“संतान योग या संतान-वियोग? पंचम-द्वादश संबंध का गूढ़ ज्योतिषीय संकेत”

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  • ज्योतिष विज्ञान
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  • 18 February 2026
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श्री शशांक शेखर शुल्ब (धर्मज्ञ )-

✓•१. भूमिका: ज्योतिष-शास्त्र में भाव–भावेश संबंध (Bhāva–Bhāveśa sambandha) फल-निर्णय का मूलाधार है। जब पंचम भाव (संतान, बुद्धि, पूर्वपुण्य) और द्वादश भाव (व्यय, विदेश, त्याग, शय्या, मोक्ष) परस्पर एक-दूसरे के भावेशों के माध्यम से जुड़े हों—अर्थात् द्वादशेश पंचम में तथा पंचमेश द्वादश में स्थित हों—तो यह योग संतान-संबंधी विषयों को व्यय, विदेश अथवा दूरी/वियोग के क्षेत्र से जोड़ देता है। प्रस्तुत शोधप्रबंध में इसी योग का शास्त्रीय, दार्शनिक तथा फलात्मक विश्लेषण किया गया है।

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✓•२. पंचम भाव का शास्त्रीय स्वरूप:

पंचम भाव को संतान-भाव कहा गया है। यह पूर्वजन्म के पुण्य, विद्या, बुद्धि, मंत्र-जप, रचनात्मकता तथा प्रेम से भी संबंधित है।

•शास्त्रीय प्रमाण

 

"पुत्रविद्याबुद्धयः पंचमे।" 

( बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, भावार्थ)

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अर्थात् पंचम भाव से संतान, विद्या और बुद्धि का विचार किया जाता है।

 

✓•३. द्वादश भाव का शास्त्रीय स्वरूप:

द्वादश भाव व्यय, हानि, विदेश, त्याग, निद्रा, कारावास तथा मोक्ष से संबंधित है।

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•शास्त्रीय प्रमाण

 

"व्ययस्थानं द्वादशं प्रोक्तं।" 

(जातक पारिजात, अध्याय–भावार्थ)

 

✓•४. भावेश-परिवर्तन (Parivartana) का सिद्धांत: जब किसी भाव का स्वामी दूसरे भाव में जाकर स्थित हो, तो वह उस भाव के कारकों को अपने मूल भाव से जोड़ देता है। यदि परस्पर विनिमय हो (द्वादशेश पंचम में और पंचमेश द्वादश में), तो इसे भाव-विनिमय कहा जाता है, जिसका फल दोनों भावों के कारकों का गहन संयोग बनता है।

 

•शास्त्रीय सिद्धांत

 

"स्वभावे तिष्ठति यः स्वामी तद्भावफलं ददाति।" 

              (फलदीपिका)

 

✓•५. द्वादशेश पंचम में — फल-विचार:

द्वादशेश का पंचम में जाना, पंचम के विषयों (संतान) को द्वादश के कारकों (व्यय, विदेश, त्याग) से जोड़ देता है। फलतः—

 

•१. संतान पर अत्यधिक व्यय – शिक्षा, चिकित्सा या विदेश-स्थापन हेतु धन-व्यय।

 

•२. विदेश में संतान – संतान का जन्म, पालन-पोषण या स्थायी निवास विदेश में।

 

•३. भावनात्मक दूरी – संतान के प्रति लगाव के बावजूद भौगोलिक दूरी।

 

•शास्त्रीय संकेत

 

"द्वादशेशे सुतस्थाने व्ययः पुत्रेण जायते।" 

     (सरावली, अध्याय–फलार्थ)

 

✓•६. पंचमेश द्वादश में — फल-विचार:

पंचमेश का द्वादश में जाना, संतान-सुख को व्यय, त्याग या दूरी की दिशा में ले जाता है—

•१. संतान से अस्थायी/स्थायी अलगाव – शिक्षा/नौकरी के कारण विदेश गमन।

•२. संतान हेतु त्याग – माता-पिता का व्यक्तिगत सुख-त्याग।

•३. संतान-सुख में विलंब – गर्भधारण में देरी या संतान-संपर्क में अंतराल।

 

•श्लोक-सूत्र

 

"पंचमेशो व्ययस्थाने पुत्रसौख्ये व्ययः स्मृतः।" 

            ( जातक तत्व)

 

✓•७. परस्पर विनिमय (द्वादश ↔ पंचम) — समेकित फल:

जब दोनों स्थितियाँ एक साथ हों, तो फल अधिक सशक्त हो जाता है—

•संतान से विदेश-व्यय: शिक्षा/कैरियर हेतु विदेश भेजने पर निरंतर व्यय।

•विदेश-स्थित संतान: माता-पिता से दीर्घकालिक दूरी।

•कर्म-ऋण सिद्धांत: पूर्वजन्म के ऋण-पुण्य के कारण संतान-संबंध व्यय/त्याग से जुड़ता है।

 

•दार्शनिक संकेत

 

"पुण्यपापवशात् जीवः पुत्रसंबन्धमश्नुते।" 

         ( बृहत् जातक)

 

✓•८. ग्रह-दृष्टि एवं योग-भंग/संवर्धन:

गुरु की दृष्टि पंचम/पंचमेश पर हो तो अलगाव को उन्नत उद्देश्य (उच्च शिक्षा, प्रतिष्ठा) में बदल देती है।

•शनि/राहु की दृष्टि दूरी को दीर्घ या मानसिक तनावयुक्त बना सकती है।

•शुक्र की युति/दृष्टि व्यय को सुखद (शिक्षा, कला) बनाती है।

 

✓•९. नवांश (D९) एवं सप्तांश (D७) से पुष्टि:

•D७ (संतान-वर्ग): पंचमेश/द्वादशेश की स्थिति यदि पुनः व्यय/विदेश से जुड़े राशियों में हो, तो फल पुष्ट।

•D९ (धर्म-वर्ग): धर्म/उच्च-शिक्षा संकेत होने पर विदेश-गमन सकारात्मक सिद्ध होता है।

 

✓•१०. अपवाद एवं संतुलन:

बलवान पंचम, उच्च/स्वक्षेत्री पंचमेश, तथा शुभ दृष्टियाँ होने पर अलगाव कष्टप्रद न होकर प्रगतिशील होता है।

द्वादश भाव शुभ ग्रहों से युक्त हो तो व्यय निवेश बन जाता है।

 

✓•११. संक्षिप्त फल-सार:

•१. यह योग संतान-संबंध को विदेश/व्यय से जोड़ता है।

•२. अलगाव अनिवार्य नहीं, पर संभाव्य है—विशेषकर शिक्षा/कैरियर कारणों से।

•३. शुभ ग्रह-समर्थन से फल उत्कर्षकारी बनते हैं।

 

✓•१२. निष्कर्ष: द्वादशेश का पंचम में तथा पंचमेश का द्वादश में होना संतान के कारण विदेश-व्यय या दूरी का प्रबल योग निर्मित करता है। यह योग दार्शनिक रूप से पूर्वपुण्य–कर्मऋण का संकेतक है। उचित ग्रह-बल, शुभ दृष्टि और वर्ग-कुंडली समर्थन से यह योग कष्टदायक न होकर संतान की उन्नति और पारिवारिक प्रतिष्ठा का माध्यम बन सकता है। फल-निर्णय सदैव समग्र कुंडली-विवेचन से ही किया जाना चाहिए।

 



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