*मंदिर और देऊळ — इन दो शब्दों में क्या अंतर है?*
यथाशक्ति उत्तर देने का प्रयास करता हूँ।
मूल शब्द है *देवालय*।
*देऊळ* शब्द बाद में प्रचलित हुआ।
अब अर्थ और भिन्नता देखें—
*आलय* का अर्थ है घर। देव का घर अर्थात *देवालय। यह तो स्पष्ट है। अब यह घर कहाँ होता है? वह सर्वत्र होता है। जो परम तत्व चराचर में व्याप्त है, उसका घर भी उतना ही व्यापक होगा, है न? भक्त उसी देव की उपासना करता है। देव का यह **अनंतत्व* हमारी कल्पना से भी परे है। तब प्रश्न उठता है— हम उसे कैसे आह्वान करें? इसलिए हम प्रतीक ग्रहण करते हैं— मूर्ति आदि।
https://www.mysticpower.in/astrology/
ऐसे देव के लिए क्या एक घर न हो? इस हेतु अधिकतम पवित्र चिह्नों का उपयोग करके (जैसे— स्वस्तिक, ॐ, कच्छप, कलश आदि) एक स्थान निर्मित करते हैं— *उसे ही मंदिर कहते हैं*।
*देवालय* शब्द समष्टि रूप का द्योतक है, जबकि *मंदिर* शब्द व्यष्टि रूप का।
यद्यपि ऐसा है, फिर भी मंदिर और देवालय में भेद करना उचित नहीं। हम जब मंदिर जाते हैं और मूर्ति को प्रणाम करते हैं, तब क्या हमारे मन में यह भाव होता है कि “हे पत्थर, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ”? कदापि नहीं। हमारे मन का भाव तो यह होता है— “हे भगवन्, मैं तेरे अनंत स्वरूप की कल्पना भी नहीं कर सकता, इसलिए मैं तुझे इस मूर्ति में देख रहा हूँ। मेरी पूजा स्वीकार कर।”
जैसे-जैसे भक्त की उपासना परिपक्व होती है, वैसे-वैसे उसे अंतःकरण में अनुभूति होने लगती है।
हम सबकी यात्रा उसी अनंत की ओर है— उसी देवालय की ओर। और उस पथ पर आरंभ में *मंदिर* भी आवश्यक होता है, है न?
Comments are not available.