गीता का विभूति योग

img25
  • मिस्टिक ज्ञान
  • |
  • 23 March 2026
  • |
  • 0 Comments

श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ ) भुवनेश्वर-

सारांश-गीता का प्रत्येक अध्याय एक योग है। दशम अध्याय विभूति योग है। पतञ्जलि के योग सूत्र में भी तृतीय पाद को विभूति पाद कहते हैं। गीता में ब्रह्म के विशेष गुणों का वर्णन है, जिसे जानने से योग में अविचल भाव से स्थित हो जाता है। योग सूत्र में विशेष क्षमताओं के लिए विधि बताई गयी है जो धारणा, ध्यान तथा समाधि का समन्वय यासंयम है। गीता में पहले महर्षियों तथा मनु आदि से सृष्टि का आरम्भ कहा है तथा विभिन्न प्रकार की सृष्टियों में सर्वश्रेष्ठ का वर्णन किया है जो भगवान् की विभूति हैं। गीता के अन्य प्रसंगों की तरह महर्षि या अन्य वर्ग भी तथा उनमें सर्वश्रेष्ठ का निर्णय भी रहस्यमय हैं। इस लेख में कुछ की व्याख्या का प्रयत्न है।

https://mysticpowertrust.org/

१. विभूति-विभूति के कई अर्थ हैं-(१) शक्ति, क्षमता, महानता, (२) सम्पन्नता, धन, (३) उच्च पद, (४) सिद्धि या विशेष क्षमता जो प्रायः ८ प्रकार की कही जाती हैं-अणिमा (शरीर को सूक्ष्म करना), महिमा (शरीर को बड़ा करना), गरिमा (शरीर को भारी करना), लघिमा (शरीर को हल्का करना), प्राप्ति (किसी वस्तु को पाना), प्राकाम्य (इच्छा पूर्ति), ईशित्व (पदार्थों का निर्माण या विनाश), वशित्व (पञ्च महाभूतों या जीवों पर नियन्त्रण)। (५) गोबर की राख, (६) विस्तार-एतां विभूति योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः (गीता, १०/७), (७) स्थिति-क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूतिर्जीवस्य माया रचितस्य नित्याः (भागवत पुराण, ५/११/१२)| योग सूत्र में विभूति योग का अर्थ है संयम द्वारा विशेष सिद्धियां पाना। यहां समाधि तक के ३ क्रम साधन हैं।

https://mysticpower.in/dev-pujan/navgraha-remedies.php

गीता में समाधि ही लक्ष्य है तथा उसका साधन है ब्रह्म द्वारा सृष्टि तथा उसकी विभूतियों को जानना।

विष्णु पुराण (१/२२/१-९) भी विष्णु की विभूतियों का गीता जैसा ही वर्णन करता हैं, पर कहा है कि इन अध्यक्षों को ब्रह्मा ने पृथु के राज्याभिषेक के समय नियुक्त किया था।

२. विभूति योग तथा उसकी विधि-गीता अध्याय १० में दो रहस्यमय श्लोक हैं-

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा। मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६॥

एतां विभूति योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७॥

= मेरे मन के भाव से पूर्व में ७ तथा ४ महर्षि तथा मनु हुए (पूर्व किसका विशेषण है?) तथा उनसे लोकों तथा प्रजा की सृष्टि हुई। वर्तमान काल के ७ महर्षियों में भृगु नहीं हैं जिनको श्लोक २५ में श्रेष्ठ महर्षि कहा गया है। कुछ ने वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के पूर्व चाक्षुष मन्वन्तर के सप्तर्षियों में भृगु को खोजा, पर वे सर्वश्रेष्ठ कैसे हुए, इसका पता नहीं चला। पूर्व के ४ महर्षि हैं या मनु? मनु १४ थे, पूर्व के अलग प्रकार के महर्षि कौन थे? कुछ ने इसका अर्थ ४ व्यूह (सृष्टि की स्थिति) किया है-वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध। कुछ ने इनको ब्रह्मा के ४ मानस पुत्र माना है-सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार। पर ये सदा बालक रूप में ब्रह्मचारी ही रहे, इनसे कोई सन्तान नहीं हुई।

अगला श्लोक कहता है कि इन विभूतियों को जानने अविचल योग सिद्धि होती है। यहां योग के ८ अङ्ग नहीं कहे हैं पर उसके कुछ तत्त्वों काउल्लेख श्लोक (४-५) में है।

बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च॥४॥

अहिंसा समतातुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानांमत्त एव पृथग्विधाः॥५॥

यहां योग के अङ्गों यम नियम के कुछ तत्त्व कहे हैं-अहिंसा, सत्य, दम, शम तथा सुख-दुःख आदि विपरीत परिस्थितियों में सन्तुलन।

कुछ विभूतियां गीता के अध्याय ७, श्लोकों ८-१२ में भी हैं। मैं (भगवान्, अव्यय पुरुष) रसों में अप् हूं, सूर्य-चन्द्र का प्रकाश, वेदों में ॐ, मनुष्यों में पौरुष, आकाश में शब्द, भूमि में गन्ध, प्रकाश में तेज, बली में बल, बुद्धिमानों में भुद्धि, जीवों में जीवन तथा सभी भूतों का बीज हूं। अन्त में वे कहते हैं कि ये सभी तत्त्व उनमें हैं, वे इन तत्त्वों में नहीं हैं-

मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि (गीता, ७/१२)

इस आधार पर पण्डित मधुसूदन ओझा ने दो वस्तुओं के बीच ३ प्रकार के मिलन कहे हैं-जब एक वस्तु दूसरे के नियन्त्रण में है, तो यह नियन्त्रक की विभूति है। यदि दोनों अपना रूप बनाये रखते हैं तो यह योग है। जब दोनों का रूप बदल जाता है तो यह बन्ध है-रासायनिक संयोग की तरह।



0 Comments

Comments are not available.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Post Comment