श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )-
गायत्री मन्त्र के ३ पादों के अनुसार ३ रूप हैं-स्रष्टा रूप में-सूर्या चन्द्रमसौ धाता यथापूर्वं अकल्पयत् (ऋक्, १०/१९०/३)
= पहले जैसी सृष्टि करने वाला वृषाकपि है। मूल तत्त्व के समुद्र से से विन्दु रूपों (द्रप्सः -ब्रह्माण्ड, तारा, ग्रह, -सभी विन्दु हैं) में वर्षा करता है वह वृषा है। पहले जैसा करता है अतः कपि है।
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तद् यत् कम्पायमानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषाकपित्वम्। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/१२)
आदित्यो वै वृषाकपिः। ( गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ६/१०)
स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, २/१२)
इस प्रकार सृष्टि कर्त्ता ब्रह्म ही वृषाकपि हनुमान है-
तत्र गत्त्वा जगन्नाथं वासुदेवं वृषाकपिम्।
पुरुषं पुरुष सूक्तेन उपतस्थे समाहिताः॥ (भागवत पुराण, १०/१/२०)
ततो विभुः प्रवर वराह रूपधृक् वृषाकपिः प्रसभमथैकदंष्ट्रया। (हरिवंश पुराण, ३/३४/४८)
अतः मनुष्य का अनुकरण करने वाले पशु को भी कपि कहते हैं। तेज का स्रोत विष्णु है, उसका अनुभव शिव है और तेज के स्तर में अन्तर के कारण गति मारुति = हनुमान् है। वर्गीकृत ज्ञान ब्रह्मा है या वेद आधारित है। चेतना विष्ुह है, गुरु शिव है। उसकी शिक्षा के कारण जो उन्नति होती है वह मनोजव हनुमान् है।
अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्व समा बभूवुः।
आदध्नास उपकक्षास उत्वेह्रदा इव स्नात्वा उत्वे ददृशे॥ (ऋग्वेद,१०/७१/७)
हृदा तष्टेषु मनसो जवेषु यद्ब्राह्मणाः संयजन्ते सखायः।
अत्राह त्वं विजहुर्वेद्याभि रोह ब्रह्माणो विचरन्तु त्वे॥ (ऋग्वेद, १०/७१/८)
इसका क्रिया रूप योग सूत्र में है-
ग्रहण स्वरूपास्मितान्वयार्थवत्व संयमादिन्द्रिय जयः। (योग सूत्र, ३/४७)
ततो मनोजवित्वं विकरण भावः प्रधान जयश्च। (योग सूत्र, ३/४८)
= इन्द्रिय संयम, अर्थात् मन द्वारा ज्ञान और कर्म इन्द्रियों का समन्वय (हनुमान् रूप) से मनोजवित्व होता है।
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