सनातन की द्वेषपूर्ण नकल इस्लाम

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  • 01 June 2026
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श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )-

सनातन धर्म का आधार वेद है। वह किसी मत के समर्थन के लिए नहीं लिखा गया था। पर भारत में विदेशी शासन में अपने मत के प्रचार और अन्य मतों के खण्डन के लिए मूल अर्थों में परिवर्तन किये गये। दूषित अर्थों की कई विधियां हैं-छन्द का पाद भंग कर अन्वय, ब्रह्म या ऋषि वाचक सभी शब्दों का अर्थ परमेश्वर या विद्वान् करना, सभी मनुष्य ऋषियों को अस्वीकार कर अग्नि-वायु आदि तत्त्वों को ऋषि कहना, जिन अर्थों में शब्दों का कभी प्रयोग नहीं हुआ, उन अर्थों का दूषित प्रयोग जिसे निरुक्त प्रक्रिया कहा गया। व्याकरण मूल धातु में उपसर्ग प्रत्यय जोड़ कर शब्द बनते हैं, निरुक्त में शब्द परिवर्तन वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुसार होता है। जैसे-चित् = शून्य आकाश, चिति = कणों को क्रम में सजाना, चेतना = जो चिति कर सके, चित्त = चेतना का निवास।

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असुरों ने भी समय समय पर अपने स्वार्थ या वासना पूर्ति के लिए वेद शब्दों के भिन्न अर्थ किये, जैसे पूर्व काल में प्रजापति द्वारा ’द’ उपदेश के ३ प्रकार के अर्थ किये गये थे। वेद की नकल होने के कारण कुरान की अरबी भाषा में कई संस्कृत शब्द हैं। मुहम्मद मुस्तफ़ा ख़ाँ ’मद्दाह’ के उर्दू हिन्दी शब्दकोष (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ) में भी इस आशय का एक अरबी शब्द दिया है-तवाफ़ुके लिसानैन (अरबी, पुल्लिंग)= दो विभिन्न भाषाओं के किसी शब्द का एक जैसा होना, बनावट में भी और अर्थ में भी, जैसे "फुल्ल" अरबी और संस्कृत दोनों में फूल को कहते हैं। इसका मूल है तवाफ़ुक = परस्पर एक जगह रहना; एक दूसरे के अनुकूल होना; एक दूसरे की सहायता करना, सदृशता, यकसानियत। कुछ उदाहरण-

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(१) चार पत्नी-वेद में एक ही पत्नी के ४ रूपों का वर्णन है। उसका अर्थ अरब में ४ पत्नी किया गया। पत्नी रूपों के वेद मन्त्रों के कुछ शब्दों का प्रयोग भारत में नहीं होता है। अतः ४ पत्नी नियम वाले अरबी भाषा में यह शब्द खोजा। पुरानी अरबी में ववाता का अर्थ मालिक या स्वामिनी होता था, आजकल यह मध्य अफ्रीका में प्रचलित है। पतञ्जलि के महाभाष्य के आरम्भ में लिखा है कि वेद के शब्द निरर्थक नहीं हैं, पृथ्वी पर ७ द्वीप हैं, कहीं न कहीं उनका प्रयोग हुआ होगा।  सर्वे खल्वप्येते शब्दा देशान्तरेषु प्रयुञ्ज्यन्ते। न चैवोपलभ्यन्ते। उपलब्धौ यत्नः क्रियताम्। महान् शब्दस्य प्रयोगविषयः। सप्तद्वीपा वसुमती त्रयो लोकाः चत्वारो वेदाः साङ्गाः स रहस्या बहुधा भिन्ना एकशतध्वर्यु शाखाः सहस्रवर्त्मा सामवेदः एकविंशतिधा बाह्वृच्यं नवधाथर्वणो वेदः वाकोवाक्यं इतिहासः पुराणं वैद्यकं इत्येतावान् शब्दस्य प्रयोगविषयः। (महाभाष्य, १/१)

पत्नी के वेद में ४ रूप कहे हैं-महिषी (माता), ववाता (स्वामिनी), पालागली (पति-पिता क परिवारों के बीच सम्पर्क, या तोता), परिवृक्ता (स्वतन्त्र व्यक्तित्व या व्यवसाय)। अतः अरब में ४ पत्नियों का नियम हो गया। इनके ३ शब्द केवल प्राचीन अरबी में थे-पाला-गली = २ पाला के बीच की गली, तोता = बोलने वाला पक्षी, २ परिवारों के बीच सम्पर्क के लिए सदा बोलती रहती हैं, ववाता = स्वामिनी (प्राचीन अरबी, अभी केवल केन्या में प्रचलित) 

परिवृक्ता च महिषी स्वस्त्या च युधङ्गमः । अनाशुरश्चायामि तोता कल्पेषु सम्मिता ॥१०॥ 

वावाता च महिषी स्वस्त्या च युधङ्गमः । श्वाशुरश्चायामि तोता कल्पेषु सम्मिता ॥११॥ (अथर्व, २०/१२८) 

चतस्रो जाया उपक्लृप्ता भवन्ति। महिषी वावाता परिवृक्ता पालागली। सर्वा निष्किण्योऽलङ्कृताः। मिथुनस्यैव सर्वत्वाय। (शतपथ ब्राह्मण, १३/४/१/८) 

प्रहेयो वै पालागलः (दूतः) अध्वानं वै प्रहित एति (शतपथ ब्राह्मण, ५/३/१/११) 

महिषी धाय्या। (कौषीतकि ब्राह्मण, १५/४), भुव इति वावाता (पत्नी)। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/४/५)

(२) सप्तम मन्वन्तर-बाइबिल के आरम्भ में ७वें दिन की सृष्टि कही गयी है। अभी दिन का अर्थ है-पृथ्वी का अक्ष-भ्रमण काल। जब सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी नहीं बने थे, तब दिन का क्या अर्थ हो सकता है? जब सौर-मण्डल भी नहीं था, तो ब्रह्माण्ड (विश्व रूपी ब्रह्म का अण्ड-गैलेक्सी) का अक्ष-भ्रमण ही दिन है। शतपथ ब्राह्मण (१२/३/२/५) के अनुसार मुहूर्त्त को ७ बार १५ से भाग देने पर लोमगर्त होता है, जो १ सेकण्ड का प्रायः ७५,००० भाग है। त्वचा पर केश लोम हैं, उनका गर्त या आधार कलिल (सेल, cell) है। शतपथ ब्राह्मण (१०/४/४/२) के अनुसार जितने नक्षत्र हैं उतने १ संवत्सर में लोमगर्त हैं। ब्रह्माण्ड में जितने तारा हैं, मनुष्य मस्तिष्क में उतने ही कण हैं-प्रायः २ खर्व। अतः ब्रह्माण्ड मन का बृहत् रूप है और उसकी चेतना या तत्त्व मनु है। इसका अक्ष भ्रमण मन्वन्तर कहा जायेगा, जिसका मान पुराणों के अनुसार ३०.६८ करोड़ वर्ष है। ब्रह्माण्ड केन्द्र से सूर्य प्रायः २/३ त्रिज्या दूरी पर है तथा आधुनिक अनुमान के अनुसार सूर्य २०-२५ करोड़ वर्ष में केन्द्र की १ परिक्रमा करता है। ब्रह्माण्ड का बाहरी किनारा कुछ अधिक समय में परिक्रमा करेगा। इसका अभी ७वां मन्वन्तर चल रहा है, जिसे बाइबिल में ७ दिन कहा है। सूर्य सिद्धान्त (१४/१) के अनुसार यह प्राजापत्य मान है। पृथ्वी सतह पर ऐतिहासिक मन्वन्तर बृहत् मन के भीतर पृथ्वी अक्ष का शङ्कु आकार में भ्रमण चक्र है, जिसे अयन चलन (precession of equinoxes) कहा गया है। यह मन्वन्तर २६,००० वर्ष का है जो स्वायम्भुव मनु से कलि आरम्भ (३१०२ ईपू) तक का समय है (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/९/३६-३७, १/२/२९/१९)।

(३) जन्नत में ७२ हूर-अप्सरा को अरबी में हूर कहते हैं। अप् = जल, सर = गति, जल में तैरने वाली स्त्री अप्सरा है। आजकल सौन्दर्य प्रतियोगिता में स्त्रियां तैरने का वस्त्र पहन कर दिखाती हैं। ब्रह्माण्ड के खाली स्थान में फैला विरल पदार्थ जल जैसा समुद्र है, जिसे अप् कहते हैं। यह समुद्र सरस्वान् है, तथा इसे वरुण स्वर्ग कहते हैं। पुराण भाषा में यह जनः लोक है, जिसे अरबी में जन्नत कहा गया है। जनः लोक में १ कल्प तक आत्मा रहती है, जिसे कुरान में कहा है कि कयामत तक आत्मा रहती है। (वहां कब्र के मृत शरीर को ही आत्मा समझा गया है)। 

ध्रुवादूर्ध्वं महर्लोको यत्र ते कल्पवासिनः॥१२॥

ध्रुवसूर्यान्तरं यच्च नियुतानि चतुर्दश। 

स्वर्लोकः सोऽपि गदितो लोकसंस्थान चिन्तकैः॥१८॥

त्रैलोक्यमेतत् कृतकं मैत्रेय परिपठ्यते।

जनस्तपस्तथा सत्यमिति चाकृतकं त्रयम्॥१९॥

कृतकाकृतयोर्मध्ये महर्लोक इति स्मृतः।

शून्यो भवति कल्पान्ते योऽत्यन्तं न विनश्यति॥२०॥

(विष्णु पुराण, अध्याय, २/७)

वेद में ३ धामों-पूर्ण विश्व, ब्रह्माण्ड, सौर मण्डल के पिण्ड को भूमि तथा आकाश को पिता कहा गया है। इनके ३ व्रत (अन्तरिक्ष) हैं-अर्यमा, वरुण, मित्र।

तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।

ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋक्, २/२७/८)

अयं वै लोको मित्रः, असौ लोकः वरुणः। (शतपथ ब्राह्मण, १२/९/२/१२)

(आपः) यच्च वृत्वा अतिष्ठन् तद् वरणः अभवत्, तं वा एतं वरणं सन्तं वरुण इति आचक्षते परोक्षेण। (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/७)

ब्रह्माण्ड के अप् में प्रकाशित पिण्ड तैरते हैं, अतः उनको तारा कहते हैं।

सलिलं वा इदमन्तः (अन्तरिक्षे) आसीत्। यत् अतरन्, तत् तारकानां तारकत्वम्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/५/२/५)

अप् में चलने के कारण वे अप्सरा हैं। अग्नि की अप्सरा ओषधि, सूर्य की अप्सरा उसकी मरीचि, चन्द्रमा की अप्सरा नक्षत्र, वात की अप्सरा अप्, यज्ञ की अप्सरा दक्षिणा तथा मन की अप्सरा ऋक्-साम हैं (वाज. यजु, १८/३८-४३, शतपथ ब्राह्मण, ९/४/१/७-१२)।

अप् वरुण का क्षेत्र है, उसकी प्रजा गन्धर्व हैं, जो गन्ध रूप हैं (भूमि तत्त्व का गुण गन्ध है, अर्थात् पदार्थ के सूक्ष्म कण) वरुण आदित्यो राजेत्याह तस्य गन्धर्वा विशः त इमे आसत, इति। (शतपथ ब्राह्मण, १३/४/३/७)

योषित् कामा वै गन्धर्वाः (शतपथ ब्राह्मण, ३/२/४/३, ३/९/३/२०)

अप्सरा क्षेत्र (स्त्री) है, गन्धर्व उस क्षेत्र के कण (पुरुष) हैं।

स्त्री कामा वै गन्धर्वाः (ऐतरेय ब्राह्मण, १/२७, कौषीतकि ब्राह्मण, १२/३)

अतः ब्रह्माण्ड में मरने के बाद ७२ हूरों (अप्सरा) की कथा कुरान में है (२७ नक्षत्र,  अरबी में २७ का उल्टा ७२)।

(४) संसार-संसार को ३ हिस्से में समझा जाता है-एक आकाश में, एक धरती पर, और एक अपने शरीर के भीतर-इनको आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक कहते हैं। अलिफ आकाश की सृष्टि है (गीता में अक्षराणां अकारोऽस्मि), लाम धरती है। अंग्रेजी में Word में L (लाम) मिलाने से World होता है| संस्कृत में भी लं = पृथ्वी या अग्नि तत्त्व। लाम या अलग अलग रूपों के कारण झगड़ा होता है अतः लाम = लड़ाई। मीम् (अंग्रेजी में me) = मैं का अर्थ अपना शरीर है। संसार के इन ३ रूपों की एकता समझना भगवान की वाणी समझना है।

व्यवहार में विपरीत अर्थ है कि ब्रह्म सबका पालन करता है, अल्लाह रोजा पूरा होते ही अन्य लोगों को मारने का आदेश देता है (कुरान, २/१९१)।

(५) फकीर तथा काफ़िर-यह आदम-हव्वा की कहानी पर आधारित है। जो फाक़ा (अरबी फ़ाकः) करता है वह फकीर (अरबी फ़क़ीर) है, फ़क़ीर होने का गुण फ़ख्र (गौरव) है। उसका उलटा काफी खानेवाला काफिर है। कोई भी बिना खाये जीवित नहीं रह सकता। पर जो सिर्फ अपनी जरूरत के लिये ही खाता है, वह फकीर है। लेकिन अधिकतर लोग सिर्फ खाने या कई चीजों के उपभोग में हमेशा लगे रहते हैं। जरूरत से अधिक उपभोग की कोशिश से ही सभी पाप होते हैं, अतः फकीर का उलटा काफिर बुरा व्यक्ति हुआ। आदम केवल देखभाल करता था, जिसमें खाने की हवस है, वह हव्वा है, वह पुरुष या स्त्री कोई भी हो सकता है। इस कथा का मूल द्वा-सुपर्ण सूक्त है, जिसके अनुसार ज्ञान रूपी वृक्ष पर २ पक्षी बैठे हैं जिनमें एक उसके फल स्वाद सहित खाता है, अन्य केवल देखभाल करता है। शंकराचार्य ने इनको मस्तिष्क के आज्ञा-चक्र के २ हंस कहा है जिनके वार्तालाप से १८ प्रकार की विद्या की उत्पत्ति होती है। 

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। 

तयोरन्यः पिप्पलं स्वादु-अत्ति अनश्नन् अन्यो अभिचाकषीति॥

(ऋक्, १/१६४/२०, अथर्व, ९/९/२०, श्वेताश्वतर उपनिषद्, ४/६, मुण्डक उपनिषद् ३/१/१)

साम्प्रदायिक द्वेष के कारण अन्य सम्प्रदाय वालों को काफ़िर कहने लगे। इनके अनुसार हर सम्प्रदाय के लिए ईश्वर भिन्न भिन्न हैं।

(६) त्रयी-सैषा त्रयी विद्या। ऋचो यजूंषि सामानि। (शतपथ ब्राह्मण, ४/६/७/१)

कई प्रकार से ३-३ विभाजन द्वारा ज्ञान होता है। हर विभाजन में कुछ अविभक्त रह जाता है। अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् (गीता, १३/१६)।

अरबी में प्रथम अक्षर थे अबज़द्। अतः प्रथम ३ अक्षरों को सामान्य व्यक्ति मानते थे तथ् अबुस कहते थे। यह सिद्धार्थ बुद्ध काल में सहपाठियों के लिए अबुस शब्द प्रचल्त था। इससे कम २ अक्षर तिरस्कार सूचक हैं-अबे (= अलिफ़ + बे)। अंग्रेजी में सामान्य शिक्षित को कहते हैं-अ, ब, स जानता है (knowing abc)। 

(७) बिस्मिल्लाह्-यह ७८६ के लिए अरबी में कूट शब्द है। मूल वेद अथर्व का आरम्भ ३ ७ = २१ से हुआ है-ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वाः। पुरुष सूक्त में भी है-सप्तास्यासन् परिधयं त्रिः-सप्त समिधः कृताः। ७ परिधियां ७ लोकों की माप हैं। उनमें निर्माण सामग्री भी ३ x ७ प्रकार की है। आकाश के ७ लोकों की प्रतिमा पृथ्वी पर तथा मनुष्य शरीर में हैं। सृष्टि निर्माण का क्रम सांख्य दर्शन में है- पहले ७ लोक बने, उसके बाद ८ दिव्य सृष्टि, तब ६ पार्थिव सृष्टि।

चतुर्दश विधो भूत सर्गः। (सांख्य सूत्र, १८)

अष्ट विकल्पो देवस्तैर्यग् योनश्च पञ्चधा भवति। मानुष्यश्चैकविधः समासतो भौतिक सर्गः॥ (सांख्य कारिका, ५३)

८ देवयोनि-ब्रह्मा, प्रजापति, इन्द्र, पितृयोनि, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच।

५ तिर्यक् सृष्टि-पशु, मृग, पक्षी, सरीसृप, स्थावर (वृक्ष आदि)। 

मनुष्य सृष्टि १ प्रकार की।

भगवान् ने अपना कर्म इस ७, ८, ६ से आरम्भ किया था, अतः किसी काम का आरम्भ ७८६ से करते हैं।

(८) विपरीत अर्थ-असुर अपने को बहुत मायावी समझते थे, पर विष्णु माया के सामने टिक नहीं पाते थे। अतः विष्णु नाम अधोक्षज से धोखा हुआ है। अन्य विपरीत अर्थ हैं-हरिहर = Horror, हरेकृष्ण = Hurricane, हरिबोल = Horrible। 

असुरों के नाश के लिए शक्ति अवतार भी हुआ था। अतः उनके शब्दों का भी विपरीत अर्थ है। विश्वामित्र ने भगवान् राम को बला-अतिबला विद्या दी थीं। इनका अरबी मे अर्थ है विपत्ति। परम शक्ति को परेशानी कहते हैं, जिसका अरबी में अर्थ है समस्या या कठिनाई।

पञ्चदशी मन्त्र के अनुसार पराशक्ति के ३ खण्डों का अध्ययन होता है। जिन अक्षरों से आरम्भ होता है उनके नाम पर हादि, कादि, सादि कहते हैं। अरबी में रमजान को रमदान (Ramdhan) या हाजी को हादी (Hadi) लिखते हैं। 

हादि विद्या = हसकहलह्रीं = हाजी

कादि विद्या = कएइलह्रीं = काजी

सादि विद्या = सकलह्रीं = सादी (कवि)

तीनों का मिलन पादि (पराशक्ति) = पाजी



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