“भारत” शब्द की पाणिनीय सूत्रानुसार विस्तृत रूप-सिद्धि

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  • 21 February 2026
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श्री शशांक शेखर शुल्ब (ज्योतिर्विद )-

✓•१. उपोद्घात: “भारत” शब्द की रूप-सिद्धि को यदि पाणिनीय व्याकरण की दृष्टि से देखा जाए, तो यह केवल ऐतिहासिक संज्ञा नहीं, अपितु धातु-व्युत्पन्न तद्धित/कृतान्त रूप है। पाणिनि की अष्टाध्यायी के सिद्धान्तानुसार शब्द-निर्माण की प्रक्रिया तीन मुख्य चरणों से गुजरती है—
•१. धातु-निर्णय
•२. प्रत्यय-विधान
•३. ध्वनि-परिवर्तन (संधि, गुण, वृद्धि, लोप)

“भारत” शब्द का मूलाधार “भृ” (भॄ) धातु है।

✓•२. मूल धातु : “भृ”

∆धातुपाठ में—
भृ धारणपोषणयोः

•अर्थात् “भृ” धातु का अर्थ है—
धारण करना
पोषण करना
वहन करना

∆धातु : भृ (भॄ)
•गण : भ्वादिगण
•पद : परस्मैपदी

✓•३. प्रथम स्तर : “भरत” की सिद्धि (कृत् प्रत्यय द्वारा)

∆(क) कर्तरि शतृ प्रत्यय:
•पाणिनि सूत्र —
लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे
सूत्रार्थः   ... स्तः, अतः प्रयोगे केवलम् 'आन' इत्यस्यैव प्रयोगः भवति । यथा - वन्द् शानच् वन्दमान ।प्रक्रिया -१) पठ् लट् वर्तमाने लट् ३.२.१२३ इति लट् पठ् शतृँ लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे ३.२.१२४ इति शतृँ पठ् शप् अत् कर्तरि शप् ३.१.६८ इति विकरणम् शप् पठत्२) वन्द् लट् वर्तमाने लट् ३.२.१२३ इति लट् वन्द् ...
पदमञ्जरी   लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे॥ शकारः सार्वधातुकसंज्ञार्थः, ऋकार उगित्कार्यार्थः, चकारः स्वरार्थः। प्रथमाशब्दस्सुपामाद्ये त्रिके प्रसिद्धः, प्रथमाया अन्याऽप्रथमाउद्वितीयादिः,...
महाभाष्यम्   लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे (८१९) (५२० लटः शतृशानज्विधिसूत्रम्॥ ३ । २ । ३ आ.१) (आदेशोपपादनाधिकरणम्) (३०२४ आदेशानुपपत्तिवार्तिकम्॥ १ ॥) - लस्याप्रथमासमानाधिकरणेनायोगादादेशानुपपत्तिर्यथान्यत्र-...

•इस सूत्र के अनुसार वर्तमानकाल (लट्) में कर्ता के अर्थ में “शतृ” प्रत्यय लगाया जाता है।

∆“भृ” धातु पर “शतृ” प्रत्यय लगे—
•भृ + शतृ

∆(ख) धातु में गुणादेश:

∆सूत्र :
•ऋतो गुणः (६.१.८७)
•ऋकार का गुण = अर्
∆अतः—
•भृ → भर
∆अब रूप :
•भर + त् (शतृ प्रत्यय का तकारान्त रूप)
= भरत्

∆प्रातिपदिक रूप में — भरत
•अर्थ : “जो भरण करता है”, “धारक”, “पोषक”

✓•४. “भरत” से “भारत” : तद्धित प्रक्रिया
∆अब प्रश्न है—“भरत” से “भारत” कैसे?
•यहाँ पाणिनीय तद्धित प्रकरण लागू होता है।

∆(क) अपत्यार्थे अण् प्रत्यय:
•सूत्र —

•तस्य अपत्यम् (४.१.९२)

•इस अधिकार में “अण्” प्रत्यय लगाया जाता है।

•यदि “भरत” से अपत्य (वंशज) अथवा सम्बन्धसूचक रूप बने—
भरत + अण्

∆(ख) वृद्धि विधान:
•सूत्र :

वृद्धिरादैच् (१.१.१)
अदेङ् गुणः (१.१.२)

•तद्धित प्रत्यय लगने पर आद्यस्वर में वृद्धि होती है।

•अकार की वृद्धि = आ

∆अतः—
•भरत → भारत
(भ → भ; अ → आ; रत यथावत्)

∆(ग) रूप सिद्धि:
•भरत + अण्
→ भार + त
= भारत

∆अर्थ :
•भरत का वंशज
•भरत से सम्बद्ध
•भरत का देश

✓•५. राष्ट्रनाम की सिद्धि:
जब “भारत” शब्द किसी व्यक्ति के अपत्य या वंश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ, तब वह “भारतः” (पुंलिङ्ग) या “भारती” (स्त्रीलिङ्ग) रूप लेता है।

किन्तु जब वही शब्द भूगोल-विशेष के लिए प्रयुक्त हुआ, तब—

∆भारत + वर्ष = भारतवर्ष

✓•६. धात्वर्थ-आधारित राष्ट्रार्थ:
यदि हम “भरत” को केवल व्यक्ति न मानकर धात्वर्थपरक संज्ञा मानें—

∆भृ (धारण, पोषण)
→ भरत (पोषक)
→ भारत (पोषणप्रधान भूमि)

∆अर्थात्—

भारत = भरण-पोषण करने वाला राष्ट्र

•यह अर्थ पाणिनीय दृष्टि से संगत है, क्योंकि कृत्-प्रत्यय से बना “भरत” स्वयं कर्तृवाचक शब्द है।

✓•७. वैदिक प्रयोग:
ऋग्वेद में “भरत” शब्द वैदिक ऋषि-कुल के रूप में आता है—

“भरतस्य अग्ने…”

•यहाँ “भरत” एक संज्ञा है, परन्तु व्याकरणतः वह कर्तृवाचक भी है।

✓•८. महाकाव्यीय प्रमाण:
महाभारत में “भारत” शब्द बारम्बार राष्ट्र और वंश दोनों अर्थों में प्रयुक्त है।

“भारत” =
•१. भरतवंशी
•२. भारतभूमि का निवासी
•३. राष्ट्रविशेष

✓•९. ध्वन्यात्मक विश्लेषण:

भृ → भर (गुण)
भर → भारत (वृद्धि)

∆ध्वनि-परिवर्तन क्रम :

ऋ → अर (गुण)
अ → आ (वृद्धि)

•यह पूर्णतः पाणिनीय ध्वनिविज्ञान के अनुरूप है।

✓•१०. रूप-सिद्धि का क्रम (सारणी)

चरण           प्रक्रिया           रूप
१                मूल धातु          भृ
२                गुणादेश           भर
३                शतृ प्रत्यय        भरत
४                अण् तद्धित       भारत
५                 समास             भारतवर्ष

✓•११. वैकल्पिक व्याख्या:
कुछ आचार्य “भारत” को “भा” (प्रकाश) + “रत” (रमणशील) मानते हैं—

∆भा + रत = प्रकाश में रत

•किन्तु यह व्युत्पत्ति पाणिनीय दृष्टि से गौण और काव्यात्मक है; मूल रूप “भृ” धातु से ही अधिक शास्त्रीय है।

✓•१२. निष्कर्ष:
•१. “भारत” शब्द की मूल धातु “भृ” है।
•२. “भरत” कृत्-प्रत्ययजन्य कर्तृवाचक शब्द है।
•३. “भारत” तद्धित-प्रत्यय से सिद्ध सम्बन्धसूचक रूप है।
•४. ध्वनि-परिवर्तन पूर्णतः पाणिनीय नियमों के अनुरूप है।
•५. राष्ट्रार्थ में “भारत” धात्वर्थ-संगत, दार्शनिक रूप से भी युक्तिसंगत है।

•अतः पाणिनीय व्याकरण की कसौटी पर “भारत” शब्द की रूप-सिद्धि न केवल सम्भव है, अपितु व्यवस्थित, तार्किक और शास्त्रसम्मत है।



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