डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी (प्रबंध संपादक)-
विश्व की सृष्टि पुरुष और प्रकृति के समन्वय से हुई है। दर्शनशास्त्र उस पुरुष के 'काल' एवं 'यज्ञ' भेद से दो विवर्त मानता है। कालपुरुष व्यापक है, आदि है और यज्ञ पुरुष सादि है, सीमित है। व्यापक कालपुरुष का ही थोड़ा-सा प्रदेश सीमित होकर यज्ञपुरुष कहलाता है। सृष्टि का प्रथम प्रवर्तक कालपुरुष है और कालपुरुष का आश्रय लेकर वज्ञपुरुष विश्वरचना में समर्थ होता है। यजुर्वेद और उपनिषदों के अनुसार उस महाकाल के उदर में अनन्त विश्व-चक्र घूम रहे हैं। यजुर्वेद में जिस तत्त्व को 'काल' कहा गया है, उपनिषद् उसे परात्पर कहती हैं। शतपथब्राह्मण परात्पर को सर्वमृत्युधन अमृतत्व कहता है। अमृतत्व सत्य है और मृत्युतत्व असत् है :-
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अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्याबमृतमाहितम् ।
-श० ग्रा० १०।५।२
तदन्तरस्य सर्वस्य तदुसर्वस्यास्यबाह्यतः ।
- शु० यजुर्वेद ४०।६
यजुर्वेद के इस कथन के अनुसार दोनों एक-दूसरे में ओत-प्रोत हैं। एक निरंजन, निगुर्ण, शान्त, शाश्वत और अभय है, पूर्ण मृत्यु लक्षण है तो दूसरा साञ्जन, सगुण, अशान्त, अशाश्वत, सभय और स्वलक्षण है। वस्तुतः दोनों में से एक सत् है, उसका कभी विनाश नहीं होता है तथा दूसरा असत् है और विनाश उसका स्वरूप है। तात्पर्य यह है कि सत्-असत् रूप अमृत-मृत्यु की समष्टि ही 'कालपुरुष' है। 'परात्पर' नाम से ख्यात यह विलक्षण तत्व 'कालपुरुष' ही है। इसी असीम परात्पर में प्रति-है
क्षण विलक्षण धर्म वाली माया की शक्ति का उदय होता रहता है। वही मायावल असीम 'कालपुरुष' को ससीम बना देता है, जिसके प्रभाव से वह विश्वातीत, विश्व-कार और विश्व बन जाता है। जो शक्ति काल को यज्ञरूप में परिणत कर देती है, उसका नाम 'प्रकृति' है। इसी का समन्वय प्राप्तकर वह 'कालपुरुष' अपने कुछ एक प्रदेश से सीमित बनकर कामनाओ के चक्कर में फंस जाता है। एक-एक माया से एक-एक विश्व-चक्र उत्पन्न होता है। म.यावल अनन्त है, अतएव उसमें अनन्त विश्व-चक्र हैं। उसके रोम-रोम में ब्रह्माण्ड समाए हुए हैं। अनन्तविश्वाधिष्ठाता कालपुरुष उन सब पर शासन करता है। सात लोक चौदह भुवन सब 'कालपुरुष' से उत्पन्न हुए हैं। समस्त विश्व-चक्रों की उत्पत्ति उसी से हुई है।
अथर्व संहिता (१६।६।५३-५४) का कथनं है कि 'तम' के तीन भेद हैं-अनुपाख्य, निरुक्त और अनिरुक्त ।
कालारंग, कोयला आदि पदार्थ निरुक्त तम हैं इसलिए कि इनका निर्वचन विश्लेषण भली-भाँति किया जा सकता है। आँख मूंदने पर छा जाने वाला अन्धकार और घोर अँधियारी रात का अन्धकार 'अनिरुक्त तम' है, क्योंकि इसका प्रत्यक्षीकरण तो होता है किन्तु निर्वचन नहीं। 'निरुक्त' विश्वसत्ता है और 'अहः' काल है, सृष्टि है। 'अनिरुक्त' रात्रिकाल प्रलय है। अहोरात्र की समष्टि विश्व है यह 'अनु पाख्य तम है, जो प्रलय काल में अमिरुक्त तम से ढका रहता है। इसी को वेद 'पुरुष' कहते हैं
तम आसीत् तमसा गुब्व्हमद्रेऽप्रके 1 तं सलिलं सर्वमा इवम्
तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासोत्त पसस्ततन्महिना जायतैकम् ।।
ऋग्वेद १०।१२८।३
जो विश्वातीत अनुपाख्य तम है, वही 'कालपुरुप' है। वह विश्वभाव रूप है अतएव सत् रूप होने पर भी शाम चक्षुओं से अतीत है, इसलिए ऋषियों ने उसे 'असत्' कहा है। यहाँ पर असत् का अर्थ अभाव नहीं बल्कि विश्वकाल में वह इससे विलक्षण किन्तु सत् है:-
असदेवेदमग्र आसीत । तत् सबासीत् । कथमसतः सञ्जयेत् । तत् समभवम् ।।
तद् अण्णां निरवतंत् ॥
वही असत् किन्तु सद् कालपुरुष महामाया से घिर जाता है। वह अपरिमित है, वहां पर कोई अभाव नहीं कोई कामना नहीं, यह जातकाम है, किन्तु उसी का माया-प्रदेश जब सीमित हो जाता है तो वह आमकाम न रह कर कामनामय बन जाता है। उसकी कामना का एक बहुस्याम' यही रूप है। मायावल के अव्यवहित उत्तर-काल में उसका हृदयबल (कंन्द्र शक्ति) उत्पन्न होता है। उसके उत्पन्न होने पर वही रसवलात्मक तत्त्व कामनामय होकर 'मन' यह नाम धारण कर लेता है। कामना या इच्छा मन का व्यापार है। हृत्प्रतिष्ठंयदजिरं' (यजुर्वेद) के अनुसार मन हृदय में हो प्रतिष्ठित रहता है और 'कामस्तवत्रे समवत्र्त्तताधि मनसोरेतः प्रथमं यदासीत्' (ऋग्वेद) के अनुसार सबसे पहले इस मन से विश्वरेत (शुक्ल) भूत कामना का उदय होता है। उसकी इस कामना से पञ्चन् क्रम से पहले वेद नाम के 'पुरञ्जन' का प्रादुर्भाव होता है। वेद चार प्रकार के है ऋक्, यजुः साम और अथवं । त्रयीवेद अग्निवेद हैं और अथर्व सोमवेद है। त्रयोवेद स्वायम्भुव ब्रह्म है और अथवं पारमेष्ठ्य सुब्रह्म है। ब्रह्म आग्नेय होने से पुरुष है और सुब्रह्म सौम्य होने से स्त्री है। त्रयी ब्रह्म के मध्य पतित यजुः भाग में 'यज्जूदो' तत्त्व है। 'यत्' गति तत्व है। यह प्राण और वायु नाम से प्रसिद्ध है। 'जू' स्थिति तत्व है, यहाँ वाक् और आकाश नाम से प्रसिद्ध है। प्राण वाक्- बाह्याकाश रूप स्थिति गति तत्व की समष्टि यजुर्वेद है। प्राण रूप 'यत् भाग' से काम, तप से वाक्, जू भाग से सर्वप्रथम जल उत्पन्न होता है। इसी की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण (६।१।३) में मिलती है:-
सोऽपसृजत वाच एवं लोकात् बागेवमातृजत् ।
त्रयी ब्रह्म के वाक् भाग से उत्पन्न इसो 'आप' तत्व का नाम अथर्ववेद है। युजुःरूप स्वायम्भुव का पसीना ही अयर्वरूप सुब्रह्म है (गोपथ ब्राह्मण १।१।१) शतपथ (१०।२।३।६।१) का वचन है, -
अयमेवाकाशे जूः यविदमन्तरिक्षं तदेतद्यजुर्वाद्युश्चान्तरक्षिञ्च पञ्च जूश्च तस्माद्यजुः तदेतद्यजुः ऋक्सामयोः प्रतिष्ठा । ऋस्तने हतः ॥
इस प्रकार ऋक्, यजुः, साम 'यत्' और 'जू' भेद से अग्निवेद चतुष्कल हो जाता है। दूसरा आपोमध सोम अथवं है। भूगु और अंगिरा भेद से दो भागो में विभक्त है। घन-तरल-विरल- इन तीन अवस्थाजों के कारण भूगु आप, बायु ओर सोम इन तीन अवस्थानों में परिणत हो जाता है। इस प्रकार आपोवद 'षट्कल' हो जाता है। भूगु-अङ्गिरा रूप बापोवेद के साथ चतुष्फल त्रयीवेद का समस्वय होता है:
आपो भूग्वङ्गिरो व्यमापो भुग्वङ्गिरोऽयम् । अन्तरेते प्रयो बेदाः मृगुरङ्गिरसः श्रिताः ॥
उक्त पट्कल सुबहा सौम्य होने से स्त्री है और आग्नेय चतुष्कल त्रयी वहा पुरुष है। दोनों के मिलन से वहा-सुब्रह्मात्मक विराट् पुरुष का जन्म होता है। बह वेदमूत्ति पूर्ण पुरुष अपने आपको इन्हीं दो नागों में विभक्त कर विराट् को उहा करताः-
द्विद्या कुतात्मनो व्हमद्धन पुरुषोऽभवत्। नहुँन मारी तस्यां व विराडनवृत प्रभुः ।
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