श्री अरुण कुमार उपाध्याय धर्मज्ञ-
१. प्राचीन भूगोल-
(१) आकाश के लोक-आकाश के ७ लोक हैं-भू (पृथ्वी), भुवः (यूरेनस तक का वायु क्षेत्र, २२ अहर्गण तक, या १०० कोटि योजन व्यास की चक्राकार पृथ्वी जो नेपचून तक की ग्रह कक्षा है), स्वः (सौर मण्डल, ३० धाम या ३३ अहर्गण तक-ऋक्, १०/१८९/३, जहां तक सूर्य का प्रकाश अधिक है), महः लोक (४३ अहर्गण तक, सर्पाकार भुजा शेषनाग में सूर्य केन्द्रित भुजाकी मोटाई का गोल जिसके १००० तारा शेष के १००० सिर हैं), जनः लोक (ब्रह्माण्ड जिसका केन्द्रीय चक्र आकाशगंगा है, ४९ अहर्गण क्षेत्र की गति ४९ मरुत्), तपः लोक (जहां तक का ताप या प्रकाश पृथ्वी तक आ सकता है, पृथ्वी का २ घात ६४ गुणा, या ८६४ करोड़ प्रकाश वर्ष की त्रिज्या), सत्य लोक ( अनन्त आकाश)।
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(२) परिलेख या माप-पृथ्वी पर २ प्रकार का परिलेख या माप (map) बनता था। इसके लिए नक्षत्र देख कर अक्षांश देशान्तर निकालते थे, अतः इसे नक्षा (नक्शा) कहते थे। पृथ्वी के ७ द्वीप चक्राकार नहीं हैं। पृथ्वी से देखने पर यूरेनस तक के ग्रहों का पथ गोलाकार या वलयाकार दीखता है, जिनके नाम पृथ्वी के द्वीपों के नाम पर ही दिये गये हैं। (विष्णु पुराण, २/७/३-४)। अन्यथा १००० योजन व्यास की पृथ्वी पर १६ कोटि योजन मोटाई का वलयाकार पुष्कर द्वीप नहीं हो सकता है। पृथ्वी के ७ द्वीप किसी भी ज्यामितिक आकार में नहीं हैं। ये ७ द्वीप हैं-जम्बू द्वीप (एशिया), प्लक्ष द्वीप (यूरोप), कुश द्वीप (विषुव रेखा के उत्तर का अफ्रीका), शाल्मलि द्वीप (विषुव वृत्त के दक्षिण का अफ्रीका), शक द्वीप (अग्नि कोण में होने से अग्नि द्वीप, वायु पुराण अध्याय ३६, ३०० प्रकार के शक या स्तम्भ वृक्ष युकलिप्टस), क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका, यह द्वीप तथा मुख्य क्रौञ्च पर्वत-दोनों उड़ते पक्षी के आकार के हैं), पुष्कर द्वीप (दक्षिण अमेरिका, उज्जैन से १२ अंश पश्चिम के पुष्कर बुखारा के विपरीत-विष्णु पुराण में पुष्कर २/८/४२)
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अन्य पद्धति थी पृथ्वी के उत्तर गोल का ४ पाद में नक्शा बनाना जिनको भूपद्म का ४ दल कहा गया है-(१) भारत दल उज्जैन देशान्तर के पूर्व और पश्चिम ४५-४५ अंश तक, विषुव रेखा से उत्तर ध्रुव तक) (२) पूर्व में भद्राश्व, (३) पश्चिम में केतुमाल, (४) विपरीत दिशा में कुरु वर्ष (यह कुरुक्षेत्र के विपरीत है)।
भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे। वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः॥२४॥
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥४०॥
(विष्णु पुराण, २/२)
दक्षिण में भी इसी प्रकार ४ पाद थे। भारत दल में इन्द्र के ३ लोक थे। इनकी माप के लिए विष्णु वामन का पूर्व दिशा में प्रथम पद यवद्वीप सहित सप्तद्वीप के पूर्व में पड़ा था। यहां पद का अर्थ है वृत्त पाद, ९० अंश। द्वीतीय पद मेरु (उत्तर ध्रुव) पर पड़ा। तृतीय पद वापस बलि के स्थान भारत के पाचिमी छोर पर पड़ा।
तत्र पूर्वपदं कृत्वापुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे। द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तमः॥
वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, ४०/५८)
यहां त्रिविक्रम = तिकड़म। राजा की ४ नीति हैं-साम, दाम, दण्ड, भेद। दण्ड तभी दिया जा सकता है, जब बल हो। नहीं तो छल करना पड़ेगा जिसकी ३ पद्धति साम, दाम, भेद को त्रिविक्रम कहा गया है। वामन ने तीनों का प्रयोग किया था।
(३) पृथ्वी के लोक- भारत पाद में इन्द्र के ३ लोकों को ही ७ लोकों में विभाजित किया गया था।
लोकाख्यानि तु यानि स्युर्येषां तिष्ठन्ति मानवाः॥८॥ भूरादयस्तु सत्यान्ताः सप्त लोकाः कृतास्त्विह॥९॥
पृथिवी चान्तरिक्षं च दिव्यं यच्च महत् स्मृतम्। स्थानान्येतानि चत्वारि स्मृतान्यावर्णकानि च॥११॥
जनस्तपश्च सत्यं च स्थान्यान्येतानि त्रीणि तु। एकान्तिकानि तानि स्युस्तिष्ठंतीहा प्रसंयमात्॥१३॥
भूर्लोकः प्रथमस्तेषां द्वितीयस्तु भुवः स्मृतः।१४॥
स्वस्तृतीयस्तु विज्ञेयश्चतुर्थो वै महः स्मृतः। जनस्तु पञ्चमो लोकस्तपः षष्ठो विभाव्यते॥१५॥
सत्यस्तु सप्तमो लोको निरालोकस्ततः परम्।१६। महेति व्याहृतेनैव महर्लोकस्ततो ऽभवत्॥२१॥
यामादयो गणाः सर्वे महर्लोक निवासिनः।५१॥ (ब्रह्माण्ड पुराण,३/४/२/८-५१)
ध्रुव तक देखने पर चीन मध्य में आता है, अतः वहां के लोग अपने को पृथ्वी स्वर्ग के बीच का मध्य राज्य कहते थे। केवल भारत वर्ष में हिमालय-विन्ध्य के बीच का भाग मध्य भारत है जिसे आजकल उत्तर भारत समझा जाता है। इसे मध्यम लोक भी कहा गया है-(रघुवंश, २/१६)। इसी अर्थ में नेपाल में दक्षिण की समतल भूमि को मधेश (मध्यदेश) कहते हैं। हिमालय मार्ग को प्राचीन काल से उत्तरापथ कहा गया है।
भारत दल के ७ लोक हैं-भू (विन्ध्य से पश्चिम), भुवः (मध्यम लोक, विन्ध्य हिमालय के पश्चिम), स्वः (हिमालय, तिब्बत या त्रिविष्टप = स्वर्ग), महः (चीन, ब्रह्मा ने यहां के लोगों को महान कहा था (ब्रह्माण्ड पुराण,३/४/२/२१, वायु पुराण, १०१/२३), जनः लोक (मंगोलिया, अरबी में मुकुल = प्रेत), तपस् (स्टेपीज, साइबेरिया), सत्य लोक (ध्रुव वृत्त)।
भारत दल के अतिरिक्त अन्य ७ पादों को ७ तल या पाताल कहते थे। ये पृथ्वी सतह पर ही हैं, आकाश में नहीं। भारत के दक्षिण तल या महारल, पश्चिम में अतल, उसके दक्षिण तलातल, अतल के पश्चिम पाताल, उसके दक्षिण रसातल, भारतके पूर्व सुतल, उसके दक्षिण वितल है।
२. भू-माप के सन्दर्भ विन्दु-
शून्य देशान्तर का चयन-आधुनिक काल में ब्रिटेन की प्रभुता होने पर अपनी राजधानी के निकट ग्रीनविच की देशान्तर रेखा को शून्य घोषित कर दिया। यह विषुव के निकट होने के कारण माप में कठिनाई होती है। इसके पूर्व नेपोलियन ने पेरिस से गुजरती देशान्तर रेखा पर विषुव से उत्तर ध्रुव तक की दूरी के १ कोटि भाग को मीटर घोषित किया तथा उस लम्बाई के बराबर मिश्र धातु की छड़ पर २ चिह्न दिये गये जिनके बीच की दूरी शून्य डिग्री केल्विन (सेण्टीग्रेड) पर १ मीटर थी। पुरुष सूक्त के अनुसार भी यही माप होगी।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्त्वा अत्यत्तिष्ठत् दशाङ्गुलम्॥ (वाज. यजु, ३१/१)
यहां भूमि का अर्थ पृथ्वी ग्रह लें तो ठोस पिण्ड = भू (भ = २४वां अक्षर), वायुमण्डल आवरण जोड़ कर २५वां अक्षर मिलाने पर यह भूमि है। इसकी परिधि = २४/२५ x१/९६ x१००० शीर्ष x१००० अक्ष (२) x१००० पाद (२) = ४ x१० घात ७ दण्ड (१ दण्ड = ९६ अङ्गुल) = ४ कोटि दण्ड। पृथ्वी की परिधि = ४ कोटि मीटर (४०,००० किमी)। अर्थात् यहां १ दण्ड = १ मीटर। विषुव रेखा पर स्थित लंका को शुन्य देशान्तर रेखा मानने का मूल कारण था कि यह दोनों ध्रुवों (उत्तर में मेरु या सुमेरु, दक्षिण में कुमेरु) तथा समुद्र के बीच है। (इस मन्त्र के अन्य कई अर्थ हैं)
स्थलजलमध्याल्लङ्का भूकक्ष्याया भवेच्चतुर्भागे।
उज्जयिनी लङ्कायाः तच्चतुरंशे समोत्तरतः॥ (आर्यभटीय, ४/१४)
विषुव रेखा का हर विन्दु दोनों ध्रुवों के बीच है। इस रेखा पर भारत के दक्षिण महासागर में पश्चिम में अफ्रीका तट से पूर्व में सुमेरु तट के मध्य विन्दु पर लंका था। लंका के समुद्र में लीन होने के बाद उज्जयिनी को सन्दर्भ माना गया जो भूपरिधि के चतुर्थ भाग (९० अंश) का भी चतुर्थ भाग (२२.५ अंश) उत्तर है।
हर महाद्वीप में सन्दर्भ के लिए १-१ मेरु थे। पूर्व का मेरु प्राङ्मेरु (पामीर) मध्य मेरु अफ्रीका में विषुव रेखा पर है जिसका नाम अंग्रेजों ने किलिमंजारो कर दिया, पर उस जिले का नाम अभी भी मेरु है। पश्चिम में अपर मेरु या अमेरु दक्षिण अमेरिका में है जिसके नाम पर उसे अमेरिका कहा गया।
इसके अतिरिक्त स्थानीय सन्दर्भ के लिए अनेक मेरु थे, जिनमें प्रायः २५ मेरु आज भी मूल नाम से वर्तमान हैं।
लंका का समय पृथ्वी का समय कहते थे, अतः यहां के शासक का नाम कुबेर था (कु = पृथ्वी, बेर = समय)। बाद में रावण ने इस पर अधिकार किया था। इसी अर्थ में उज्जैन के शिवलिङ्ग को भी महाकाल कहते हैं। प्राचीन काल में वहां से १-१ दण्ड (२४ मिनट = ६ अंश) की दूरी पर समय क्षेत्र थे। इन रेखाओं पर भी कई स्थानों का नाम लंका था, जैसे
लंकावी (मलयेसिया के पश्चिम तट पर द्वीप) ६अं२१’उ, ९९अं४८’ पू
फू लंका-थाईलैण्ड, १९अं२७’५" उ, १००अं२५’३’
वट लंका-कम्बोडिया की राजधानी नोम्पेन्ह में मन्दिर ११अं३३’५७" उ, १०४अं५५’३६" पूर्व
लंकात (सुमात्रा, इण्डोनेसिया) ३अं४५’२"उ, ९८अं२८’१४" पू
लंकांफेन (आस्ट्रिया) ४७अं३३’७" उ, १२अं६’१४" पू
ब्रिटेन का लंकाशायर (स्टोनहेंज की प्राचीन वेधशाला) उज्जैन से ठीक १३ समय क्षेत्र पश्चिम है।
वाराणसी में भी प्राचीन वेधशाला का स्थान लंका है। उसके निकट सिगरा भी है, जो लंका में रावण के राजभवन का स्थान था।
३. शिव क्षेत्र-हिमालय की मेरु चोटी ३०अं ५२’५" उत्तर तथा ७९अं१’५६" पूर्व है।
इसी देशान्तर रेखा पर ८ प्रसिद्ध शिव पीठ हैं-
(१) केदारनाथ-केदारनाथ मन्दिर-(३०.७३५२ उ, ७९.०६६९ पू.)
(२) कालेश्वरम्-कालेश्वर मुक्तीश्वर स्वामी मन्दिर (१८.८११०उ, ७९.९०६७ पू.)
(३) श्रीकालहस्ती-श्रीकालहस्ती मन्दिर (१३.७४९८०२ उ, ७९.६९८४१० पू.)
(४) काञ्चीपुरम्-एकाम्बरेश्वर मन्दिर (१२.८४७६०४ उ, ७९.६९९७९८ पू.)
(५) तिरुवनै कवल-जम्बूकेश्वर मन्दिर (१०.८५३३८३ उ. ७८.७०५४५५ पू.)
(६) तिरुवन्नामलै-अन्ना मलैयार मन्दिर (१२.२३१९४२ उ, ७९.०६७६९४)
(७) चिदम्बरम् -नटराज मन्दिर-(११.३९९५९६ उ, ७९.३१७४ पू.)
(८) रामेश्वरम्- रामनाथ स्वामी मन्दिर (९.२८८१, ७९.३१७४ पू.)
अन्य भी कई शिव क्षेत्र हैं। इन ८ मुख्य शिव क्षेत्रों के एक देशान्तर रेखा पर स्थित होने का कोई कारण नहीं लिखा हुआ है। अनुमानित कारण-
(१) कैलास-शिव को ज्ञान स्वरूप तथा आदि गुरु कहा गया है। गायत्री मन्त्र का तृतीय पाद इसका द्योतक है-धियो यो नः प्रचोदयात्। मस्तिष्क में आज्ञा चक्र के ऊपर इड़ा-पिङ्गला- सुषुम्ना का मिलन स्थान त्रिकूट या कैलास है। इस पर शिव का निवास है। शिव पार्वती के परस्पर वार्त्तालाप से१८ प्रकार की विद्या उत्पन्न हुई। मालिनी विजयोत्तर तन्त्र में इसकी व्याख्या है। मस्तिष्क से वाम और दक्षिण भाग हैं। उनके ऊपर और नीचे२-२ भागहैं। ये ४ भाग शिव के ४ मुखों के स्थूल रूप हैं। मध्य का मुख अघोर है, जिसमें इनका लय होता है। अन्य ४ मुख हैं-ईशान, तत्पुरुष, वामदेव और सद्योजात। आधुनिक शरीर विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क के दोनों भागों में जितना अधिक सम्बन्ध रहता है, उतनी अधिक बुद्धि क्षमता होती है। इसका वर्णन शङ्कराचार्य ने किया है-
समुन्मीलत् संवित्-कमल मकरन्दैक रसिकं, भजे हंस-द्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।
यदालापादष्टादश गुणित विद्या परिणतिः, तदादत्ते दोषाद् गुणमखिल-मद्भ्यः पय इव॥
(शंकराचार्य, सौन्दर्य लहरी, ३८)
इन २ हंसों को वेद में २ सुपर्ण कहा है, जिनमें एक कर्म फल का भोग करता है, अन्य निर्लिप्त है-
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक्, १/१६४/२०, अथर्व, ९/९/२०)
भौतिक शरीर में इनको आत्मा तथा जीव कहा है, जो बाइबिल में आदम-ईव हो गया है।
भौगोलिक रूप में भारत का मस्तिष्क स्थान हिमालय का त्रिविष्टप् (तिब्बत) है। इसके ३ विष्टप् (या विटप = वृक्ष) हैं। वृक्ष का मूल भूमि से जल ग्रहण कर तना और शाखा होते हुए पत्तों तक पहुंचाता है। इसी प्रकार हिमालय क्षेत्र में जो जल बरसता है, वह कई धाराओं से बह कर ३ नदियों से सागर तक जाता है। पश्चिम भाग का जल सिन्धु नदसे होकर सिन्धु समुद्र (वर्तमान नाम अरब सागर) में मिल जाता है। सिन्धु तनया लक्ष्मी विष्णु पत्नी हैं, अतः यह विष्णु विटप हुआ। मध्य भाग का जल गङ्गा से मिल कर गङ्गासागर (वर्तमान नाम बंगाल की खाड़ी) तक जाता है। इस जल ग्रहण क्षेत्र को शिव की जटा कहा गया है। यह शिव विटप हुआ। पूर्व भाग ब्रह्म विटप है, जिसका जल ब्रह्मपुत्र होते हुए गङ्गा सागर में मिलता है। इस रूप में गङ्गा सागर ब्रह्मा का क-मण्डल ( क = जल) है। ब्रह्मपुत्र के पार की भूमि ब्रह्म देश है। तीनों विटप मिल कर त्रिविष्टप हुआ। इसका केन्द्र कैलास भारत रूपी मस्तिष्क का केन्द्र है, अतः यह शिवका स्थान है। अतः शिव के ८ क्षेत्र इसकी देशान्तर रेखा पर हैं।
अग्नि रूप में शिव के ८ वसु हैं, वायु रूप में ११ रुद्र तथा तेज रूप में १२ आदित्य हैं। अतः कैलास देशान्तर रेखा पर ८ मुख्य शिव पीठ हैं।
(२) उज्जैन केन्द्र से पूर्व दिशा में ६ अंश पर यह प्रथम सीमा क्षेत्र है। २ पीठों के नाम भी ’काल’ हैं-कालेश्वरम्, कालहस्ती। ज्योतिष में काल के २ रूप हैं-नित्य और जन्य काल।
लोकानामन्तकृत् कालः, कालोऽन्यः कलनात्मकः।
स द्विधा स्थूलसूक्ष्मत्वान्मूर्त्तश्चान्मूर्त्त उच्यते॥ (सूर्यसिद्धान्त १/१०)
इस अर्थ में शिव को २ काल का स्वरूप कहा है-
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री,
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः,
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टभिरीशः॥१॥
(अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मंगलाचरण)
इनका विस्तृत वर्णन अथर्व वेद के २ काल सूक्तों में है (अथर्व सूक्त, १९/५३-५४)।
कालहस्ती स्थूलरूप है जिसकी माप की जाती है। कालेश्वरम् नित्य काल है।
(३) मस्तिष्क से आरम्भ कर मेरुदण्ड में ८ चक्र हैं-सहस्रार, विन्दु, आज्ञा, विशुद्धि, अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार। अतः मस्तिष्क कैलास से नीचे (दक्षिण) ८ शिव पीठ हैं। अन्य प्रकार से इसकी व्याख्य़ा है कि ये ५ महाभूत-आकाश, वायु, अग्नि, अप्, भूमि तत्त्व के प्रतीक हैं। अन्य ३ हैं-मन, बुद्धि, अहंकार। या अष्टधा प्रकृति रूप हैं।
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