शिव स्तुति का द्विधा काल

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  • मिस्टिक ज्ञान
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  • 24 January 2026
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शिव स्तुति का द्विधा काल                                                         

 -अरुण कुमार उपाध्याय, भुवनेश्वर।

सारांश-कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक के मंगलाचरण में शिव की स्तुति २ प्रकार के काल धारक रूप में की है। कई प्रकार से काल के २ रूप हैं, जिनके पुनः विभाजन होने से काल के ४ प्रकार हैं। ये ४ प्रकार के पुरुष (पुरुष सूक्त में विश्व का पुर रूप) से  से सम्बन्धित हैं। शिव के असंख्य रूप रुद्राष्टाध्यायी में वर्णित हैं, उनमें एक काल रूप है। अतः शिव का एक नाम महाकाल प्रसिद्ध है। पृथ्वी सतह गोल होने के कारण स्थान के अनुसार सूर्य का उदय समय भिन्न भिन्न है। किन्तु हर स्थान पर सूक्ष्म गणना कठिन है, अतः विश्व को समय क्षेत्रों में बांटा गया था। उसमें उज्जैन का केन्द्रीय स्थान था जो प्राचीन काल का शून्य देशान्तर था। अतः यहां के शिव को महाकाल कहते हैं। यहां से ६-६ अंश के देशान्तर पर समय क्षेत्र थे। सूर्य की छाया से काल या देशान्तर की भी मापहोती है,अतः ये सूर्य स्थान रूप में आज भी प्रसिद्ध हैं। काल क्षेत्र या अन्य सन्दर्भ लंका या मेरु नाम से भी प्रसिद्ध थे। काल की एक अन्य गणना है कि किसी निर्दिष्ट समय से अब तक कितना समय बीता है। चन्द्र मन को प्रभावित करता है अतः चान्द्र तिथि के अनुसार हमारे व्रत उपवास होते हैं। चान्द्र मास-वर्ष के अनुसार समाज चलता है, अतः इसे संवत्सर कहते हैं। किन्तु चान्द्र तिथि दैनिक क्रम से नहीं होती है, अतः केवल दिनों की संख्या के अनुसार सौर मास -वर्ष की गणना करनी पड़ती है, जिसे शक कहते हैं। इस रूप में भी २ प्रकार के काल हैं।

१. द्विधा काल-

(१) द्विधा काल रूप शिव-कालिदास ने अपने नाटक अभिज्ञान शाकुन्तलम् के मंगलाचरण में शिव की स्तुति में उनको २ प्रकार के काल धारण करने वाला कहा है- 

या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री,

ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।

यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः, 

प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टभिरीशः॥१॥ 

(अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मंगलाचरण)

यहां शिव की दो काल रूपों में स्तुति हुयी है। 

(२) काल की परिभाषा-परिवर्तन का आभास काल है।

परिवर्तन क्या है-किसी स्थान पर एक वस्तु थी, वह अन्य स्थान पर चली गयी-यह गति या क्रिया है।

एक वस्तु जिस रूप में थी, वह अन्य रूप में दीखती है।

कई वस्तुओं का संग्रह एक स्थिति में था, अन्य स्थिति में दीखता है।

इनको परिणाम, पृथक् भाव या व्यवस्था क्रम कहा है-

परिणामः पृथग्भावो व्यवस्था क्रमतः सदा। भूतैष्यद्वर्त्तमानात्मा कालरूपो विभाव्यते॥

(सांख्य कारिका, मृगेन्द्रवृत्ति दीपिका, १०/१४) 

इस प्रकार देश-काल-पात्र या ज्योतिष में दिक्-देश-काल परस्पर सम्बन्धित हैं।

दिक्कालावकाशादिभ्यः (कपिल सांख्य सूत्र, २/१२)

(३) काल भेद-ज्योतिष में काल के २ रूप माने गये हैं-नित्य काल जो लोकों का क्षरण करता है, अतः अन्तक या मृत्यु भी कहा जाता है। जन्य काल कलनात्मक होता है, जिसकी गणना होती है-

लोकानामन्तकृत् कालः, कालोऽन्यः कलनात्मकः। 

स द्विधा स्थूलसूक्ष्मत्वान्मूर्त्तश्चान्मूर्त्त उच्यते॥ (सूर्य सिद्धान्त, १/१०) 

भागवत गीता में इसके अतिरिक्त २ और कालों की परिभाषा दी है-

(क) नित्य काल- यह लोकों का क्ष्ररण करता है अतः क्षर विश्व से सम्बन्धित है-कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो (गीता ११/३२) । आधुनिक पदार्थ विज्ञान के उष्मागतिकी के द्वितीय नियम के अनुसार कोई भी पिण्ड या संहति सदा अव्यवस्था की तरफ ही गति करती है। मनुष्य बालक से बूढ़ा हो सकता है, बूढ़ा कभी बच्चा नहीं हो सकता। एक बार जो स्थिति चली गयी, वह वापस नहीं आयेगी, अतः इसे मृत्यु भी कहते हैं।

(ख) जन्य काल-यह यज्ञ से सम्बन्धित है जो चक्रीय क्रम में इच्छित वस्तु का निर्माण करता है-सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेषवोऽस्त्विष्ट कामधुक् ॥१०॥ एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ….॥१६॥ (गीता, ३) । जनन करने के कारण यह जन्य काल है। यह यज्ञकर्त्ता अक्षर पुरुष या विश्व से सम्बन्धित है। प्राकृतिक चक्रों के अनुसार ही मनुष्य के यज्ञ होते हैं जिनसे काल की माप होती है। यह रूप कलनात्मक है-कालः कलयतामहम् ॥(गीता, १०/३०)। सभी गणनाओं में यह दुर्बोध्य है अतः यह कृष्ण का स्वरूप है। यान्त्रिकी में काल तथा गति दर्शक के सापेक्ष होती है, विद्युत्-चुम्बकीय तरङ्गों की गति दर्शक निरपेक्ष है। सिद्धान्त रूप में भिन्न होते हुये भी हम उनको एक मान कर गणित करते हैं-यह भौतिक विज्ञान का अज्ञात रहस्य है। 

(ग) अक्षय काल-यदि एक पूर्ण संहति का विचार करें तो उसमें  मात्रा, उर्जा, आवेग आदि का कुल योग स्थिर रहता है, विश्व का निर्माण इसी अक्षय स्रोत से हुआ है अतः इसे धाता कहा गया है। यह अव्यय पुरुष का काल है-अहमेवाक्षयः कालो (गीता, १०/३३)

(घ) परात्पर काल-विश्व का अव्यक्त स्रोत अनुभव से परे है। उस परात्पर पुरुष का काल भी परात्पर है-अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वे प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्त संज्ञके ॥ (गीता, ८/१८) भागवत पुराण में गीतोक्त कालों का विस्तार से वर्णन है।



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