डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी (प्रबंध संपादक)-
सम्पूर्ण तन्त्र समुदाय को साधना के अनुसार तीन भागों में विभक्त किया गया है-
१. दक्षिण मार्ग, २. वाम मार्ग और ३. मध्यम मार्ग।
दक्षिण सात्विक साधना का मार्ग है। इसमें साधक स्वयं को माध्यम, लक्ष्य या देवता बनाता है। योग दक्षिण मार्ग का अंग है। साधना की दूसरी पद्धति है, वाममार्ग जिसकी साधना शक्ति या शक्ति के मातृरूप से सम्बन्धित है। मध्यम मार्ग दोनों मार्गों का मिश्रण है। दक्षिण और वाममार्गों को क्रमशः दिव्य और कौलमार्ग भी कहते हैं। कौलमार्ग को कौलमत या कौलाचार भी कहते हैं, जो वाममार्ग की व्यापक साधना-पद्धति के अंतर्गत आता है। दक्षिण, वाम और मध्यम मार्गों को क्रमशः दिव्य, कौल और मध्यम मार्ग भी कहते हैं।
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विषय-वस्तु के अनुसार भी तन्त्र ग्रन्थों का वर्गीकरण १. आगम, २. डामर, ३. यामल और ४. निगम या शाक्त तन्त्र के रूप में किया गया है। सृष्टि, प्रलय, षट्कर्म उपासना, अर्चना, पुरश्चरण और ध्यानादि क्रियाओं, विधियों और सिद्धान्तों का वर्णन जिनमें किया गया है, वे हैं आगम ग्रन्थ ।
डामर का अर्थ है उत्तेजित होना। इसके अंतर्गत छः प्रकार के तन्त्रों का उल्लेख मिलता है : १. योग तन्त्र, २. शिवतत्त्व तन्त्र, ३. दुर्गा तन्त्र, ४. सारस्वत तन्त्र, ५. ब्रह्मा तन्त्र और ६. गान्धर्व तन्त्र। इनकी पद्धतियों का सम्बन्ध नाद, मन्त्र, क्रिया तथा सामाजिक और व्यक्तिगत साधना के नियमों से रहता है, जिन्हें यम और नियम के नाम से जानते हैं।
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यामल ग्रन्थ समूह में भी छः प्रकार के यामल होते हैं १. ब्रह्मा यामल, २. विष्णु यामल, ३. रुद्र यामल, ४. गणेश यामल, ५. रवि यामल और ६. आदित्य यामल । यामल शब्द का अर्थ होता है दो को जोड़ना या एक करना। इन ग्रन्थों में ज्योतिष, नित्यकर्म, आराधना, उपासना, युगधर्म, वर्णभेद और जातिभेद की चर्चा की गई है।
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शाक्त तन्त्रों या निगम ग्रन्यों के विषय काफी व्यापक हैं। इनमें राजधर्म, युगधर्म, वर्ण-व्यवस्था, जातिभेद, सर्ग, उपसर्ग, सृष्टि, प्रलय इत्यादि की चर्चा की गई है। इनमें ज्योतिष, यन्त्र-निर्णय और यन्त्र-आकृति आदि भी सम्मिलित हैं। इनमें मातृ-शक्ति के अनेक यन्त्रों की साधना पद्धति भी समझायी गई है।
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