वेदार्थबोधक भागवत पुराण

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  • धर्म-पथ
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  • 13 July 2026
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श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )-

१. वेद संहिता-सृष्टि रूप वेद सृष्टि के ५ पर्वों के लिए भिन्न भिन्न है-स्वायम्भुव (पूर्ण विश्व), परमेष्ठी (ब्रह्माण्ड, गैलेक्सी), सौर, चान्द्र एवं भूमण्डल। इनका मूल अव्यक्त ब्रह्म का वेद शून्य वेद कहा गया है। (मनु स्मृति, १२/९७-९९, गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/६) 

शब्द रूप वेद मनुष्य ब्रह्मा स्वायम्भुव मनु ने उपदेश दिया जिनका समय पुराणों के अनुसार व्यास से २६,००० वर्ष पूर्व २९,१०२ ईपू. में था (ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/९/३७, १/२/२९/१९, मत्स्य पुराण, २७३/७६-७७, भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व१/४/२६-२९)। इससे पूर्व भाषा, विज्ञान, तकनीक तथा उत्पादन रूप यज्ञ संस्था का विकास हो चुका था। सभी ज्ञान के समन्वय रूप में ब्रह्मा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को वेद पढ़ाया। इस १ वेद का विभाजन ४ वेद तथा ६ वेदाङ्गों में भरद्वाज ने किया (मुण्डक उपनिषद्, १/१/१-५)। १ मूल अथर्व से ३ शाखायें ऋक्, यजु, साम हुईं, जिनका प्रतीक पलास दण्ड है जिससे ३ पत्ते निकलते हैं, मूल भी बचा रहता है। त्रयी = १ मूल + ३ शाखा वेद।

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वेद कई रूपों में अपौरुषेय है-(१) यह किसी एक व्यक्ति का मत नहीं है, अनेक ऋषियों के ज्ञान का संग्रह है। (२) इसमें ५ ज्ञानेन्द्रियों के अतिरिक्त २ प्रकार के अतीन्द्रिय ज्ञान हैं-परोरजा (रजः = लोक, परोरजा= लोकोत्तर, बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१४/४), असत् ऋषि रूप ज्ञान (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/१)। (३) आधिदैविक (आकाश), आधिभौतिक (पृथ्वी पर) तथा आध्यात्मिक (विश्व प्रतिमा मनुष्य शरीर)-३ स्तरों के ज्ञान का समन्वय। (४) विभिन्न विद्या तथा शास्त्रों का समन्वय या सर्वविद्या प्रतिष्ठा (मुण्डक उप. १/१/१)। 

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स्वायम्भुव मनु से कृष्ण द्वैपायन तक २८ व्यास हुए जिन्होंने अनन्त वेदों को संहिताओं के रूप में सीमित किया (वेदान् विव्यास, परिधि का चक्र अनन्त है, व्यास की सीमित लम्बाई है)। कई संहितायें कृष्ण द्वैपायन या बादरायण व्यास के पूर्व की हैं-आश्वलायन, भरद्वाज, श्वेताश्वतर (रामायण, किष्किन्धा काण्ड, १९/५०)।

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स्वायम्भुव मनु के बाद की संहिताओं को ब्रह्म सम्प्रदाय का कहा गया जिसमें कृष्ण यजुर्वेद की ८६ शाखाओं का विस्तार पुष्कर द्वीप के अतिरिक्त अन्य सभी द्वीपों में था (शतपथ ब्राह्मण भाष्य की पण्डित दीनानाथ चुलेट शास्त्री की भूमिका)। वैवस्वत मनु (१३९०२ ईपू) के पिता विवस्वान् थे जिनके समय आदित्य सम्प्रदाय के अनुसार संहिताओं का विस्तार हुआ। गणित ज्योतिष में भी इन युगों में पितामह तथा सूर्य सिद्धान्त हुए। प्राचीन सिद्धान्त दक्षिण भारत में, तथा नवीन संहितायें उत्तर भारत में प्रचलित हैं। याज्ञवल्क्य ने आदित्य सम्प्रदाय में वाजसनेयि संहिता की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण द्वारा की, इस रूप में इसका उद्धार किया। काण्व संहिता का भी अलग शतपथ ब्राह्मण है, जिसमें अधिक अन्तर नहीं है।



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