शिवतत्त्व और उसका कार्य !

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  • मिस्टिक ज्ञान
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  • 14 February 2026
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श्रीमती कृतिका खत्री,सनातन संस्था, दिल्ली-

सामान्यतः बहुत-से लोगों को किसी देवता का नामजप कैसे करना है, उन्हें कौन-से फूल अर्पित करने हैं—इसकी जानकारी होती है; लेकिन उस देवता का कार्य, उसकी अन्य आध्यात्मिक-शास्त्रीय विशेषताओं आदि के बारे में गहन जानकारी नहीं होती। इसी दृष्टि से महाशिवरात्रि के अवसर पर सनातन संस्था द्वारा संकलित इस लेख में ‘शिव’ देवता के कार्य के विषय में संक्षेप में जानकारी दी जा रही है।

विश्व की उत्पत्ति : शिव-पार्वती को ‘जगतः पितरौ’, अर्थात् जगत के माता-पिता कहा जाता है। विश्व के संहार के समय ही नई सृष्टि के लिए आवश्यक वातावरण शिव ही निर्मित करते हैं।

शिव के डमरू के नाद से विश्व की उत्पत्ति : शंकर के डमरू के 52 स्वरों—अर्थात् 52 नादों—से नादबीज, यानी बीजमंत्र (52 अक्षर) उत्पन्न हुए और उनसे विश्व की रचना हुई। नद्—नाद् अर्थात् निरंतर प्रवाहित रहने की प्रक्रिया। इन नादबीजों से ‘द द दम्’, अर्थात् ‘ददामि त्वम्। (मैं तुम्हें दे रहा हूँ)’ ऐसा नाद उत्पन्न हुआ। शिव ने मानो विश्व को यह निश्चय दिया कि ‘मैं तुम्हें ज्ञान, पवित्रता और तप प्रदान कर रहा हूँ।’

शिव के तांडव नृत्य से विश्व का संचालन : शिव का एक नाम ‘नटराज’ भी है। जब शिव का तांडव नृत्य चलता है, तब उसकी झंकार से समस्त विश्व को गति मिलती है; और जब उनका नृत्य विराम पाता है, तब यह चराचर विश्व अपने भीतर समेटकर वे अकेले आत्मानंद में निमग्न रहते हैं।

सर्वत्र व्याप्त चैतन्यमय शिवत्व का स्फुरण ही विश्व : ‘प्रत्येक जीव में शिवत्व (आत्मतत्त्व) विद्यमान है और वह चैतन्यरूप है—वही परम शिव है। यह परम शिव प्रत्येक वस्तु में व्याप्त है—यह उसका विश्वात्मक रूप है। सभी वस्तुओं में व्याप्त होकर भी वह शेष रहता है—यह उसका “विश्वोत्तीर्ण” रूप है। विश्व उसी का स्फुरण है। विश्व पूर्व से ही अस्तित्व में था; सृष्टि-काल में शिवशक्ति के योग से वह प्रकट हुआ।’— गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

परम शिव की स्वातंत्र्य-शक्ति से बिना बिंब के भी जगत का प्रतिबिंब : ‘परम शिव ही एकमात्र तत्त्व है। “माया” उसका स्वेच्छा से धारण किया गया रूप है। परम शिव ही सृष्टि, स्थिति, संहार, अनुग्रह और विलय—इन पाँच कर्मों का कर्ता है। जगत परम शिव का प्रतिबिंब है। वृक्ष, पर्वत, हाथी, गाय आदि निर्मल दर्पण में प्रतिबिंबित होते हैं—वे दर्पण से भिन्न प्रतीत होते हैं, किंतु वास्तव में प्रतिबिंब से अभिन्न होते हैं। इसी प्रकार परम शिव में प्रतिबिंबित विश्व अभिन्न होते हुए भी हाथी, गाय, पर्वत, वृक्ष आदि भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है। सामान्यतः बिंब हो तो ही प्रतिबिंब होता है; पर यहाँ परम शिव की स्वातंत्र्य-शक्ति से बिना बिंब के भी जगत का प्रतिबिंब होता है।’ — गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

जगद्गुरु : ‘ज्ञानं महेश्वरात् इच्छेत्, मोक्षम् इच्छेत् जनार्दनात्।’  अर्थात् ज्ञान की इच्छा शिव से और मोक्ष की इच्छा जनार्दन (श्रीविष्णु) से करनी चाहिए।

स्वयं साधना करके सभी की उत्तरोत्तर प्रगति कराने वाले : ‘शिव उत्तर दिशा में स्थित कैलास पर्वत पर ध्यान करते हैं और समस्त जगत पर दृष्टि रखते हैं। वे स्वयं साधना कर सबकी उत्तरोत्तर प्रगति कराते हैं।’ — प.पू. पांडे महाराज

कामदेव का दहन करने वाले— अर्थात् चित्त के कामादि दोषों का नाश करने वाले : चार-पाँच वर्ष के बच्चे द्वारा किसी बड़े व्यक्ति से लड़ने का प्रयास करने से भी अधिक कठिन है वासनाओं से लड़ना। कामदेव को शिव ने ही भस्म किया—इससे शिव की सामर्थ्य और अधिकार का बोध होता है।

कामदेव को भस्म करने के बाद उसे सभी के मन में स्थान देना : ‘भ्रूमध्य स्थित तीसरा नेत्र खोलकर शंकर ने कामवासना का नाश किया और कामदेव को भी भस्म कर दिया—जगत से ही कामवासना समाप्त कर दी। “अब प्रजा-निर्माण कैसे होगा?”—इस प्रश्न पर कामदेव की पत्नी रति की प्रार्थना से शिव ने कामदेव को जीवन दिया; किंतु वह अनंग (शरीर-रहित) हो गया—मनोज बना। वह सभी देहधारी जीवों के चित्त में निवास कर समस्त जगत को जीत रहा है। इसलिए वासना के नाश हेतु शंकर की आराधना करें। उनकी कृपा से चित्त कामादि दोषों से रहित हो जाएगा।’ — गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

आज्ञा-चक्र के अधिपति : हमारे शरीर में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार—ये सात चक्र होते हैं। कुंडलिनी-शक्ति का प्रवास इन्हीं चक्रों से होता है। ये चक्र विभिन्न देवताओं से संबद्ध हैं—जैसे मूलाधार-चक्र श्री गणपति से और स्वाधिष्ठान-चक्र दत्त से। संक्षेप में, प्रत्येक चक्र के एक-एक अधिष्ठाता देवता है। शिव आज्ञा-चक्र के अधिपति हैं। शिव आदिगुरु हैं। गुरु-सेवा में रहने वाले शिष्य का ‘आज्ञापालन’ सबसे महत्वपूर्ण गुण है। इस दृष्टि से आज्ञा-चक्र में शिव का स्थान उनके गुरुत्व का साक्ष्य देता है। शिव का तृतीय नेत्र (ज्ञान-चक्षु) भी वहीं स्थित माना जाता है।

मृत्युंजय : ‘महादेव को “सोमदेव” भी कहा जाता है। दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं—वे मृत्यु के देवता हैं; जबकि सोम (शिव) उत्तर दिशा के स्वामी और मृत्युंजय हैं। शंकर की पिंडी भी सदैव उत्तर दिशा में स्थापित की जाती है। यम श्मशान के स्वामी हैं, जबकि श्मशान में निवास करने वाले, रुंडमाला धारण करने वाले और ध्यानस्थ देव शिव हैं। जीव तप-साधना से अग्नितत्त्व, यम, वरुण और वायु-तत्त्व को पार कर मृत्युंजय शिव-तत्त्व के निकट आता है। उस समय शिव उस जीव को अभय प्रदान कर ईश्वरीय तत्त्व के अधीन कर देते हैं—तब जीव और शिव एक हो जाते हैं।’ — प.पू. पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल

त्रिगुणातीत करने वाले : सत्त्व, रज और तम—इन तीनों, अर्थात् अज्ञान का शंकर नाश करते हैं।

संदर्भ: सनातन संस्था का ग्रंथ ‘शिव भाग 1’

 



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ओम् सर्वज्ञ है ॥

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