श्री सत्यानंद सरस्वती-
मनुष्य का सारा ज्ञान, सारे विचार शब्दों में पिरोए हुए हैं। इस किसी भी षस्तु का घ्यान करें, किसी भी वस्तु को सोचें, हमारा ध्यान और सोचना शब्दों ही में होगा, यह सत्य है, कि हमारा मन, हमारी बुद्धि शब्द क्षेत्र ने बाहर कभी नहीं चले, और न ही चलना जानते हैं। जो शब्द मानुषी ज्ञान का आधार है उनकी रचना अक्षरों के संयोग से होती है। जो अक्षर मिलकर ज्ञान के आधार शब्दों को जन्म देते हैं उन् सब में आदिम अक्षर और अपने से भिन्न सब अक्षरों का प्रकाशक अक्षर 'अ' है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो 'अ' आदिम अक्षर है। अन्य सत्र अक्षरों में 'अ' है।
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अक्षरों में शब्द हैं, और शब्दों में ज्ञान है। यदि 'अ' न हो तो अन्य कोई भी अक्षर न हो। कोई भी अश्नर न हो, तो शब्द मात्र का अमाव होजाय। शब्दों के अभाव से ज्ञान का अभाव सहज सिद्ध है। इसलिए सारे अक्षरों व शब्दों के प्रकाशक 'अ' ही में सर्वज्ञान है। 'अ' जहां वर्ण माला में वर्ण है वहां 'ओम्' का भी भाग हैं। इससे महात्मा लोग सिद्ध करते हैं, कि जैसे 'अ' वर्ण में अन्य सत्र वर्ण और शब्दजन्य सारा ज्ञान है, इसी प्रकार 'अ' (ईश्वर) में सम्पूर्ण ज्ञान है। 'अ' (परमात्मा) सर्वज्ञ सर्वदर्शी है ।।
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'अ' अक्षरों में आदि अक्षर है। इसी से वर्णों, शब्दों और शब्दजन्य ज्ञानों की उत्पत्ति है। अध्यात्मवाद में 'अ' परमात्माका नाम है, और यह सूचित करता है कि परमेश्वर ही से ज्ञान की उत्पत्ति हुई है। और वही ज्ञान का आदि सोत है ।।
'म' की ध्वनि कण्ठ से निकलती है। अन्य सव वर्षों की ध्वनि कण्ठ के ऊपरसे निकलती है। हां 'क' और 'ह' की ध्वनि का स्थान भी कण्ठ है, परन्तु जब तक इनके साथ स्वर न हो तो वर्ण बोले नहीं जा सकते। इन सब से सन्त लोग यही सिद्ध करते हैं, कि सब ज्ञानों, सव ध्वनियों, और सब स्वरों का आदिम 'अ' (परमात्मा) है ।॥
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