युग आदि के आरम्भ

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  • 06 July 2026
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श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )-

३० कल्पों के नाम-वर्तमान श्वेत वाराह कल्प से पूर्व ३० कल्पों के नाम स्कन्द पुराण, खण्ड ७, अध्याय १०५ में हैं-

प्रथमं श्वेतकल्पस्तु द्वितीयो नीललोहितः॥ 

वामदेवस्तृतीयस्तु ततो राथन्तरोऽपरः॥४५॥ 

रौरवः पञ्चमः प्रोक्तः षष्ठः प्राण इति स्मृतः॥ 

सप्तमोऽथ बृहत्कल्पः कन्दर्पोऽष्टम उच्यते॥४६॥ 

सद्योऽथ नवमः प्रोक्तः ईशानो दशमः स्मृतः॥ 

ध्यान एकादशः प्रोक्तस्तथा  सारस्वतोऽपरः॥४७॥ 

त्रयोदश उदानस्तु गरुडोऽथ चतुर्दशः॥ 

कौर्मः पंचदशो ज्ञेयः पौर्णमासी प्रजापतेः॥४८॥

षोडशो नारसिंहस्तु समाधिस्तु ततः परः॥ 

आग्नेयोऽष्टादशः प्रोक्तः सोमकल्पस्ततोऽपरः॥४९॥ 

भावनो विंशतिः प्रोक्तः सुप्तमालीति चापरः॥ 

वैकुण्ठश्चार्चिषो रुद्रो लक्ष्मीकल्पस्तथापरेः॥५०॥ 

सप्तविंशोऽथ वैराजो गौरीकल्पस्तथोंऽऽधकः॥ 

माहेश्वरस्तथा प्रोक्तस्त्रिपुरो यत्र घातितः॥५१॥ 

पितृकल्पस्तथांते च या कुहूर्ब्रह्मणः स्मृता॥ 

त्रिंशत्कल्पाः समाख्याता ब्रह्मणो मासि वै प्रिये॥५२॥ 

अतीताः कथिताः सर्वे वाराहो वर्त्ततेऽधुना॥ 

प्रतिपद्ब्रह्मणो यत्र वाराहेणोद्धृता मही॥५३॥ 

त्रिंशत्कल्पैः स्मृतो मासो वर्षं द्वादशभिस्तु तैः॥ 

स्कन्द पुराण, खण्ड १, अध्याय ५ में युगारम्भ तथा मन्वन्तर आरम्भ की तिथियां दी गयी हैं-

नवमी कार्तिके शुक्ला कृतादिः परिकीर्तिता॥१२१॥

वैशाखस्य तृतीया या शुक्ला त्रेतादिरुच्यते॥

माघे पञ्चदशीनाम द्वापरादिः स्मृता बुधैः॥१२२॥

त्रयोदशी नभस्ये च कृष्णा सा हि कलेः स्मृता॥

युगादयः स्मृता ह्येता दत्तस्याक्षयकारकाः॥१२३॥

युगाद्याः कथिता ह्येता मन्वाद्याः श्रृणु सांप्रतम्॥

अश्वयुक्छुक्लनवमी द्वादशी कार्तिके तथा॥१२५॥

तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च॥

फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौषस्यैकादशी तथा॥१२६॥

आषाढस्यापि दशमी माघमासस्य सप्तमी॥

श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा॥१२७॥

कार्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्येष्ठे पञ्चदशी सिता॥

मन्वंतरादयश्चैता दत्तस्याक्षयकारकाः॥१२८॥

नारद पुराण में भी सत्य, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग की क्रमश: कार्तिक शुक्ल नवमी, वैशाख शुक्ल तृतीया, माघी अमावस्या एवं भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी युगादि तिथियॉं हैं|

कार्तिके शुक्लनवमी चादि: कृतयुगस्य सा। 

त्रेतादिर्माधवे शुक्ला तृतीया पुण्यसम्मिता॥ 

कृष्णा पञ्चदशी माघे द्वापरादिरुदीरिता।

कल्पादिः स्यात्कृष्णपक्षे नभस्ये च त्रयोदशी॥ (१/१५६/१४७-४८)

ज्योतिष ग्रन्थों में वर्ष का आरम्भ चैत्र शुक्ल पक्ष से होता है। कल्प, मन्वन्तर, या युग का आरम्भ अन्य तिथियों से कैसे हो रहा है, यह रहस्य का विषय है। मुख्य कारण लगता है कि बहुत प्राचीन काल में पृथ्वी का अक्ष घूर्णन बहुत तेज था, और आज की गति के अनुसार दिन गणना करने पर कल्प आदि के आरम्भ में उस समय की गणना से चैत्र मास का आरम्भ नहीं हो सकता है। वटेश्वर सिद्धान्त, अध्याय १० में इसकी चर्चा है।

कुछ कल्पों के आरम्भ की तिथियां

क्रमकल्पआरम्भ तिथि
श्वेत वाराहमाघ शुक्ल तृतीया
नीललोहितफाल्गुन कृष्ण तृतीया
वामदेवचैत्र शुक्ल पञ्चमी
गाथान्तरचैत्र कृष्ण पञ्चमी
रौरवमाघ शुक्ल त्रयोदशी
प्राणकार्त्तिक शुक्ल सप्तमी
७ बृहत् कल्पमार्गशीर्ष शुक्ल नवमी

मन्वन्तर की आरम्भ तिथियाँ

क्रममन्वन्तरआरम्भ तिथि
स्वायम्भुवकार्त्तिकशुक्ल द्वादशी
स्वारोचिषआश्विन शुक्ल नवमी
उत्तमचैत्र शुक्ल तृतीया
तामसभाद्रपद शुक्ल तृतीया
रैवतपौष शुक्ल एकादशी
चाक्षुषआषाढ़ शुक्ल दशमी
वैवस्वतमाघ शुक्ल दशमी
सावर्णिभाद्रपद शुक्ल अष्टमी
दक्ष सावर्णिश्रावण अमावास्या
१०ब्रह्म सावर्णिफाल्गुन पूर्णिमा
११धर्म सावर्णिआषाढ़ पूर्णिमा
१२रुद्र सावर्णिकार्त्तिकपूर्णिमा
१३रौच्य सावर्णिचैत्र पूर्णिमा
१४भौत्यक या इन्द्र सावर्णिज्येष्ठ पूर्णिमा

 



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