भागवत तत्त्व

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  • धर्म-पथ
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  • 14 July 2026
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श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )- अनन्त वेद राशि का उद्देश्य है, ब्रह्म का ज्ञान जो भागवत तत्त्व है। इसका प्रथम उपदेश ब्रह्मा के ४ पुत्रों सनक, सनन्दन, सनत्कुमारया सनत्सुजात तथा सनातन ने किया है। ये नित्य कुमार हैं, तथा कुमार सर्ग की ज्ञान रूप सृष्टि हैं। प्रलय काल के बाद ये विष्णु को भी बोध कराते हैं (भागवत पुराण, १०/८७/१२)। ज्ञान के ४ क्रमों की तरह ४ वेद, विद धातु के ४ अर्थ, तथा ४ वेद हैं। मूर्ति रूप ऋग्वेद की सत्ता ज्ञान का प्रथम रूप है। उससे किसी प्रभाव का हम तक पहुंचना गति रूप यजुर्वेद है। उसकी महिमा का क्षेत्र साम वेद है। उसमें रहने पर ही ज्ञान हो सकता है। 

ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः, सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत्।

सर्वं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्, सर्वं हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम्॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१२/८/१)

वेदानां सामवेदोऽस्मि (गीता, १०/२२)

तत्त्व    वेद  विद धातु का अर्थ 

मूर्ति  ऋक्  सत्ता (विद् सत्तायाम्, धातुपाठ, ४/६०)

गति  यजु   लाभ, प्राप्ति-विद्लृ लाभे (६/१४१)

ज्ञान  साम विद् ज्ञाने (२/५७)

आधार  अथर्व विद् विचारणे (७/१३), चेतनाख्यान निवासेषु (१०/१७७) 

नित्य ज्ञान के ४ रूपों के मूर्तिमान् रूप ४ सनत्कुमार हैं। सनत्कुमार द्वारा ज्ञान- विरोचन (कूर्म, १/१७/१), संवर्त्त (कूर्म, २/११/१२६), शुकदेव (नारद, १/६०/३९+), नारद (नारद, १/६३+, १/४२, छान्दोग्य उपनिषद्, ७/१२), पृथु (भागवत, ४/२२), व्यास (शिव पुराण, ५/५)।

सामान्य मनुष्य (स्त्री-शुद्र-द्विजबन्धु) वेद नहीं समझ सकते, आज भी वहुत कम लोग वेद पढ़ते हैं, क्योंकि वह कठिन है, और उससे कोई आर्थिक लाभ नहीं है। सामान्य लोगों को वेद स्पष्ट करने के लिए महाभारत नामक इतिहास ग्रन्थ कृष्ण द्वैपायन ने लिखा। किन्तु वेद की पूर्णता ब्रह्म कि समझने में है, जिसे भागवत तत्त्व कहा गया है। इससे व्यास जी खिन्न थे तब ब्रह्मा के पुत्र नारद जी ने उनको भागवत तत्त्व की व्याख्या के लिए कहा।

स्त्री-शूद्र द्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा। कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय र्वं भवेदिह।

इति भारत माख्यानं कृपया मुनिना कृतम्॥२५॥

एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः। सर्वात्मके नापि यदा नातुष्यद् हृदयं ततः॥२६॥

भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः। दृश्यते यत्र धर्मादि स्त्रीशूद्रादिभिरप्युत॥२९॥

किंवा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः। प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः॥३१॥

(भागवत पुराण, अध्याय १/४) 

= स्त्री, शूद्र या कोई द्विजाति कितने भी गुणी हों उनके लिए वेद समझना कठिन है, अतः वे शास्त्रों का पालन नहीं कर पाते। अतः उनकी सुविधा के लिए महाभारत लिखा। (२५) व्यास जी सदा सबके कल्याण में लगे रहते थे, किन्तु इससे उनके हृदय को सन्तोष नहीं हुआ। (२६) (महा-)भारत के उदाहरणों से शास्त्रों का अर्थ स्पष्ट किया, जिससे सभी सामान्य लोग धर्म का पालन कर सकें। (२९) किन्तु इनमें भागवत धर्म का निरूपण नहीं है, जो परमहंसों एवं अच्युत (ब्रह्म) को भी प्रिय है। (३१)

महाभारत में भी वेद के लिए इतिहास पुराण को आवश्यक कहा है। बिना वास्तविक उदाहरण के किसी सिद्धान्त की व्याख्या सम्भव नहीं है।

इतिहास पुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्॥२६७॥ बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति।

(महाभारत, आदि पर्व, १/२६७-२६८) 

भगवद्दत्त जी ने भारतवर्ष का बृहत् इतिहास, खण्ड, १, पृष्ठ १८५ पर लिखा है-

पं. विश्वबन्धु जी की भूल- वैदिक पदानुक्रम कोष में विश्वबन्धु जी ने तैत्तिरीय ब्राह्मण के असुर सन्तान कायाधव प्रह्लाद का अर्थ कयाधु का पुत्र लिखा है। पुराण न जानने से ही विश्वबन्धु जी ने यह भूल की है। भागवत पुराण में लिखा है- हिरण्यकशिपोर्भार्या कयाधूर्नाम दानवी (६/१८/१२)



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