श्री चतुर्थीलाल शर्मा-
पञ्चाक्षरमन्त्र (नमः शिवाय) से पहले ॐकार जोड़ देने से यह षडक्षर मन्त्र कहलाने लगता है। यह षडक्षर होते हुए भी पञ्चाक्षर नाम से ही प्रसिद्ध है। एक बार देवी भगवान् शिव से पूछती हैं- "दुर्जय, दुर्लङ्घय एवं कलुषित कलिकाल में जब सारा संसार धर्म से विमुख हो पापमय अधंकार से आच्छादित हो जायगा, वर्ण और आश्रम संबंधी आचार नष्ट हो जायेंगे, धर्मसंकट उपस्थित हो जायगा, सबका अधिकार संदिग्ध, अनिश्चित और विपरीत हो जायगा, उस समय उपदेश की प्रणाली नष्ट हो जायगी और गुरु-शिष्य की परम्परा भी जाती रहेगी, ऐसी परिस्थिति में आपके भक्त किस उपाय से मुक्त हो सकते हैं?"
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महादेवजी उत्तर देते हैं- 'कलिकाल के समय मेरी परम मनोरम पञ्चाक्षरी विद्या का आश्रय ले भक्ति से भावितचित्त होकर संसारबन्धन से व्यक्ति, मुक्त हो सकेंगे। जो मानसिक, वाचिक और शारीरिक दोषों से दूषित, कृतघ्न, निर्दय, छली, लोभी, और कुटिल चित्त हैं, वे मनुष्य भी यदि मुझमें मन लगाकर मेरी पञ्चाक्षरी विद्या का जप करेंगे तो वे मुक्त हो जायेंगे। भूतल पर पतित हुआ भक्त भी इस पञ्चाक्षरी विद्या के द्वारा बन्धनमुक्त हो जाता हैं।'
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आश्रित्य परमां विद्यां हृद्यां पंचाक्षरीं मम।
भक्त्या च भावितात्मनो मुच्यते कलिजा नराः ।।
मनोवाक्काय जैर्दोषैर्वक्तुं स्मर्तुमगोचरैः ।
दूषितानां कृतघ्नानां निंदकानां छलात्मनाम् ।।
लुब्धानां वक्रमनसामपि मत्प्रवणात्मनाम्।
मम पंचाक्षरी विद्या संसारभयतारिणी ।।
(शिवपुराण, वायवीयसंहिता, उत्तरखण्ड 13/4-6)
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आदि में 'नमः' पद से युक्त 'शिवाय' ये तीन अक्षर जिसकी जिह्वा के अग्रभाग में विद्यमान हैं, उसका जीवन सफल हो गया। पश्चाक्षर मन्त्र के जप में लगा हुआ पुरुष यदि पण्डित, मूर्ख, अन्त्यज अथवा अधम भी हो तो वह पापपञ्जर से मुक्त हो जाता है।
नमस्कारादिसंयुक्तं शिवायेत्यक्षरत्रयम् ।
जिह्वाग्रेवर्तते यस्य सफलं तस्य जीवितम् ।।
अंत्यजो वाधमो वापिमूर्खा वा पंडितोऽपि वा।।
पंचाक्षरजपे निष्ठोमुच्यते पापपंजरात् ।।
(शिवपुराण, वायवीयसहिता, उत्तरखण्ड 12/36-37)
भगवान् शिव को प्रसन्न करने हेतु ऋषियों ने ब्रह्माजी से पश्चाक्षर मन्त्र का ज्ञान प्राप्त कर मूजवान् पर्वत पर एक हजार दिव्य वर्षांतक तपस्या की। फलस्वरूप ऋषियों की भक्ति देखकर भगवान् शिव ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर पश्चाक्षर मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति, कीलक, षडंगन्यास, दिग्बन्ध और विनियोग- इन सब बातों का पूर्णरूप से ज्ञान करवाया।
इस मन्त्र की विशेषता यह है कि चलते-फिरते, खड़े होते अथवा स्वेच्छानुसार कर्म करते हुए, पवित्र या अपवित्र पुरुष के जप करने पर भी यह निष्फल नहीं होता। अन्त्यज, मूर्ख, मूढ़, पतित, मर्यादारहित और नीच के लिये भी यह मन्त्र निष्फल नहीं होता। किसी भी अवस्था में पड़ा हुआ मनुष्य यदि भगवान् शिव में उत्तम भक्ति भाव रखता है, तो उसके लिये यह मन्त्र निःसन्देह सिद्ध होगा, किन्तु दूसरे किसी के लिये वह सिद्ध नहीं हो सकता। इस मन्त्र के लिये लग्न, तिथि, वार और योग आदि का अधिक विचार अपेक्षित नहीं है। यह मन्त्र कभी सुप्त नहीं होता, सदा जाग्रत ही रहता है। यह महामन्त्र कभी किसी का शत्रु नहीं होता। यह चाहे सिद्ध गुरु के उपदेश से प्राप्त हो अथवा असिद्ध गुरु से अथवा केवल परम्परा से प्राप्त हो, अगर कोई भगवान् शिव में, मन्त्र में तथा गुरु में अतिशय श्रद्धा रखनेवाला है तो उसको मिला हुआ मन्त्र अवश्य सिद्ध होगा।
(शिवपुराण, वायवीयसंहिता, उत्तरखण्ड 14/63-71)
गच्छतस्तिष्ठतो वापि स्वेच्छया कर्म कुर्वतः।
अशुचेर्वा शुचेर्वापि मन्त्रोऽयन्न च निष्फलः ।।
अन्त्यजस्यापि मूर्खस्य मूढस्य पतितस्य च।
निर्मर्यादस्य नीचस्य मंत्रोऽयं न च निष्फलः ।।
सर्वावस्थां गतस्यापि मयि भक्तिमतः परम्।
सिध्यत्येव न संदेहो नापरस्य तु कस्यचित्।।
यद्यपि पञ्चाक्षरमन्त्र सभी लोगों के लिये उपयोगी है तथापि जिसने गुरु से दीक्षा नहीं ली है उसकी अपेक्षा दीक्षा लेने वाला पुरुष करोड़ गुना अधिक माना गया है। अतः जहाँ तक संभव हो दीक्षा लेकर ही मन्त्र का अनुष्ठान करे। शिव के पश्चाक्षर मन्त्र में सभी का अधिकार है। इसीलिये इसे सर्वश्रेष्ठ मन्त्र माना गया है।
किमत्र बहुनोक्तेन भक्तास्सर्वेधिकारिणः।
मम पंचाक्षरे मंत्रेतस्माच्छ्रेष्ठतरो हि सः ।।
(शिवपुराण, वायवीयसंहिता, उत्तरखण्ड 13/20)
जैसा ऊपर कहा जा चुका है, शिव आराधन या मन्त्रजप में भक्ति या श्रद्धा ही फलदायी होती है। अतः बिना श्रद्धाभक्ति के किया हुआ जप पूजा व्यर्थ होता है। उससे सिद्धि प्राप्त नहीं होती। अतः मन्त्रजप को श्रद्धा एवं भक्ति से करना चाहिये। शास्त्रीय तरीके से उत्तम रूप से सभी अंगों के साथ किया हुआ जप भी निरर्थक हो जायगा अगर उसे भक्तिपूर्वक नहीं किया गया। कहा गया है कि शिव के प्रति भक्तिहीन पुरुष यदि अपना सर्वस्व भी दे डाले तो उससे वह शिवाराधन के फल का भागी नहीं होता; क्योंकि आराधना में भक्ति ही कारण है।
स्र्वस्वमपि यो दद्याच्छिवे भक्तिविवर्जितः ।
न तेन फलभाक् स स्याद् भक्तिरेवात्र कारणम्।
(शिवपुराण, वायवीयसहिता, उत्तरखण्ड 25/52)
अतः पहले के अध्यायों में बताये गये जप के सभी अंगों या चरणाों को यदि हम नहीं पूरा कर सकते तो इसमें चिन्ता की कोई बात नहीं। जो जो अंग हो सकें उसे पूरी निष्ठा के साथ करें। यहाँ पर हम संक्षिप्तरूप से पश्चाक्षरमन्त्र के जप की विधि का निरूपण करेंगे।
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