श्री शशांक शेखर शुल्ब ( ज्योतिषाचार्य )-
✓•१. प्रस्तावना: वैदिक परम्परा में पुरोहित वह विशेष कर्ता माना गया है जो यज्ञ, अनुष्ठान एवं वैदिक कर्मों में अग्रस्थ होकर देवताओं और यजमान के मध्य सूक्ष्म सेतु की भूमिका निभाता है। ऋग्वेद की प्रथम ऋचा में ही अग्नि को पुरोहित कहा गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि ‘पुरोहित’ का पद वैदिक संस्कारों और यज्ञीय विधानों में अत्यधिक मूलभूत है। सायणाचार्य इस शब्द को यज्ञानुष्ठान के पूर्वभाग में ‘हितम् अवस्थितम्’ अर्थात् जो पहले स्थापित किया जाए—इस अर्थ में ग्रहण करते हैं।
पुरोहित वि. पुरस्-हित - सामने रक्खा हुआ [१]पुरोहित वि. पुरस्-हित - "नियुक्त, दूत, आयुक्त" [२]पुरोहितः पुं. पुरस्-हितः - "कार्यभार संभालने वाला, अभिकर्ता, दूत" [३]पुरोहितः पुं. पुरस्-हितः - "कुलपुरोहित, जो कुल में होने वाले सभी कर्मकाण्ड या संस्कारों का संचालन करता है"
आधुनिक पारिभाषिक परिभाषाओं से परे, यह आवश्यक है कि हम पुरोहित शब्द के शाब्दिक, व्याकरणिक, निरुक्तीय, एवं वैदिक आयामों का विश्लेषण शास्त्रीय प्रमाण सहित प्रस्तुत करें।
✓•२. पुरोहित शब्द का व्युत्पत्तिशास्त्रीय विश्लेषण:
✓•२.१ धातु-विश्लेषण
पुरोहित = पुरः + हित
✓•१. पुरः
पूर्वभागे (अग्रे, in front)
निरुक्त (१.१२): पुरः = अग्रे, प्रधानभागे
व्याकरणिक दृष्टि: पुरस् शब्द का अव्ययीभाव रूप पुरः प्रायः उपसर्गवत् प्रयोक्तव्यः।
✓•२. हित
धा + क्त (धा – धातु: धारण, स्थापने)
क्त प्रत्यय से हित = स्थापित, स्थित, नियोजित।
निरुक्त (७.१०): हितम् = स्थाप्यं, नियोजितम्, यज्ञे पूर्वं स्थाप्यते इति।
अतः पुरोहित = पुरः स्थापितः, अर्थात् यज्ञ कार्य में सबसे पहले नियोजित, स्थापित किया जाने वाला कर्ता।
•सायणाचार्य की परिभाषा:
पुरोभागे हितम्—यज्ञे पूर्वं आहितम्, नियुक्तम्।
इससे सिद्ध होता है कि पुरोहित वह है जो यज्ञ के प्रारम्भ होने से पहले पदार्पित एवं प्रतिष्ठित किया जाता है।
✓•३. निरुक्त शास्त्र के अनुसार ‘पुरोहित’:
यास्काचार्य (निरुक्त ७.१०–१२) पुरोहित की दो मुख्य व्याख्याएँ देते हैं—
•१. यस्यां पुरस्तात् हितम्—जो अग्रभाग में स्थापित हो।
•२. यः पुरः हिनोति, प्रेरयति—जो यज्ञ को आगे बढ़ाता है, क्रिया को प्रवाहित करता है।
निरुक्त में अग्नि को पुरोहित कहने का मुख्य कारण यह माना गया है कि—
अग्नि देवताओं में प्रथम प्रतिष्ठित होता है।
वही देवताओं को आहुतियाँ वहन करता है।
वह यज्ञ का प्रवर्तक है।
निरुक्त (१.१८) में यास्कः स्पष्ट कहते हैं:
“अग्निः पुरोहितः—अग्रे हितः, अग्रे स्थाप्यते।”
अर्थात् जिस प्रकार पुरोहित अनुष्ठान का प्रथम अधिकारी है, उसी प्रकार अग्नि यज्ञ का प्रथम देवता है।
✓•४. व्याकरण शास्त्र के अनुसार संरचना:
✓•१. समास:
•पुरः + हित = तत्पुरुष समास
•विग्रह: पुरसि हितः या पुरः स्थापितः
•अर्थ: यः यज्ञस्य अग्रे स्थाप्यते।
✓•२. कर्तृत्व-धर्म:
यह शब्द भावप्रवचन है—कर्ता के गुण का बोध कराता है।
पुरोहित किसी आचार्य का ‘नाम’ नहीं, बल्कि एक ‘कार्य-पद’ है।
✓•३. उपसर्गीय सम्बन्ध:
पुरः यहाँ उपसर्गवत् प्रयुक्त है, जो क्रिया-धर्म को अग्रस्थता प्रदान करता है।
✓•५. वेदों में पुरोहित की अवधारणा:
✓•५.१ ऋग्वेद का प्रथम मन्त्र: ‘अग्निमीळे पुरोहितम्’
ऋग्वेद १.१.१:
“अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्।
होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥”
•सायणभाष्य:
•अग्निम्—यज्ञादौ पूर्वं स्थापनीयत्वात् पुरोहितम्।
•पुरोहितम्—पुरोभागे हितम्, आहितम्।
•ऋत्विजम्—कर्मानुकूल काल में यजमान के लिए यज्ञकर्म करने वाला।
•देवम्—प्रकाशकत्वात्, द्यूतमानत्वात्।
•सायण आचार्य स्पष्ट करते हैं कि अग्नि ही ‘पुरोहित’ है क्योंकि यज्ञ के प्रारम्भ में सबसे पहले अग्नि की स्थापना होती है।
✓•५.२ यजुर्वेद:
वाजसनेयी संहिता (१.१):
“अग्निं दूतं पुरोधाम्…”
यहाँ पुरोधा भी पुरोहित का पर्याय है।
यजुर्वैदिक आचार्य ‘पुरोधा’ शब्द को ‘यज्ञ-प्रवर्तक’ तथा ‘यजमान का प्रतिनिधि’ कहते हैं।
✓•५.३ सामवेद:
सामवेद के अनेक मन्त्रों में अग्नि को पुरोद्धा और ऋत्विज् कहा गया है, जैसे—
“अग्निर्होता नो अध्वर्युः।”
यहाँ अग्नि ही ‘होता’ कार्य करता है, जो सामान्यतः पुरोहित का ही कार्य है।
५.४ अथर्ववेद
अथर्ववेद :
“अग्निर्होता पुरोहितः।”
यह मन्त्र अप्रत्यक्ष रूप से पुष्टि करता है कि वैदिक परम्परा में पुरोहित का श्रेष्ठतम रूप अग्नि है।
✓•६. ‘अग्नि पुरोहित’ क्यों? वैदिक तर्क:
✓•१. यज्ञ का प्रथम अनिवार्य घटक:
यज्ञ कर्मों में अग्नि की स्थापना अनिवार्य है। अग्निप्रतिष्ठा के बिना कोई वैदिक कर्म प्रारम्भ नहीं हो सकता।
✓•२. देवताओं का दूत:
“अग्निर्दूतः”—अग्नि देवताओं तक हवि पहुँचाता है।
जैसे मानव पुरोहित यजमान और देवताओं के बीच सेतु है, वैसे ही सूक्ष्म स्तर पर अग्नि वह कार्य करता है।
✓•३. ऋत्विज् पद:
ऋग्वेद में अग्नि को ऋत्विज् (कालज्ञ) कहा गया है। प्रत्येक काल (ऋतु) में होने वाले यज्ञों का वह साक्षी और कर्ता है।
✓•४. यज्ञ का प्रवर्तक:
निरुक्त (७.१२):
“यज्ञस्य प्रवर्तकः अग्निः।”
अतः जो प्रवर्तक है, वही पुरोहितत्व का अधिकारी है।
✓•५. वेदों में पुरोहित की सात भूमिकाएँ
वेद ब्राह्मण ग्रन्थों में पुरोहित के निम्न कर्तव्य बताए गए हैं—
•१. देवताओं को आह्वान
•२. मंत्रपाठ
•३. यजमान का अनुगमन
•४. दोषनिवारण
•५. संयोजन एवं उपविष्ट-विनियोग
•६. देव-यजमान समन्वय
•७. फल-संकल्प
अग्नि इन सभी को सूक्ष्म स्तर पर पूरा करता है।
✓•७. स्मृति-पुराण प्रमाण:
✓•७.१ मनुस्मृति (२.१४३)
“पुरोहितं प्रधानं व्रजेत्।”
याज्ञिक कार्यों में पुरोहित प्रधान है; उसके बिना कर्म निष्पादित नहीं।
✓•७.२ शतपथ ब्राह्मण:
“अग्निः पुरोहितः—यज्ञस्य मुख्योऽग्निरेव।”
ब्राह्मणकालीन व्याख्या सायण की उक्ति को शास्त्रीय आधार देती है।
✓•७.३ तैत्तिरीय संहिता:
“अग्निं यज्ञस्य मुखम्।”
पुरोहित को भी यज्ञ का ‘मुख’ माना जाता है; अतः दोनों का कार्य एवं पद समान।
✓•८. सायणाचार्य द्वारा पुरोहित अवधारणा की दार्शनिक व्याख्या:
सायणाचार्य कहते हैं कि—
वैदिक कर्म ‘पूर्व’ से ‘पर’ की ओर प्रवाह है।
यज्ञ का ‘प्रारम्भ-बिंदु’ ही समस्त कर्म का आधार है।
जो उस प्रारम्भ-बिंदु पर स्थित है, वही पुरोहित है।
अग्नि ‘दृश्य’ और ‘अदृश्य’—दोनों स्तरों पर—
यज्ञ को प्रारम्भ करता है,
देवताओं को प्रसन्न करता है,
यजमान के संकल्प को वहन करता है।
अतः अग्नि के बिना यज्ञ नहीं; और पुरोहित के बिना यज्ञ नहीं—दोनों का परस्पर सम्बन्ध शास्त्रों में अविनाभाव है।
✓•९. क्या बिना पुरोहित के यज्ञ सम्भव है? शास्त्र की दृष्टि:
वेद, ब्राह्मण तथा धर्मसूत्रों के स्पष्ट निर्देश हैं—
•१. पुरोहितवर्जितं कर्म निषिद्धम्।
•२. अग्निस्थापनवर्जितं कर्म निष्फलम्।
•३. यजमान स्वयं कर्ता हो सकता है, परन्तु पुरोहित-स्थापन अनिवार्य है।
•अर्थात् पुरोहित ‘पद’ है—व्यक्ति नहीं। यजमान स्वयं भी पुरोहित-कर्तव्य कर सकता है, यदि वह विद्वान हो। परन्तु कर्म में पुरोहित का ‘तत्त्व’ आवश्यक है।
✓•१०. निष्कर्ष:
•१. पुरोहित शब्द व्याकरणिक और निरुक्तीय दृष्टि से पुरः (अग्रे) + हित (स्थापित) से बना है—अर्थात् वह जो यज्ञ के अग्रभाग में स्थापित हो।
•२. वेदों में पुरोहित का सर्वोच्च रूप अग्नि है, जैसा कि ऋग्वेद १.१.१ स्पष्ट करता है।
•३. सायणाचार्य ने इसे—पूर्वभागे स्थितम्, यज्ञे प्रथमम् आहितम्—इस प्रकार परिभाषित किया है।
•४. निरुक्त और व्याकरण शास्त्र दोनों यह सिद्ध करते हैं कि पुरोहित का कार्य ‘प्रवर्तन’, ‘संयोजन’, तथा ‘स्थापन’ है।
•५. स्मृतियों और ब्राह्मण ग्रन्थों में यह प्रमाणित है कि पुरोहित के बिना कोई भी वैदिक कर्म पूर्ण नहीं हो सकता।
•६. अग्नि को पुरोहित कहने का तात्त्विक अर्थ यह है कि अग्नि यज्ञ का प्रथम, सर्वोच्च एवं अनिवार्य अंग है—देवताओं का दूत और यजमान का सहचरी।
इस प्रकार वैदिक परम्परा में ‘पुरोहित’ केवल एक सामाजिक या पुरोहितीय पद नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक तथा यज्ञीय तत्त्व है, जिसकी सूक्ष्म अभिव्यक्ति स्वयं अग्नि है।
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