संस्कृत में ‘ग्रह’ का अर्थ है—“गृहीतुम् शक्तः” अर्थात—जो जीव के कर्मफल को ग्रहण कर के उसे भोग के रूप में...
केन्द्र–त्रिकोण का सिद्धान्त ज्योतिषशास्त्र का ऐसा आधार है जिस पर समस्त योग-सिद्धान्त, राजयोग, लक्ष्मीनारायण योग, धर्म–कर्माधिपति योग तथा अनेक चर-स्थावर,...
चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है।...
पंचम भाव को संतान-भाव कहा गया है। यह पूर्वजन्म के पुण्य, विद्या, बुद्धि, मंत्र-जप, रचनात्मकता तथा प्रेम से भी संबंधित...
जिस नक्षत्र में विवाह होता है, उसी के अनुरूप दैव-फल दाम्पत्य जीवन में प्रकट होता है।...
ज्योतिष-शास्त्र केवल दोष-निर्धारण तक सीमित नहीं है; शास्त्र इस दोष के क्षय, शमन तथा नाश के सिद्धांतों को भी स्पष्ट करते हैं।...
किसी भी भवन का ब्रह्मस्थान खुला , खाली, हवादार एवं रौशनी युक्त होना चाहिए । ब्रह्मस्थान पर किसी भी तरह का...
यह शोधप्रबंध क्वांटम टनलिंग और ज्योतिष के बीच संबंध का विश्लेषण करता है और दर्शाता है कि कैसे वैदिक शास्त्रों...
स्कन्दपुराण के वैष्णव खण्ड में आया है कि भूमि प्राप्त करने के इच्छुक मनुष्य को सदा ही इस मन्त्र का...
किसी व्यक्तिको प्रयत्न करनेपर भी निवासके लिये भूमि अथवा मकान न मिल रहा हो, उसे भगवान् वराहकी उपासना करनी चाहिये।...