श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )-
(रामानुजाचार्य श्री पुरुषोत्तमाचार्य जी के अनुसार)-यह सूर्य के शिष्य हनुमान् जी की गुरु परम्परा में सुरक्षित है। विश्व वाक् तत्त्व का परिणाम है, जो २ प्रकार का है-अर्थवाक्, शब्द वाक्।
ॐ की व्युत्पत्ति अवति, अवाप्नोति आदि धातुओं से है।
अव रक्षण-गति-कान्ति-प्रीति, तृप्ति-अवगम-प्रवेश-श्रवण-स्वामी-अर्थ याचन-क्रिया-इच्छा-दीप्ति-अवाप्ति-आलिङ्गन-हिंसा-आदान-भाव-वृद्धिषु (धातु पाठ, १/३९६)
आप्लृ व्याप्तौ (५/१५) के पूर्व अव उपसर्ग से अवाप्नोति होता है = मिलना, पाना।
ॐ की शास्त्रीय व्याख्या में इतने अर्थ नहीं हैं, किन्तु हनुमत् चरित्र सभी प्रकार के अर्थ वाक् का समन्वय है।
गोपथ ब्राह्मण, पूर्व (१/१६-२८) में ॐ की विस्तृत व्याख्या है।
शब्दमय ॐ-एकाक्षर स्फोट है।
२ अक्षर के ॐ में ओ = ओत, म = मित। इस परब्रह्म में सभी मित हैं।
३ अक्षर का ॐ-विश्व या वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ विश्व के प्रतीक अ, उ, म हैं। (माण्डूक्य उपनिषद्)
४ अक्षर ॐ में अ, उ, म के अतिरिक्त विन्दु परात्पर ब्रह्म है।
अर्थ रूप ॐ वेद या विश्व का चतुर्धा विभाजन है।
ॐ के ३ अंग अ, उ, म-अव्यक्त विश्व हैं।
हनुमान् के ३ पूर्ण अक्षरों से व्यञ्जन निकालने पर ॐ के ३ अक्षर होते हैं। अर्धमात्रा विन्दु का रूप ’न्’ है। पुच्छ सहित हनुमान् का शरीर ही ॐ रूप में है।
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