स्वामी करपात्री जी के मत में पृथ्वी अचला...

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  • 31 October 2024
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श्री शशांक शेखर शुल्ब (धर्मज्ञ )- Mystic Power - "येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा।" ( यजुर्वेद३२।६ ।                                 "आयं गौः पृश्निरक्रमीत् ।" (यजुर्वेद ३। ६)   महर्षि दयानन्द ने इन यजुः संहिता के मन्त्रों से पृथ्वी को चला सिद्ध किया है। उसके खण्डन में स्वामी करपात्री जी ने वेदार्थ पारिजात में लिखा है कि "आर्य शब्द पुल्लिंगी है अतः गौ का अर्थ पृथ्वी नहीं है। निरुक्त ने पृथ्वी को गौ कहा है पर वहाँ उसका अर्थ है दूरगता। गमन करने वाली नहीं पृश्नि का अर्थ अन्तरिक्ष नहीं, सूर्य है। द्वितीय मंत्र में दृढ़ा का अर्थ अचला है। दयानन्द की व्याख्या अविचारित है। पृथ्वी सूर्य की प्रदक्षिणा करती है, यह कथन पाश्चात्यों का पुच्छग्रहण और अल्पज्ञों का प्रतारण है। तेरहवीं शती में पैथागोरस, केपलर, न्यूटन आदि ने पृथ्वी को चल कहा भारत में आर्यभट ने आर्यभटीय में पहले पृथ्वी को स्थिरा और सूर्य को चल कहा था किन्तु उसे लल्ल, वरामिहिर आदि के आगे प्रतिष्ठा नहीं मिली। तब उसने केवल प्रतिष्ठा के लिए आर्यभटीय नाम से ही दूसरा ग्रन्थ लिखा और उसमें भूभ्रमण सिद्ध किया। तब लल्ल और वराहमिहिर आदि ने प्रबल युक्तियों से उसके पक्ष को धूल में मिला दिया। फिर भी उसका मत रुद हो गया और पाश्चात्य शिक्षा के कारण उसका प्रसार हो गया। दयानन्द ने उससे प्रभावित होकर वेदमन्त्रों द्वारा उसे सिद्ध करने का निरर्थक प्रयास किया है। आर्यभट ने लिखा है कि तीव्र गति से चलने वाली नाव में बैठे लोगों को नदी तट के वृक्ष उल्टे चलते प्रतीत होते हैं। ठीक उसी प्रकार नक्षत्र हमें पश्चिम ओर जाते दिखाई देते हैं पर वस्तुतः ये अचल हैं। पृथ्वी ही पूर्व की ओर चल रही है। किन्तु यह कथन मन्द है और सर्वधा मिथ्या है। ऐसी अनुभूति प्रान्त मनुष्य को होती है। सत्य यह है कि जैसे वृत्ताकार चबूतरे पर बैठे लोग चबूतरे के चारों और दौड़ते घोड़ों को देखते हैं उसी प्रकार हम ग्रहों को देखते हैं। इसमें भ्रान्ति नहीं है। पृथ्वी यदि प्रति सेकेण्ड १७ मील की गति चलती तो उस पर सदा भीषण आँधी चलती रहती, घर और वृक्ष गिर जाते, पक्षी घोंसले में न आ पाते, पताकाएँ सदा पश्चिम ओर फहरातीं, धुआँ सदा पश्चिम जाता और ध्रुव तारा सदा एक स्थान में दिखाई न देता। पृथ्वी यदि वायु को लेकर चलती तो पूर्व में फेंकी गेंद की गति दूनी हो जाती। (अथर्ववेद ६।४४।१,६।, ८८।१ और १०। ८।२ में पृथ्वी को स्थिर कहा है।"   उत्तर-   (१) यद्यपि वेदमन्त्रों द्वारा पृथ्वी को चला सिद्ध करना कठिन है किन्तु अचला सिद्ध करना भी सरल नहीं है। ऊपर वाले 'आयं गौः" मन्त्र में आयं और गौः दोनों शब्द पुल्लिंगी हैं इसलिए महर्षि दयानन्द ने पृथ्वीगोल शब्द का प्रयोग किया है। गोल शब्द पुल्लिंगी है।   (२) करपात्री जी कहते हैं कि यह मन्त्र अग्नि के उपस्थान का है, पृथ्वी का नहीं किन्तु इस मन्त्र में अग्नि शब्द नहीं है और इसके पूर्व वाले मन्त्र में पृथ्वी का वर्णन है। मन्त्र है-   "भूर्भुवः स्वद्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा। तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेऽग्निमन्नादमन्नाद्यायादधे।।"(यजुर्वेद ३ । ५) इसमें अग्नि स्थापन के लिए पृथ्वी को सम्बोधित किया गया है।   (३) दृढ़ा का अर्थ स्थिरा नहीं बल्कि पुष्टा, कठोरा, अतिशया, तीव्रा, मूर्तिमती, मोटो और समर्थ आदि होता है (अमरकोश)। अतः दृढ़ा विशेषण से पृथ्वी अचला सिद्ध नहीं होती।   (४) आप कहते हैं कि निरुक्त ने पृथ्वी को दूरगता कहा है तो जो दूर तक जाती है वह अचला कैसे होगी? निघण्टु में पृथ्वी के प्रथम नाम हैं-गौः गमा। ये दोनों शब्द गमन से सम्बन्धित हैं और निघण्टु में पृथ्वी के रिपः, निर्ऋतिः पूषा आदि नाम पुल्लिंगी भी हैं।   (५) आपने नीचे लिखे अथर्ववेद के जिन मन्त्रों से पृथ्वी को अचला सिद्ध किया है उनमें आकाश को, सारे विश्व को, राजा को और इन्द्र, वरुण, बृहस्पति को स्थिर एवं ध्रुव कहा है तथा प्रार्थना है कि तुम्हारा रोग स्थिर हो, तुम्हारी समिति ध्रुव हो और तुम ध्रुव एवं अच्युत होकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो।   "अस्थाद द्यौरस्थात् पृथिव्यस्थादविश्वमिदं जगत्।" (६।४४।१) "ध्रुवाद्यीवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत्।"(६। ८८।१) "ध्रुवन्त इन्द्रश्चाग्निश्च .... समितिः ध्रुवोच्युतः प्रमृणीहि शत्रून्।"( ६। ८८। ३)   तो क्या आकाश, जगत् राजा, इन्द्र, बृहस्पति, समिति और यजमान खूंटे की भाँति एक स्थान पर गड़े रहते हैं। वस्तुतः अपने कार्य में नियमितता हो स्थिरत्व और ध्रुवत्व है, पृथ्वी का अपनी कक्षा में नियमपूर्वक चलते रहना ही स्थिरत्व है, शरीर के सब अंगों और वायुओं का नियमित होना ही रोग की स्थिरता है और यहाँ यही प्रार्थना है।   (६) ऋग्वेद बार-बार कहता है कि सूर्य ने पृथ्वी को धारण किया— "उक्षा दाधार पृथिवीं दाधार पृथिवीमभितः, अदधात् सूर्येण ।" अतः स्पष्ट है कि पृथिवी सूर्य की प्रदक्षिणा करती है। वेदों में सूर्य भी चल है अतः सिद्ध है कि वह पूरे सौर परिवार के साथ उस तेज को प्रदक्षिणा करता है जिसके चक्षु से स्वयं उत्पन्न हुआ है। चक्षोः सूर्यो अजायत गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने स्थिर बुद्धिवाले मनुष्य की बहुत प्रशंसा की है। वहाँ बुद्धि का संयमित होना ही स्थिरता है, बुद्धि अचला नहीं होती।   स्वामी करपात्री जी कहते हैं कि पृश्नि का अर्थ सूर्य है, अन्तरिक्ष नहीं किन्तु वे इससे पृथ्वी का चलत्व सिद्ध कर रहे हैं। अब तो स्पष्ट हो गया कि गो: (पृथ्वी) पृश्निः (सूर्य) अक्रमीत्, अर्थात् पृथ्वी सूर्य की प्रदक्षिणा करती है।   (७) पृथ्वी को चल कहना पाश्चात्यों का पुच्छग्रहण नहीं है, वैदिक और भारतीय विज्ञान का उद्घोष है। पाश्चात्यों ने वह हमसे सीखा है। यदि पाश्चात्यों का हो तो भी ग्राह्य है। ज्ञान किसी से भी लिया जा सकता है।   (८) आप सूर्य-सिद्धान्त और भास्कराचार्य के ज्योतिष को विशुद्ध भारतीय समझते हैं पर उन दोनों का मूलाधार पाश्चात्य राशियाँ हैं सूर्य ने अपना सिद्धान्त पश्चिम के मयदानव को पढ़ाया था, यह बात उसमें लिखी है और वराहमिहिर तो स्वयं ही इस शास्त्र को यवनों की देन स्वीकार करते है मेच्छा हि यवनास्तेषु सम्यक् शास्वमिदं स्थितम्। अतः हमारा वर्तमान ज्योतिष ही पाश्चात्यों का पुच्छग्रहण है। उसका वैदिक ज्योतिष से कोई नाता नहीं है।   (९) आप को जानना चाहिए कि पाइथागोरस का काल बहुत पुराना है और केपलर न्यूटन का वीं शताब्दी है, १३वीं नहीं।   (१०) आचार्य आर्यभट ने न तो बारी-बारी से दो आर्यभटीय लिखे थे न पृथ्वी को कभी अचला कहा था। उन्होंने लिखा है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और एक पल में छ कला चलती है। आर्यभट ने बार-बार भूभ्रमण शब्द का प्रयोग किया है। हाँ, आर्यभट दो हैं और दूसरे का काल शक ८७५ है।   (११) स्वामी जी कहते हैं कि वराह और लल्ल के सामने आर्यभट को प्रतिष्ठा नहीं मिली तो उसने प्रतिष्ठा पाने के लिए दूसरा आर्यभटीय लिखा और उसमें पृथ्वी को बल कह दिया किन्तु स्वामी जी को पता नहीं कि आर्यभट के समय वराहमिहिर और लल्ल का जन्म ही नहीं हुआ था और जब उन दोनों को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई तब श्री आर्यभट बैकुण्ट धाम में प्रतिष्ठा पा रहे थे। वराह और लल्ल में भी लगभग डेढ़ सौ वर्षों का अन्तर है।   (१२) आर्यभट ने प्रतिष्ठा के लोभ से नहीं बल्कि झूठी प्रतिष्ठा को लात मारकर समाज को सत्य को बोध कराने के लिए पृथ्वी को चल कहा। हमारी और आप की भाँति वे भी जानते थे कि पृथ्वी को सौंप के सिर पर और हाथियों के दाँतों पर स्थित कहकर अन्धविश्वासों का समर्थन करने से हो प्रतिष्ठा और दक्षिणा मिलती है। तम से ज्योति की ओर ले जानेवाले तो ब्रूनो की भाँति सदा जीवित जलाये जाते हैं।   (१३) आर्यभट धूलिसात् नहीं हुए। अब तो उन्हें धूलिसात् कहने वालों की स्थिति दयनीय समझी जाती है।   (१४) स्वामी जी पाश्चात्य ज्ञान को हेय कहते हैं पर वस्तुतः अनेक विषयों में हम उसके ऋणी हैं।   (१५) स्वामी जी ने पृथ्वी के चलत्व में वे ही दोष दिखाये जो अनेक बार कहे गये हैं, और जिनका खण्डन हो चुका है।   (१६) स्वामी जी कहते हैं कि पृथ्वी चलती तो ध्रुव स्थिर कैसे रहता? उन्हें इसका उत्तर उन ज्योतिषियों से पूछना चाहिए जो नक्षत्रमण्डल को चल कहते हैं। इसका एक हो उत्तर पर्याप्त है कि पृथ्वी का धुरा उत्तर दक्षिण ध्रुवों की ओर रहता है। हाँ, ध्रुव तारा ध्रुव नहीं है, स्थान ध्रुव है और थोड़ी सी गति उस स्थान में भी है।   (१७) स्वामी जी चबूतरे की उपमा देकर पृथ्वी को कदाचित् पुराणों की भाँति चपटी कहना चाहते हैं किन्तु इसमें अनेक प्रश्न खड़े हो जाते हैं। सात अश्व या मनुष्य यदि भिन्न-भिन्न गतियों से भिन्न-भिन्न गोल मार्गों में पृथ्वी की प्रदक्षिणा करें तो वे कभी कभी आमने-सामने भी आ जायेंगे किन्तु बुध और शुक्र ग्रह सूर्य से १८०° अंश की दूरी पर कभी नहीं आते और वे मंगल, गुरु तथा शनि की भाँति रात भर कभी दिखाई नहीं देते। इसका एक ही कारण है कि वे पृथ्वी को नहीं, सूर्य की प्रदक्षिणा करते हैं। पृथ्वी को स्थिर मानने में अनेक आपत्तियाँ हैं। उनमें से कुछ पीछे लिखी हैं। स्वामी जी को पृथ्वी के चारों ओर स्थित भूवायु में भी संशय है क्योंकि वे कहते हैं कि पृथ्वी चलती तो घर और वृक्ष गिर जाते किन्तु पृथ्वी को स्थिर मानने वाले भास्करादि आचार्यों ने भी लिखा है कि उसके चारों ओर १२ योजन (१०८ मील) तक भूवायु है और पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। वह बाहर के पदार्थों को खींचती है और वायु को लपेटे रहती है।   "आकृष्टिशक्तिश्च मही तथा यत् खस्थं गुरु स्वाभिमुखं स्वशक्त्या । आकृष्यते तत्पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं रवे ॥"   हमारे सब पुराणों और महाभारत ने चन्द्रमा को सूर्य से एक लाख योजन ऊपर तथा आकार में बढ़ा कहा है और योगी जनक की महती विद्वत्परिषद् में योगिराज याज्ञवल्क्य कह रहे हैं कि आदित्यलोक चन्द्रलोक में ओतप्रोत हैं, आदित्य- लोक से चन्द्रलोक बड़ा है, ऊपर है, उसके ऊपर नक्षत्रलोक है और उसके ऊपर देवलोक है। देवलोक से ऊपर क्रमशः इन्द्र, प्रजापति और ब्रह्म के लोक हैं तथा मनुष्य इस लोक को छोड़ने के बाद क्रमशः वायु, सूर्य और चन्द्रमा के लोकों में जाता है।   "कस्मिन्नु खत्वादित्यलोकाश्यप्रतश्चेति चढलोकेषु गार्गित । कस्मिन्नु खलु चन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्रलोकेषु गागीर्ति। कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोक...... दैवलोकेषु इन्द्रप्रजापति ब्रह्मलोकेषु ।।'(३/ ६)   "यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात्प्रति स वायुमागच्छति, ऊर्ध्वमाक्रमते स आदित्यमागच्छति। तस्मै स तत्र विजिहीते ऊर्ध्वमाक्रमते चन्द्रमसमाग- च्छति।।(५/१०) 【बृहदारण्यकोपनिषद् ॥】   इन ग्रन्थों को पढ़ने के बाद अन्तरात्मा कहती है कि ये कथन योगिराज व्यास और याज्ञवल्क्य के नहीं हो सकते क्योंकि महर्षि पतंजलि ने अपने योगशास्त्र (३।२६, २७, २८) में लिखा है कि योगी को सब भुवनों, ताराव्यूह और ध्रुवादि की गति स्थिति का पूर्ण बोध रहता है। यदि ये वचन सचमुच व्यास और याज्ञवल्क्य के हैं तब वे योगी और ज्ञानी नहीं हैं तथा उनके वचन और ग्रंथ हमें मान्य नहीं हो सकते। अतः स्वामी करपात्री जी सदृश योगाभ्यासी, तन्त्रागमज्ञ, विविधविद्याविशेषज्ञ, बहुदेवाराधक भक्त और राजनीतिज्ञ व्यक्ति को ऐसा नहीं कहना चाहिए। उनके इन लेखों को पढ़कर सामान्य जनता नास्तिक हो जायेगी और कहेगी कि तुम्हारे सारे शास्त्र असत्य हैं तथा योग, तन्त्र, देवाराधन, शास्वाध्ययन आदि का क्रम निरर्थक है। वैदिक यज्ञों से और पृथ्वी के चलत्व आदि से सम्बन्धित दयानन्द के अर्थ यदि खींचातानी के हों तो भी वे लोकोपकारक तथा हमारे धर्म और सम्मान के संरक्षक हैं। स्वामी जी जिस अर्थ और सिद्धान्त का समर्थन करते हैं वे सत्य हों तो भी धर्मविरुद्ध और हमारी प्रतिष्ठा के घातक हैं। आज का तटस्थ विद्वत्समाज उनकी इस बात को कभी भी स्वीकार नहीं करेगा कि वेदमन्त्र पढ़कर की जानेवाली हिंसा, हिंसा नहीं होती और वेद की अश्लीलता समुचित है। दयानन्द ने अपने भाग्य में अनेक स्थलों में यह सिद्ध कर दिया है कि वेद की अन्तरात्मा की यही पुकार है। उन सिद्धान्तों का कोई विधर्मी भी विरोध नहीं करेगा।  



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