजी की विशुद्ध प्रीति, उनके मङ्गलमय नामों का कीर्तन और उनकी लीला  का श्रवण- इसके अतिरिक्त इन्हें दूसरा कुछ अभीष्ट नहीं। श्रीहनुमान्‌जी का निश्चित सिद्धान्त है कि जीव चाहे बैठा हो, खड़ा हो, लेटा हो जिस किसी भी दशा में हो, श्रीराम नाम का स्मरण करके वह भगवान्‌ के परमपद को प्राप्त हो जाता है। राम-नाम की महिमा देखिये-

सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥ आत्मकल्याण के लिये, प्रभुप्रासि के लिये जो उनका आश्रय ग्रहण करते हैं, उन्हें उनकी कृपा से अपने अभीष्ट की यथाशीघ्र प्राप्ति हो जाती है। उनके हृदय में भगवान् श्रीराम नित्य रमणशील है। रामायणपाठ, सुन्दरकाण्डपाठ, हनुमान चालीसा-पाठसे हनुमान्‌जी प्रसन्न रहते हैं। हनुमान्‌जी सदाचार, धर्मपालन, ब्रह्मचर्यपालन, संतसेवा, भक्त भगवान्‌के प्रति श्रद्धा-विश्वास और प्रीतिसे प्रसन्न होकर उनपर कृपा करते हैं।

श्रीरामजी के द्वारपर श्रीहनुमान्‌जी सतत विराजमान रहते हैं और बिना उनकी आज्ञा के कोई रामजी की ड्योढ़ी में प्रवेश नहीं कर सकता, अतः प्रभु श्रीराम के दर्शनाभिलाषी को सर्वप्रथम श्रीहनुमान्‌जी की कृपा प्राप्त करना आवश्यक है। 'राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥' इसी प्रकार सीतामाता की कृपा के बिना श्रीरामरूप का दर्शन होना सम्भव नहीं। अतः श्रीरामजी के साक्षात्कार करने के लिये माँ जानकी  एवं श्रीहनुमान्‌जी को उपासना सोपानस्वरूप है।

श्रीहनुमान्‌जी श्रीरामजी के अङ्ग बतलाये गये हैं। इसलिये हनुमान्‌जी की पूजा किये बिना श्रीरामजी की पूजा पूर्ण फलदायी नहीं होती।

आज के समय में बालब्रह्मचारी श्रीहनुमान्‌जी को उपासना परमावश्यक है; क्योंकि उनके चरित्र से ब्रह्मचर्यव्रतधारण को, स्वामिभक्ति को, बलबुद्धि के विकास को तथा अपने इष्ट भगवान् श्रीरामके प्रति निष्काम भक्तिकी शिक्षा प्राप्त होती है। विशेषकर बालकों, विद्यार्थियों, युवकों तथा जी सन्मार्ग सदाचार से भटक गये हों, उनके लिये हनुमान्‌जी की  उपासना परमावश्यक है। भूत - प्रेत, पिशाच, राक्षस आदि उनके नामोच्चारण से ही भाग जाते हैं। 

'भूत पिसाच निकट नहि आवै। महाबीर जब नाम सुनावै ॥' भयंकर विष तथा व्याधि, भय या गृहसंकटके अवसरपर हनुमद्विग्रहके सम्मुख दीपदानका विधान है। उनके स्मरणमात्रसे अनेक रोगोंका प्रशमन होता है। व्याधिनाशके लिये तथा दुष्ट ग्रहोंकी दृष्टिसे रक्षाके लिये चौराहेपर भी दीपदानकी परम्परा है।

जो सदा स्नेहपूर्वक श्रीरामनाम जप करते हैं उनके ऊपर हनुमान्‌जी विशेष कृपा करते हैं। उनके लिये वे कल्पवृक्ष बनकर उनके सभी मनोरथोंको सफल करते रहते हैं। उन्होंने स्वयं कहा है-

ये जपन्ति सदा स्नेहान्नाम माङ्गल्यकारणम्। श्रीमतो रामचन्द्रस्य कृपालोर्मम स्वामिनः ॥ तेषामर्थे सदा विप्रा प्रदाताई प्रयत्नतः । ददामि वाञ्छितं नित्यं सर्वदा सौख्यमुत्तमम् ॥

विप्रवर। जो मानव मेरे स्वामी दयासागर श्रीमान् रामचन्द्रजीके मङ्गलकारी नामका प्रेमपूर्वक सदा जप करते हैं, उनके लिये मैं सदा प्रयत्नपूर्वक प्रदाता बना रहता हूँ। मैं नित्य उनकी अभिलाषापूर्ति करते हुए उन्हें उत्तम सुख देता रहता है। इस प्रकार श्रीहनुमान्‌जी स्वयं तो नाम कीर्तनमें सदा निरत रहते हो हैं, अन्य कीर्तन प्रेमियोंकी भी सदा सहायता करते रहते हैं।

हनुमान्‌जी के निम्नलिखित बारह नामोंका जो रात्रिमें सोनेके समय या प्रातःकाल उठनेपर अथवा यात्रारम्भके समय पाठ करता है, उस व्यक्तिके समस्त भय दूर हो जातेहैं, वह व्यक्ति युद्धके मैदानमें, राजदरबारमें या भीषण संकटमें जहाँ कहीं भी हो, उसे कोई भय नहीं होता। इसलिये हनुमान्‌जीको संकटमोचन कहा जाता है।

हनुमानञ्जनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबलः । रामेष्टः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोऽमितविक्रमः ॥ उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः । लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा ।।

(आनन्दरामायण ८।१३।८-९)

किम्पुरुषवर्ष एवं साकेत में इनका नित्य निवास है। प्रभु श्रीरामकी आज्ञासे पुष्पकविमान जब काञ्चनगिरिपर हनुमान्‌जी की माँ अञ्जनी के दर्शनार्थ उतरा, सभीने अञ्जनी के चरणोंमें प्रणाम किया। माता अञ्जनी को अपने भाग्यपर गर्व हुआ कि जगदीश्वर प्रभु श्रीराम और जगदम्बा सीता माँ को मेरा पुत्र हनुमान् मेरे द्वार पर ले आया, मैं ही यथार्थ पुत्रवती हैं। फिर उन्होंने हनुमान्जीसे कहा- बेटा, कहते हैं कि पुत्र माता से कभी उऋण नहीं हो पाता, किंतु तू मुझसे उऋण हो गया, तूने अपना जीवन और जन्म सफल कर लिया।

प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को श्रीहनुमान्‌जीके दर्शन करने तथा हनुमानचालीसाका पाठ करनेसे साधकका परम कल्याण होता है। श्रीहनुमान्‌जीको शुद्ध घृतमिश्रित सिन्दूर के अनुलेपन की और चोला चढ़ाने की परम्परा है। रामभक्त श्रीपवनकुमारको प्रणाम है-

प्रनवटै पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन। जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर ॥



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