श्री शशांक शेखर शुल्ब ( ज्योतिषाचार्य )-
✓•भूमिका: वैदिक ज्योतिष में मंगल ग्रह को “भौम”, “कुज”, “अंगारक” आदि नामों से संबोधित किया गया है। इसका स्वभाव अग्नितत्त्व प्रधान, तेजस्वी, उग्र, कठोर तथा क्रूरग्रहों में माना गया है। विवाह, दाम्पत्य-सुख, शारीरिक सामंजस्य, गृह-शांति तथा स्थायित्व पर मंगल की स्थिति का विशेष प्रभाव माना गया है। जब कुंडली में मंगल कुछ विशिष्ट भावों में स्थित होता है, तब “कुजदोष” या “मांगलिक दोष” कहा जाता है। यह दोष दाम्पत्य-जीवन में कलह, असामंजस्य, स्वास्थ्य-विघ्न, वैवाहिक-विलंब और कभी–कभी वैवाहिक-अस्थिरता तक का कारण माना जाता है।
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परंतु ज्योतिष-शास्त्र केवल दोष-निर्धारण तक सीमित नहीं है; शास्त्र इस दोष के क्षय, शमन तथा नाश के सिद्धांतों को भी स्पष्ट करते हैं। इस शोधप्रबंध में यह मुख्य प्रश्न है: कुजदोष कब पूर्णतः नष्ट हो जाता है? इसका उत्तर कई आयामों—भावस्थिति, दृष्टि, युति, बल, दशा, वय, तथा शुभ-संयोग—के अंतर्गत प्राप्त होता है।
✓•१. कुजदोष की शास्त्रीय परिभाषा:
बृहत्-पाराशर-होरा-शास्त्र, बृहत्-जैमिनि, केरल-ज्योतिष-परंपरा तथा दक्षिण-भारतीय विवाह-पद्धति में मंगलदोष के लिए सामान्यतः मंगल की स्थिति निम्नलिखित भावों में मानी गई है—
•१. लग्न सेः १, ४, ७, ८, १२
•२. चंद्र सेः १, ४, ७, ८, १२
•३. शुक्र सेः १, ४, ७, ८, १२ (कुछ परंपराएँ)
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इन स्थितियों में मंगल का उग्र अग्नितत्त्व विवाह-भाव को प्रतिकूल प्रभावित करता है।
परन्तु शास्त्र स्वयं यह भी बताते हैं कि अनेक स्थितियों में यह दोष घट जाता है या पूर्णतः नष्ट हो जाता है।
✓•२. कुजदोष के नाश के शास्त्रीय आधार:
✓•(क) भाव-सिद्धांतानुसार:
कुजदोष केवल तभी प्रभावी माना जाता है जब मंगल उस भाव में पीड़ाकारक रूप से स्थित हो। कई मतानुसार—
•१. मेष और वृश्चिक लग्न के जातक:
पाराशर-मत के अनुसार मंगल इन दोनों लग्नों का स्वामी है, अतः
“स्वलग्नेशो भौमः कुजदोषं न करोति।”
अर्थात् स्वलग्नेश होने से मंगल दोषकारी नहीं रहता।
अतः मेष व वृश्चिक लग्न वालों में कुजदोष अधिकांशतः नष्ट माना गया है।
•२. स्वक्षेत्र, उच्च, या मित्रक्षेत्र का मंगल:
बृहत्-पाराशर-होरा में वर्णित है—
“स्वोच्चस्थोऽपि पापोऽन्नर्थं न कुर्यात्।”
अर्थात स्व, उच्च या बलवान पापग्रह दोष नहीं देता।
अतः स्वगृहीय (मेष/वृश्चिक), उच्च (मकर), या मित्रराशि का मंगल दोषहीन हो जाता है।
•३. दृष्टि से शमन:
गुरु की पंचम/नवम दृष्टि मंगलदोष को नष्ट कर देती है।
“गुरुदृष्ट्या पापहानीः” – ज्योतिषार्णव
अतः यदि कुजदोषयुक्त मंगल पर गुरु की शुभ-दृष्टि हो, दोष समाप्त माना जाता है।
•४. चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्वादश भाव में शुभग्रह की स्थिति:
यदि इन भावों का स्वामी बलवान हो या शुभग्रह इन भावों में स्थित हों, तो मंगलदोष भंग हो जाता है।
✓•३. युति और दृष्टि से कुजदोष-भंग:
✓•(क) गुरु-मंगल युति:
गुरु मंगल की उग्रता को कम करता है।
“गुरौ समागते पापानां शमनं भवति।”
अतः गुरु-मंगल युति से कुजदोष पूर्णतः समाप्त।
✓•(ख) चंद्र-मंगल युति (लक्ष्मी योग का रूप):
यदि चंद्रबलवान हो, तो यह योग धन-वृद्धिकर मानकर मंगलदोष नष्ट होता है।
केवल चंद्र कमजोर हो तो कुजदोष बढ़ भी सकता है।
✓•(ग) शुक्र की दृष्टि:
विवाह-कारक शुक्र मंगल की उग्रता को मध्यम करता है।
“शुक्रेण दृष्टः कुजोऽपि सौम्यत्वं याति।” – प्राचीन केरल मत
इससे विवाह-संबंधी दोष शिथिल या नष्ट हो जाता है।
✓•४. कुंडली-समग्र विश्लेषण से कुजदोष का शमन:
✓•(क) लग्नबल से नाश:
यदि लग्नेश अत्यंत बलवान हो, तो पापग्रह दोष नहीं दे पाते।
लग्नबल ≥ १० रश्मियाँ (सूर्यसिद्धान्तीय बल) होने पर मंगलदोष व्यर्थ माना गया है।
✓•(ख) नवांश विश्लेषण:
नवांश में मंगल शुभस्थान में हो, गुरु/शुक्र की दृष्टि हो या वैवाहिक भाव (७वा नवांश) शुभ हो, तो जन्म कुंडली का कुजदोष प्रभावहीन हो जाता है।
✓•(ग) दशा-वलय:
मंगलदोष का परिणाम मुख्यतः मंगल की महादशा/अंतर्दशा में तीव्र होता है।
इसलिए शास्त्रकार कहते हैं—
“कालबलो हि ग्रहफलकर्ता।”
अतः यदि विवाह के समय मंगल महादशा न हो, तो मंगलदोष का प्रभाव नष्ट समान होता है।
✓•५. आयु-आधारित कुजदोष-नाश:
यह अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है, और कई ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है—
✓•१. २८ वर्ष के बाद कुजदोष लगभग नष्ट
प्राचीन दक्षिण-भारतीय ज्योतिष-परंपरा (कुंडली-परिग्रह-सूत्र) के अनुसार—
“भौमस्य दशविंशतिपर्यन्तं दारुणत्वं, ततः शमनम्।”
अनेकों प्रख्यात आचार्य कहते हैं कि २८वें वर्ष के बाद मंगल-प्रभाव कम हो जाता है क्योंकि
– मंगल अपनी परिपक्व आयु (२८) प्राप्त कर लेता है,
– उग्रत्व कम होकर स्थायित्व बढ़ता है।
✓•२. कहीं-कहीं ३० वर्ष का मत
कुछ ग्रंथ ३० वर्ष के बाद मंगलदोष की समाप्ति का उल्लेख करते हैं।
परंतु २८ वर्ष का सिद्धांत अधिक प्रामाणिक और व्यापक है।
अतः निष्कर्ष: २८ वर्ष के बाद कुजदोष लगभग पूर्णतः नष्ट या अप्रभावी हो जाता है।
✓•६. दोनों पक्षों में कुजदोष होने पर:
शास्त्रों में कहा गया है:
“समानदोषे दोषो न भवति।”
यदि वर और वधू दोनों ही मांगलिक हों, तो दोष आपस में कट जाता है, क्योंकि—
•१. दोनों कुंडलियों का अग्नितत्त्व संतुलन प्राप्त करता है।
•२. मंगल ऊर्जा का पारस्परिक प्रतिरोध कम हो जाता है।
अतः यह स्थिति कुजदोष-नाश की पूर्ण स्थिति मानी गई है।
✓•७. कुछ विशिष्ट कुजदोष-भंग स्थितियाँ:
•१. मंगल २रे भाव में हो – कई ग्रंथ इस भाव को दोष-मुक्त मानते हैं।
•२. मंगल अस्त/नीच/अशक्त हो – अशक्त मंगल हानि नहीं करता।
•३. वृषभ व कन्या लग्न में १२वाँ मंगल दोष नहीं देता।
•४. कन्या लग्न में ७वाँ मंगल शास्त्रीय रूप से दोषहीन।
•५. केन्द्र/त्रिकोण में शुभग्रह अधिक हों – मंगलदोष शमन।
•६. उपपद/दारा-कारक बलवान – दाम्पत्य बाधा नहीं होती।
इन सभी स्थितियों में कुजदोष पूर्णतः नष्ट माने जाने का प्रावधान है।
✓•८. शास्त्रीय प्रमाण-संग्रह:
•१. बृहत्-पाराशर-होरा-शास्त्र:
– पापग्रह का स्व/उच्च में होने पर दोष न देने का सिद्धांत।
– शुभदृष्टि से पापफल-शमन का प्रावधान।
•२. जैमिनि सूत्र:
– द्रष्टा-बल एवं कारक-बल से दोष-नाश का सिद्धांत।
•३. ज्योतिषार्णव नवनीत:
– गुरु-दृष्टि से पापशमन।
– वय-आधारित मंगल-शमन।
•४. प्रश्नमार्ग (केरल-परंपरा):
– मंगल दोष पर शुक्र/गुरु प्रभाव से शमन।
•५. वाराहमिहिर नीतिप्रकरण:
– ग्रहों के बल से फल-निर्णय, पापफल के शमन-सूत्र।
इन सभी ग्रंथों से यह सिद्धान्त पुष्ट होता है कि मंगलदोष एक स्थायी या अटल दोष नहीं, बल्कि अनेक स्थितियों में पूर्णतः नष्ट या अप्रभावी हो जाता है।
✓•९. निष्कर्ष: कुजदोष कब पूर्णतः नष्ट होता है?
शास्त्रीय विश्लेषण के आधार पर कुजदोष निम्न स्थितियों में पूर्णतः समाप्त माना जाता है—
•१. मेष या वृश्चिक लग्न की कुंडली।
•२. मंगल का स्वक्षेत्र, उच्च या मित्रराशि में होना।
•३. गुरु की दृष्टि/युति से मंगल का शमन।
•४. शुक्र की दृष्टि से वैवाहिक-दोष का नाश।
•५. नवांश में मंगल शुभ स्थिति में हो।
•६. लग्नेश बलवान हो (लग्नबल ≥ १० रश्मियाँ)।
•७. २८ वर्ष के बाद (मंगल की परिपक्व आयु)।
•८. दोनों पक्षों में समान कुजदोष होने पर।
•९. मंगल अशक्त हो—अस्त, नीच, पीड़ा, पाप-युत।
•१०. विवाहकाल में मंगल दशा न चल रही हो।
इन सभी में कुजदोष केवल आंशिक रूप से नहीं, बल्कि पूर्णतः नष्ट माना जाता है। अतः शास्त्रों के आधार पर यह निष्कर्ष दृढ़ है कि मंगलदोष कोई अनिवार्य और अटल बाधा नहीं, बल्कि ग्रहबल, दृष्टि, युति, दशा, वय तथा योगों के अनुसार स्वयं ही शिथिल अथवा समाप्त हो जाने वाला दोष है।
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