श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )-
(१) शाश्वत गुण -सनातन धर्म मनुष्य के शाश्वत गुण हैं, जैसे सत्य आचरण, किसी से द्रोह नहीं करना, मन वाणी या कर्म से किसी की हानि नहीं करना आदि। वस्तुतः सत्य शब्द का अर्थ ही है, जिसकी सत्ता सदा बनी रहे। (शतपथ ब्राह्मण, १४/८/६/२)
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥ (मनु स्मृति, ४/१३८)
(२) श्रेय-प्रेय मार्ग-वैवस्वत यम भारत का पश्चिम सीमा (अमरावती से ९० अंश पश्चिम संयमनी = यमन, सना) के राजा थे। उन्होंने कठोपनिषद् में नचिकेता से दोनों का विवेचन किया है-श्रेय (स्थायी या सनातन लाभ) तथा प्रेय (तात्कालिक लाभ या उसका लोभ)।
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श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः। (कठोपनिषद्, १/२/२)
श्रेय मार्ग पर चलनेवाले सनातनी हैं, उनको सम्मान के लिये श्री कहते हैं। जो हमें प्रेय दे सके वह पीर है या दक्षिण भारत में पेरिया।
(३) सनातन पुरुष की उपासना-सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे (गीता, ११/१८) या भूत-भविष्य-वर्त्तमान में सर्वव्यापी-पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भाव्यं (पुरुष सूक्त)। या उसके शब्द रूप वेद की उपासना -भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिद्ध्यति। (मनुस्मृति, १२/९७)।
(४) सनातन या अमृत तत्त्व की उपासना-मृत्योर्मा अमृतं गमय आदि। जो निर्मित होता है वह बुलबुला जैसा क्षणभङ्गुर है, वह मूल स्रोत से मुक्त होता है अतः उसे मुच्यु या परोक्ष में मृत्यु कहा है। उसके बदले मूल स्रोत (समुद्र) की ही निष्ठा।
स समुद्रात् अमुच्यत, स मुच्युः अभवत्, तं वा एतं मुच्युं सन्तं मृत्य्ः इति आचक्षते (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/७)
वेद में इसे केवल सनात् भी कहा है-
सनादेव शीर्यते सनाभिः। (ऋक्, १/१६४/१३, अथर्व, ९/९/११)
अनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि (ऋक्, ८/२१/१३, अथर्व, २०/११४/१, साम, १/३९९, २/७३९),
सनाद् राजभ्यो जुह्वा जुहोमि (ऋक्, २/२७/१, वाज यजु, ३४/५४, काण्व सं, ११/१२, निरुक्त, १२/३६)।
मूल तत्त्व से जो बुद्-बुद् निकलता है उसे द्रप्सः (drops) या स्कन्द (निकलना, गिरना) भी कहा है। आकाशगंगा, तारे, ग्रह-सभी द्रप्सः हैं।
स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, २/१२)
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः (ऋक्, १०/१७/११)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति यस्ते अंशुर्बाहुच्युतो धिषणाया उपस्थात्। (ऋक्, १०/१७/१२)
(५) सनातन यज्ञ-स्वयं यज्ञ द्वारा उत्पादन कर उपभोग करना देवों का कार्य है। इसके विपरीत दूसरों का अपहरण करना असुर वृत्ति है-
यज्ञेनयज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकः महिमानः सचन्तः यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (पुरुष सूक्त, वाज, यजु, ३१/१६)
यज्ञ द्वारा इच्छित वस्तु का उत्पादन होता है-अनेन प्रसविष्यध्वं एष वोऽस्तु इष्टकामधुक् (गीता, ३/१०)।
लूटा माल खत्म हो जाता है पर यज्ञ का चक्र सदा चलता रहता है-एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः (गीता, ३/१६)।
अतः यज्ञ को चलाते रहना सनातन धर्म है। केवल इसका बचा भाग लेना चाहिये जिससे यह चक्र बन्द नहीं हो-
यज्ञशिष्टामृत भुजः (गीता, ४/३१) यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः (गीता, ३/१३)
यज्ञ चक्र द्वारा सभ्यता को सदा चलाते रहना सनातन है। असुरों द्वारा इसी लूट प्रवृत्ति के कारण सनातन धर्म पर सदा खतरा रहता है। इसाई पन्थ में इसे रायल क्विण्टेट (राजा के लिये ५वां भाग) या इस्लाम में इसे माल-ए-गनीमत (लूटी गयी स्त्रियों सम्पत्ति आदि में १/५ भाग खलीफा को) कहते थे।
(६) अमरता-देवों को अमर कहा गया है। तत्त्व रूप में इनके विभिन्न रूप आकाश के विभिन्न भागों में सदा बने रहते हैं। किन्तु मनुष्य रूप में देव अमर नहीं थे। वे भी देव-असुर युद्धों में मरते थे-
निर्जीवं च यमं दृष्ट्वा ततः संत्यज्य दानवः (मत्स्य पुराण, १५०/४९)
ध्रुव ने भी देवयोनि के लाखों यक्षों का वध किया था जब उन्होंने उनके भाई की हत्या कर दी थी (भागवत पुराण, ४/१०/१८-२० आदि)
इन्द्र पद पर भारत के कई राजा रहे हैं, जैसे रजि, नहुष (भागवत पुराण, ९/१८, महाभारत, आदि, ७५/२९ आदि)
अमर होने का एक अर्थ तो यहीं स्पष्ट है कि एक इन्द्र के मरते ही नहुष आदि उनका स्थान लेने के लिए तैयार रहते थे। अमरता का मुख्य अर्थ है, व्यक्ति नष्ट होता है पर उसकी परम्परा चलती रहती है। हर व्यक्ति परम्परा की ३ धाराओं का अंश है जिनको ३ ऋण कहते हैं-देव, ऋषि, पितृ ऋण। मनुष्य अपने पूर्व जन्मों के काम को आगे बढ़ाता है, अपनी वंश परम्परा या काम को आगे बढ़ाता है (सन्तान = सम्यक् प्रकारेण तानयति), या समाज को आगे बढ़ाता है।
समाज रूप में देखें तो उत्पादन की यज्ञ संस्था, शिक्षा संस्था आदि चलती रहती हैं। शिक्षा, धन अर्जन, व्यक्तिगत तप स्वाधाय आदि भी यज्ञ के ही रूप हैं। गीता (४/२४-३२) में ऐसे १४ यज्ञों का वर्णन है। इन सनातन संस्थाओं से सभ्यता चलती रहती है, किसी पैगम्बर द्वारा सभी पूर्व चीजों का विनाश नहीं करते।
(७) आस्तिक-इसका अर्थ अब्राहम पन्थों से प्रायः उलटा है। वहां कहते है कि केवल मेरे पन्थ या भगवान् को मानने वाला ही विश्वासी है, बाकी काफिर है। सनातन धर्म में नास्तिक उसे कहते हैं जो कहता है, न अन्यत् अस्ति = जो मैं कहता हूं वही सही है, अन्य नहीं। जो वेद के केवल एक वाद में रत है और अन्य को गलत कहता है, वह वास्तव में वेद विरोधी और नास्तिक है। यह प्रायः वैसा ही है जैसेकोई कहे कि भौतिक विज्ञान सही है, किन्तु गणित आदि गलत हैं। जो विकल्प देख सकता है, वह विपश्चित् है। जो केवल एक ही मार्ग देखता है, वह अविपश्चित् या मूर्ख है।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥ (गीता, २/४२)
(८) ज्ञान पद्धति-जैसे विज्ञान की शाखायें विषय अनुसार हैं, उसी प्रकार भारत में दर्शन शाखा भी विषय अनुसार हैं, पाश्चात्य परम्परा के व्यक्ति अनुसार नहीं। विश्व को २ प्रकार से देखते हैं-अलग अलग पिण्ड या कण गिने जा सकते हैं, कणों का समूह गण हुआ, उस रूप का ज्ञान गणेश हुआ। जो गिन नहीं सकते वह रस रूप सरस्वती है। इस रूप में दोनों की वन्दना से रामचरितमानस का आरम्भ हुआ है-
वर्णानां अर्थ सङ्घानां रसानां छन्दसां अपि। मङ्गलानां च कर्तारौ, वन्दे वाणी विनायकौ॥
सृष्टि को वेद में २ प्रकार से देखा गया है-(१) पुरुष सिद्धान्त- अलग अलग पुरों का क्रम। मनुष्य से छोटे विश्व के ७ स्तर क्रमशः १-१ लाख भाग छोटे हैं-मनुष्य, कलिल, परमाणु, परमाणु नाभि, जगत् कण, देव-असुर प्राण, पितर, ऋषि। सबसे छोटा ऋषि (रस्सी) है जिसका आकार मीटर का १० घात ३५ भाग होगा (क्वाण्ट मेकानिक्स में प्लांक दूरी)। मनुष्य से आरम्भ कर विश्व के ५ स्तर क्रमशः १-१ कोटि गुणा बड़े हैं-पृथ्वी, सौर मण्डल, ब्रह्माण्ड, अनन्त विश्व का दृश्य भाग-तपः लोक)-विष्णु पुराण (२/७/३-४)।
बड़े विश्व ५ हैं, जिनका परस्पर अनुपात ७ है (१० के घात में), छोटे विश्व ७ हैं जिनका अनुपात ५ है। अतः विश्व १० आयाम का होगा। (२) यह श्री सिद्धान्त है।
यान्त्रिक विश्व ५ आयाम का है जिसमें ५ प्रकार की माप होती है (५ मा छन्द)। इसका सांख्य दर्शन है। उसके बाद चेतना के ५ स्तर हैं, जिनके ५ आयाम हुए-पुरुष (पुर या रचना), ऋषि (२ पिण्डों के बीच आकर्षण विकर्षण के ७ प्रकार के सम्बन्ध), नाग या वृत्र (पिण्ड की सीमा रूप सतह), रन्ध्र या नन्द (घनत्व आदि में कमी जिससे नयी सृष्टि या परिवर्तन होता है), रस या आनन्द (मूल समरूप तत्त्व)।
इन ६ आयामों के अनुसार ६ दर्शन तथा ६ दर्श वाक् (लिपि) हैं। आयाम संख्या के वर्ग के अनुसार दर्शन के तत्त्व या लिपि के अक्षर होंगे।
सांख्य दर्शन- ५ x ५ = २५ तत्त्व, रोमन लिपि के २५ अक्षर।
शैव दर्शन के ६ x ६ = ३६ तत्त्व, लैटिन, गुरुमुखी के ३६ अक्षर।
४९ मरुत् के अनुसार ४९ अक्षर की देवनागरी लिपि
८ x ८ = ६४ कला अनुसार ६४ अक्षर की ब्राह्मी लिपि।
(८+९) के वर्ग अनुसार वेद में ३६ x ३ = १०८ स्वर, ३६ x ५ = १८० व्यञ्जन, १ ॐ।
१० आयाम के अनुसार चीन-जापान में कई हजार अक्षर।
(९) जीवन क्रम-मनुष्य जीवन ज्ञान तथा कर्म से चलता है, अतः २ प्रकार की सनातन निष्ठा कही गयी है।
उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणां गतिः। तथैव ज्ञान कर्माभ्यां जायते परमं पदम्॥
(योगवासिष्ठ, पूर्वार्ध, १/५)
लोकेऽमिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥ (गीता, ३/३)
इनके अभ्यास को तप तथा स्वाध्याय कहते हैं। शरीर तथा मन की क्षमता बढ़ाने के लिए योग के ८ अंग हैं, जिनका वर्णन पतञ्जलि के योग सूत्र में है।
(१०) पर्यावरण-विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के प्राणों को देवता कहा गया है। उनकी उपासना या वृद्धि करने पर वे हमारी वृद्धि करते हैं। देव पूजा का यही उद्देश्य गीता में कहा है-
देवान् भावयतान् एनं, ते देवा भावयन्ति वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयं परमवाप्स्यथ॥ (गीता, ३/१०)
देश के लिए ५ यज्ञ कहे गये हैं-(१) राजसूय-राजस्व संग्रह और प्रजा के लिए उपयोग, (२) अश्वमेध -देश के सञ्चार, यातायात व्यवस्था, (३) चयन-कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का चयन, (४) वाजपेय-देश की उन्नति, (५) शीर्ष-शासक द्वारा नियन्त्रण।
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