श्री अनिल गोविंद बोकील (ज्ञानेंद्रनाथ ) नाथपंथ में पूर्णाभिशिक्त एवं काली कुल में साम्रज्यभिशिक्त -
ॐ रुद्राय नमः महामृत्युंजय मंत्र:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥
यजुर्वेद के इस दिव्य मंत्र के ऋषि वसिष्ठ हैं, देवता रुद्र हैं और छन्द अनुष्टुप है।
सूर्य, चन्द्र और अग्नि—ये तीन नेत्र ज्ञान और चैतन्यस्वरूप हैं। सम्पूर्ण ब्रह्मांड के अस्तित्व का पोषण करने वाले शिवतत्त्व से शरीर, मन और आत्मा को बंधनों से मुक्त करने हेतु यह मंत्र है।
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अब इस मंत्र का सूक्ष्म अर्थ आपके समक्ष रखने का यह प्रयास है।
किसी भी रचना का गूढ़ अर्थ समझने के लिए उसके पूर्व और पश्चात के संदर्भों सहित अन्य उपलब्ध संदर्भों को भी ध्यान में रखना होता है। हमारा वर्तमान विषय महामृत्युंजय मंत्र है, अतः उसी पर विचार करें।
इस मंत्र के पहले और बाद के मंत्रों में कुछ नाम और शब्द आए हैं—उन्हें भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
सबसे पहले है ओंकार…
अ – ऊ – म तथा अर्धमात्रा = साढ़े तीन चरण
अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और लय—सब इसमें समाहित हैं।
अब आगे देखें…
अगला शब्द है त्र्यंबकम… इसका सामान्य अर्थ है—तीन नेत्रों वाले शिव। परंतु अब हम और सूक्ष्म अर्थ में जाएँ। सांख्य दर्शन के अनुसार शिवतत्त्व नित्य है। सांख्य इसे आकाश कहता है—जो भूत, वर्तमान और भविष्य में कभी परिवर्तित नहीं होता। सर्वत्र सदैव एकरस रहने वाला वही शिव है।
आकाश कभी बदलता नहीं, वैसे ही शिवतत्त्व सदैव पूर्ण है। उसी पूर्ण से सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय के प्रतीक रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की अवधारणा हुई।
अब इन देवताओं का तात्त्विक अर्थ क्या है—
सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्मा, विस्तार विष्णु और लय रुद्र कहलाते हैं। जब गुणत्रय का लोप होता है, तब महाशून्य की अवस्था प्रकट होती है।
जैसे जल चलायमान होकर लहर कहलाता है, पर वस्तुतः जल ही है।
जैसे आकाश गति पाकर वायु कहलाता है, पर मूलतः आकाश ही है।
उसी प्रकार एकमेव शिवतत्त्व में “एकोऽहम् बहुस्याम” का संकल्प हुआ और सृष्टि प्रकट हुई। अतः इस मंत्र में उसी आकाशरूप शिव को त्र्यंबक कहा गया है।
अब यजामहे… शब्द पर आएँ । कई भाष्यकार इसका अर्थ साधना या उपासना करते हैं। परंतु यहाँ मंत्र अभी पूर्ण नहीं हुआ है। “यज्” धातु का एक अर्थ अर्पण करना भी है।
अर्थात् उस अनादि अनन्त शिवतत्त्व को अहंकार और विकारों का अर्पण कर, हृदय से उसका सम्मान करना—यही यजामहे का यथार्थ अर्थ है।
अब आगे—
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
यह केवल स्तुति नहीं, साधना का संकेत भी है।
शब्दार्थ—जो पवित्रता का प्रसार करे और वृद्धि प्रदान करे।
सुगन्धि = कल्याणकारी पवित्रता
पुष्टि = साधना में फल की दिशा में सहायता
वर्धनम् = पोषण और उन्नति
यहाँ सुगंध का अर्थ बाह्य सुवास नहीं, अपितु परम चैतन्य की पवित्रता है जो प्रत्येक अस्तित्व में व्याप्त है।
इस शिवतत्त्व की कृपा से इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि पवित्र हों, उनका पोषण हो और वे अंतिम साध्य की ओर अग्रसर हों।
उचित कर्म से स्वास्थ्य और बल मिले, ध्यान से मन निर्मल हो, और ज्ञान से परिपक्वता प्राप्त हो—यही इस भाग का सार है।
अब अगली पंक्ति—
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्
शब्दार्थ:
उर्वारुक = ककड़ी या तरबूज
इव = जैसे
बंधनान् = बंधन से
मृत्योः = मृत्यु से
मुक्षीय = मुक्त हों
मा अमृतात् = अमृत से वंचित न हों
सरल अर्थ—
जैसे पका हुआ फल सहज ही बेल से अलग हो जाता है, वैसे ही हम जीवन की पूर्णता प्राप्त कर मृत्यु के द्वारा देह से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त हों।
गूढ़ अर्थ—
जो उत्पन्न हुआ है उसका लय निश्चित है। जन्म लेने वाला शरीर नश्वर है।
यह मंत्र मृत्यु से भय नहीं, अज्ञान से मुक्ति की प्रार्थना है।
केवल शब्दों का जप पर्याप्त नहीं, उसके भीतर का अर्थ समझना ही साधना को प्रभावी बनाता है।
जैसे कच्चा फल स्वादहीन होता है, वैसे ही अपूर्ण जीवन भी अधूरा है।
पूर्ण परिपक्वता आने पर ही फल सहज गिरता है।
उसी प्रकार साधना की पूर्णता पर देहबोध का अंत होता है—यही अज्ञान की मृत्यु है।
देहभाव से देवभाव की ओर जाना ही वास्तविक अमरत्व है।
मोक्ष मृत्यु के बाद मिलने वाली अवस्था नहीं, बल्कि इसी जीवन में अनुभव होने वाली चेतना की स्थिति है।
अर्थात्—
स्वरूप में स्थिर होना ही अज्ञान का अंत है।
देह रहते हुए देहातीत होना ही महाजीवन है।
यह मंत्र साधक को ऊर्ध्वगामी बनाता है, शान्ति और चिदानन्द की स्थिति तक ले जाता है।
मृत्युंजय रुद्र से यही प्रार्थना है—
इस जीवन को पूर्णता प्रदान कर, शिवस्वरूप के अमरत्व में स्थित कर।
ॐ नमः शिवाय
इस प्रकार इस मंत्र में इतना गहन अर्थ निहित है।
ॐ नमो आदेश
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