श्री शशांक शेखर शुल्ब (धर्मज्ञ )-
✓•१. प्रस्तावना: भारतीय तांत्रिक परम्परा भूत-प्रेत-पिशाच-वेताल-डाकिनी-शाकिनी-ग्रह-ऊर्जा आदि सभी प्रकार की अदृश्य शक्तियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत करती है। तंत्र-शास्त्र में इन्हें ऊर्जा-तत्त्व, सूक्ष्म-वायवीय एकक, कर्मजन्य अवशेष, स्थानिक अधिष्ठाता तथा अभिचारिक प्रयोगों से उत्पन्न सूक्ष्म रूप के रूप में देखा जाता है।
भैरव-तंत्र कहता है—
“सर्वे सूक्ष्मा भूतादयः प्राणव्यूहसमुद्भवाः।”
अर्थात सभी भूत-प्रेत-सूक्ष्म तत्त्व प्राण-ऊर्जा में विकृति का परिणाम हैं।
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इस शोधप्रबंध का उद्देश्य है—
•१. भूत-प्रेत बाधा का तांत्रिक वर्गीकरण,
•२. इन शक्तियों का ऊर्जा-शास्त्रीय विश्लेषण,
•३. निवारण-तंत्र का वैज्ञानिक आधार।
✓•२. तांत्रिक शास्त्रों में भूत-प्रेत का मूल सिद्धान्त: तांत्रिक आगम यह मानते हैं कि सूक्ष्म-शरीर (प्रेत) का अस्तित्व तब तक रहता है जब तक—
कर्मजन्य बन्धन पूर्ण नहीं होता,
देहांत के संस्कार शास्त्रानुसार नहीं हुए,
मृत्यु आकस्मिक, हिंसक या अपूर्ण इच्छा के साथ हुई,
तामसिक कर्म अथवा अभिचार के कारण ऊर्जा-संरचना विकृत हुई।
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रूद्रयामल में कहा गया है:
“अक्रोडितो वा प्रेतो भूतत्वं प्राप्य दुर्बलः।”
अर्थात अशांत सूक्ष्म-शरीर भूतत्व की अवस्था ग्रहण करता है।
✓•३. तांत्रिक परम्परा में भूत-प्रेत-बाधा का वर्गीकरण: तांत्रिक शास्त्र १२ प्रमुख वर्गों में भूत-प्रेत बाधाओं का विभाजन करते हैं। प्रत्येक वर्ग का स्वरूप, उत्पत्ति, लक्षण और निवारण भिन्न होता है।
✓•वर्ग-१: मृत-प्रेत (सामान्य प्रेत):
•उत्पत्ति:
मृत्यु के बाद संस्कार पूर्ण न होना,
पितृलोक गमन में बाधा,
असमय मृत्यु।
•लक्षण:
स्वप्नों में मृत व्यक्ति का आना,
घर में अचानक दुर्गन्ध, ध्वनि,
मानसिक विचलन, भय।
स्रोत: गरुड़पुराण प्रेतकल्प
✓•वर्ग-२: अक्रूर-प्रेत (अल्प-शक्तिशाली प्रेत)
•उत्पत्ति:
अत्यधिक तामसिक भोजन, मद्य, पशुवध, क्रूरता।
•लक्षण:
रोग, जड़ता, घर का भारीपन,
क्रोध, अवसाद।
स्रोत: तंत्रसार, अध्याय ९
✓•वर्ग-३: क्रूर-प्रेत / उग्र-प्रेत
•उत्पत्ति:
हत्या, धिक्कार, प्रतिशोध, हिंसा से मरे व्यक्तियों का सूक्ष्म रूप।
•लक्षण:
तीव्र अनिद्रा,
घर में वस्तु-चरण,
भारी प्रहार, छाया का अनुभव।
स्रोत: रूद्रयामल तंत्र
✓•वर्ग-४: पिशाच
•उत्पत्ति:
तामसिक ऊर्जा का सघन स्वरूप; छल, प्रतारण, वासनात्मक मृत्यु।
•लक्षण:
वासनात्मक स्वप्न,
कण्ठ-घुटन,
मानसिक भ्रम।
स्रोत: कालिकातंत्र, पिशाचविधि
✓•वर्ग-५: शाकिनी-डाकिनी बाधा
•उत्पत्ति:
उच्च तांत्रिक प्रयोग; क्रूर अभिचार; स्त्री-ऊर्जा का विकृति रूप।
•लक्षण:
अत्यधिक थकान,
रक्त-संबंधी समस्या,
रहस्यमय दुःस्वप्न।
स्रोत: कौलज्ञाननिर्णय, शाकिनी डाकिनी चरित्र वर्णन
✓•वर्ग-६: ग्रह-बाधा (तांत्रिक अर्थ में)
यह ज्योतिषीय ग्रह नहीं, बल्कि ऊर्जा-ग्रहण करने वाली सूक्ष्म सत्ता है।
•उत्पत्ति:
तामसिक स्थान, पुरानी हवेलियाँ, श्मशान, खदान, कुएँ, रोगग्रस्त भूमि।
•लक्षण:
अचानक ऊर्जा का ह्रास,
सिरदर्द,
निर्णय क्षमता का ह्रास।
स्रोत: भैरवतंत्र, गृहग्रह अध्याय
✓•वर्ग-७: अभिचार-जन्य बाधा
(काला जादू, मारण, मोहन, उच्चाटन, वश्य)
•उत्पत्ति:
तांत्रिक द्वारा उद्दिष्ट दुर्भावनायुक्त प्रयोग।
•लक्षण:
अकारण रोग,
आर्थिक हानि,
सम्बन्ध-विघटन,
निद्रा भय।
स्रोत: ब्रह्मयामल व अभिचार तंत्र
✓•वर्ग-८: स्थानिक भूत / क्षेत्राधिष्ठित शक्तियाँ
•उत्पत्ति:
भूमि-ऊर्जा का प्राचीन संचित रूप; इतिहासजनित घटनाएँ।
•लक्षण:
नए घर में अचानक क्लेश,
रात में शोर,
बच्चों में भय।
स्रोत: स्कन्दपुराण, क्षेत्र-तत्त्व वर्णन
✓•वर्ग-९: पितृ-प्रेत (पूर्वजजन्य बाधा)
•उत्पत्ति:
पितृदोष, असंतुष्ट पूर्वज, कर्म बंधन।
•लक्षण:
संतान बाधा,
स्वास्थ्य हानि,
पारिवारिक कलह।
स्रोत: गरुड़पुराण, पितृतत्त्व वर्णन
✓•वर्ग-१०: चौरसिंह / गोरज बाधा (ग्रामीण तांत्रिक परम्परा)
•उत्पत्ति:
कालिक-प्रयोग, वशीकरण, मारण की मेल (smear)।
•लक्षण:
पशुओं में आकस्मिक मृत्यु,
घर में दुर्गन्ध,
भूमि असंतुलन।
स्रोत: लोकतांत्रिक ग्रन्थ और भैरवनाथ मत
✓•वर्ग-११: सूक्ष्म-अनुकम्पी (Residual Energy Form)
•उत्पत्ति:
आत्महत्या स्थलों की स्मृति-ऊर्जा
अस्पताल, युद्धस्थल
गहन शोक, अवसाद-जनित मानसिक ऊर्जा
•लक्षण:
देह-स्पर्श का अनुभव,
शरीर में सिहरन,
किसी की उपस्थिति का आभास।
स्रोत: तंत्रसार – भावनाशक्ति अध्याय
✓•वर्ग-१२: छाया-पीड़ा / आत्म-प्रतिबिंब बाधा
यह बाहरी नहीं, बल्कि व्यक्ति की आंतरिक ऊर्जा की विकृति है।
•उत्पत्ति:
चन्द्र-दोष,
मानसिक चोट,
अत्यधिक भय,
राहु-चन्द्र युति, शनि-दृष्टि।
•लक्षण:
पराशक्तियों का भ्रम,
अपने ही विचार की प्रतिध्वनि,
आत्म-ऊर्जा का विभाजन।
स्रोत: नृसिंहतंत्र, छाया-तत्त्व वर्णन
✓•४. तांत्रिक वर्गीकरण के सूक्ष्म-ऊर्जा मानदण्ड: तंत्र-शास्त्र के अनुसार किसी भी बाधा को पहचानने हेतु पाँच सूक्ष्म-चिह्न आवश्यक माने जाते हैं:
•(१) स्थान-ऊर्जा (क्शेत्र-ऊर्जा);
क्या बाधा स्थान-विशिष्ट है?
•(२) काल-ऊर्जा:
क्या वह रात्रि, अमावस्या, संक्रांति, राहुकाल में प्रबल होती है?
•(३) प्राण-ऊर्जा:
क्या व्यक्ति की आभा (Aura) में छिद्र, धुँधलापन या दाह है?
•(४) चित्त-वृत्ति:
क्या भय, वासना, क्रोध, विद्वेष आदि तामसिक वृत्तियाँ बढ़ रही हैं?
•(५) लक्षण-स्थायित्व:
क्या घटना स्थायी (Persistent), क्षणिक (Transient), या आवर्ती (Cyclic) है?
•इन पाँच मानदण्डों से बाधा का स्वरूप निश्चित किया जाता है।
✓•५. प्रत्येक वर्ग के निवारण-तंत्र का शास्त्रीय आधार:
•(१) मृत-प्रेत:
पितृ-तर्पण, नारायणबली, महामृत्युंजय, अग्निहोत्र।
•(२) अक्रूर-प्रेत:
सात्त्विक जीवन, रुद्राभिषेक, अग्नि-शुद्धि।
•(३) उग्र-प्रेत:
भैरव-तंत्र, काली-कवच, बटुक भैरव क्रिया।
•(४) पिशाच:
महाकाली उपासना, पंच-मकार शोधन, भूत-बंध।
•(५) शाकिनी-डाकिनी:
तारा-मन्त्र, भैरवी-तंत्र, चक्र-न्यास।
•(६) ग्रह-बाधा:
कालभैरव पूजा, वास्तु-शुद्धि, ताम्र-यंत्र।
•(७) अभिचार-दोष:
नृसिंह मंत्र, कवच, अग्नि-होम, प्रत्यंगिरा-तंत्र।
•(८) स्थानिक भूत:
भूमि-शांति, नवग्रह-शांति, वास्तु-तांत्रिक हवन।
•(९) पितृ-प्रेत:
श्राद्ध, त्रिपिंडी, गयाश्राद्ध।
•(१०) चौरसिंह / गोरज:
भैरव-बलि, नींबू-मिरची, खड्ग-पूजन।
•(११) सूक्ष्म-अनुकम्पी:
मेडिटेशन, चित्त-शोधन, अग्नि-साधना।
•(१२) छाया-पीड़ा:
चन्द्र-शांति, चक्र-उपचार, योग-नाड़ी-शोधन।
✓•६. प्रेत-बाधा वर्गीकरण की तांत्रिक-वैज्ञानिक संगति:
तांत्रिक पद्धति ऊर्जा-शास्त्र पर आधारित है:
•१. उच्च कम्पन – देवता-सत्ता
•२. मध्यम कम्पन – पितृ/सूक्ष्म तत्त्व
•३. निम्न कम्पन – प्रेत/पिशाच
•४. विकृत कम्पन – अभिचारिक बाधा
ऊर्जा स्तर के आधार पर तंत्र इनका शुद्ध वर्गीकरण प्रस्तुत करता है।
✓•७. निष्कर्ष:
•१. भूत-प्रेत बाधा तांत्रिक परम्परा में १२ वर्गों में विभाजित है।
•२. प्रत्येक वर्ग का कारण, स्वरूप, प्रभाव और निवारण भिन्न है।
•३. तंत्र-शास्त्र इसे ऊर्जा-विकृति की श्रेणी में रखता है।
•४. बाधा का निर्धारण पाँच प्रमुख सूक्ष्म-मानदण्डों से किया जाता है।
•५. निवारण हेतु वैदिक, तांत्रिक और ज्योतिषीय तीनों पद्धतियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं।
•६. तांत्रिक वर्गीकरण एक अत्यन्त व्यवस्थित, वैज्ञानिक और गूढ़ ऊर्जा-विज्ञान पर आधारित प्रणाली है।
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्
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