श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )-
१. वर्षारम्भ-
वर्षारम्भ लिखने से सन्देह होता है कि यह वर्ष का आरम्भ है, या वर्षा का। कार्त्तिकेय काल में पृथ्वी के उत्तर ध्रुव की दिशा अभिजित् नक्षत्र से दूर हट रही थी जिसे अभिजित् का पतन कहा गया है। तब इन्द्र ने कार्त्तिकेय से कहा कि वह ब्रह्मा से सलाह कर वर्ष आरम्भ का पुनः निर्धारण करें। यह महाभारत, शान्ति पर्व अध्याय ३४८-३४९ में वर्णित सप्तम ब्रह्मा अपान्तरतमा थे जो वाणी-हिरण्यगर्भ के पुत्र थे और गौतमी तट पर रहते थे। उसके बाद अभिजित् के बदले धनिष्ठा नक्षत्र से वर्ष आरम्भ हुआ। उस समय (प्रायः १५,८०० ईपू) धनिष्ठा से वर्षा आरम्भ होती थी।
अभिजित् स्पर्धमाना तु रोहिण्या अनुजा स्वसा।
इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता॥८॥
तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्युतम्।
कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय॥९॥
धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः।
रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत्॥१०॥
(महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)
२. वर्षा का आरम्भ-
प्रायः आषाढ़ मास से वर्षा का आरम्भ होता है, तथा उसी समय खेती का आरम्भ होता है। भारत के पूर्व और उत्तर भागों में कुछ पहले वर्षा आरम्भ होती है। आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य के प्रवेश से बिहार में कृषि का आरम्भ होता है। उस अवसर पर पूजा कर विशेष प्रकार के स्थानीय व्यञ्जन जैसे दाल-पूड़ी, खीर, तथा मौसमी फल आम आदि का सेवन किया जाता है।
प्रायः इसी समय असम (अहोम) के नीलाचल शिखर पर स्थित कामाख्या देवी का अम्बुवाची (अम्बु = जल, अम्बा = माता) उत्सव होता है। गर्भ धारण के पूर्व स्त्रियों का मासिक धर्म होता है, जब उनका अन्य से सम्पर्क नहीं होता। यह पृथ्वी द्वारा अन्न प्रजनन का आरम्भ है, अतः कामाख्या देवी का भी ३ दिन मासिक स्थिति में मन्दिर बन्द होता है। इस समय नियमित वर्षा का आरम्भ होता है, अतः सूर्य के नक्षत्र को आर्द्रा (आर्द्र = भींगा हुआ) नाम दिया गया है।
आर्द्रता के कारण संक्रामक रोग होते हैं। अतः वर्षा के २ मुख्य मासों श्रावण तथा भाद्रपद (सावन-भादो) में साग तथा दही खाना वर्जित है। ज्वर से सावधान करने के लिए जगन्नाथ भी मनुष्य लीला करते है। ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को देवस्नान पञ्चमी होती है जिस समय सूर्य प्रायः आर्द्रा नक्षत्र में होता है। उस दिन जगन्नाथ १०८ घड़े जल से स्नान करते हैं और अधिक स्नान के कारण बीमार हो जाते हैं। जगन्नाथ परब्रह्म हैं, उनको स्नान की आवश्यकता नहीं है, न वे बीमार होते हैं। यह मनुष्य को शिक्षा देने के लिए लीला है। उनका स्नान भी गज-स्नान की तरह निरर्थक है। गज (हाथी) स्नान के बाद अपने शरीर पर धूल फेंकता है, तथा पुनः मलिन होता है। अपने स्नान को निरर्थक दिखाने के लिए जगन्नाथ गज वेष धारण करते हैं।
जगन्नाथ तथा कामाख्या (काली) एक ही परम तत्त्व के २ रूप हैं। सृष्टि के लिए परब्रह्म ने अपने को २ रूपों में विभक्त किया था जिनको सांख्य दर्शन में पुरुष-प्रकृति कहा गया है। वेद में प्रकृति को श्री कहा है। चण्डी पाठ के महाकाली चरित्र में विष्णु का वर्णन है। वे जबतक योगनिद्रा में सोये रहते हैं, उनको विष्णु कहा गया है। योगनिद्रा से उठने के बाद उनको जगन्नाथ कहा गया है।
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवी कृते (१/६६) निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः। (१/७१)
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥९१॥ (चण्डी पाठ, अध्याय १)
जब भगवती निद्रा रूप थीं, वे वाम थीं। निद्रा त्याग कर जगन्नाथ की क्रिया रूप में आयीं, तो दक्षिणा-काली हो गयीं। यह महाकाली चरित्र का वर्णन है। अतः जगन्नाथ को दक्षिणाकाली का रूप भी कहते हैं। इसी प्रकार शिव का ज्ञान रूप दक्षिणामूर्ति है। काली का प्रतीक नीम का पेड़ है। यह जीवाणु नाशक रूप में रक्तबीज का संहार करता है। इसी पेड़ की लकड़ी से जगन्नाथ मूर्ति बनती है।
३. स्थान तथा रूप-
पुरुष चेतन तत्त्व है, यह अव्यक्त या पुर रूप है। क्रिया या क्षेत्र रूप प्रकृति है। विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है, जिसने पृथ्वी को अपने आकर्षण से धारण किया है।
पृथिवी त्वया धृता लोका, देवि त्वं विष्णुना धृता (भूमि पूजन मन्त्र)
विष्णुना विधृते भूमी (तैत्तिरीय आरण्यक, १/८/२)
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीम् (ऋक्, खिल, ५/८७/२४)
विष्णु आकर्षक रूप है, उससे तेज का विकिरण इन्द्र रूप है। दोनों के मिलन से सौर मण्डल के ३ क्षेत्र बनते हैं, जिनको ३ साहस्री कहा गया है-
उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे, न पराजिज्ञे कतरश्च नैनोः।
इन्द्रश्च विष्णू यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्॥ (ऋक्, ६/६९/८)
किं तत् सहस्रमिति? इमे लोकाः, इमे वेदाः, अथो वागिति ब्रूयात्। (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/१४)
पृथ्वी (लोक) तक प्रथम पद, यजुर्वेद आरम्भ में उद्धृत वायवस्थ ऊर्जा क्षेत्र यूरेनस तक द्वितीय पद, तथा सूर्य के प्रभाव क्षेत्र (वाक्) तक तृतीय पद है।
विष्णु के आकर्षण से आकाश गंगा का पदार्थ आ रहा है, सूर्य रूपी नेत्र से इन्द्र रूपी ऊर्जा निकल रही है, दोनों के मिलन से पृथ्वी पर जीवन की सृष्टि हो रही है।
अथ नयन समुत्थं ज्योतिरत्रेरिव द्यौः, सुरसरिदिव तेजो वह्नि निष्ठ्यूतमैशम् (रघुवंश, २/७५)
जीवन निर्माता तथा उसके विकास आदि कर्ता जगन्नाथ रूप है। यह ब्रह्म की परिभाषा भी कही गयी है-जन्माद्यस्य यतः (ब्रह्म सूत्र, १/१/२)
सौर मण्डल का क्षेत्र काली रूप है, उसके खाली स्थान का विरल पदार्थ नहीं दीखता है। अदृश्य निष्क्रिय रूप वाम काली, दृश्य क्रिया रूप दक्षिणा काली है।
जगन्नाथ हृदय में रह कर सञ्चालन करते हैं। शक्ति पीठ रूप में पुरी हृदय स्थान है, अतः पुरी में जगन्नाथ मन्दिर है। योनि स्थान कामाख्या है, अतः वह महाकाली निवास है। अधोमुख त्रिकोण रूप में भारतीय प्रायद्वीप शक्ति त्रिकोण है। इसके पूर्वोत्तर कोण पर महाकाली रूप, दक्षिण कोण पर महासरस्वती रूप (शारदा पीठ), तथा पश्चिमोत्तर कोण में महालक्ष्मी पीठ (सिन्धु तनया, वैष्णो देवी) हैं।
पूर्व क्षितिज उदयाचल, पश्चिम क्षितिज अस्ताचल, उनके बीच सम्पूर्ण नीला आकाश नीलाचल है। विश्व रूप होने के कारण कामाख्या-काली तथा जगन्नाथ-दोनों का निवास नीलाचल है।
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