श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)-
(१) वेद-यह प्रकृति के निरीक्षण से प्राप्त ज्ञान है अतः इसे निगम (निसर्ग से प्राप्त) कहते हैं। इसका ग्रहण श्रुति आदि ५ इन्द्रियों से होता है, अतः इसे श्रुति कहते हैं।
यह तीन अर्थों में अपौरुषेय है-
(१) यह किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं है, विभिन्न काल तथा स्थान के अनेक ऋषियों के मन्त्रों का संग्रह है।
(२) ५ ज्ञानेन्द्रियों के अतिरिक्त इसमें २ प्रकार के अतीन्द्रिय ज्ञान भी हैं-ऋषि तथा परोरजा प्राण द्वारा।
(३) मनुष्य, पृथ्वी तथा आकाश (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) ज्ञान का समन्वय है।
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संहिता भाग में ऋषियों के मन्त्रों का संकलन है। यह स्वायम्भुव मनु (२९१०२ ईपू) से २८वें व्यास कृष्ण द्वैपायन (३२०० ईपू) तक २८ व्यासों द्वारा हुआ।
मुण्डक उपनिषद् (१/१/१-५) के अनुसार देवताओं में प्रथम ब्रह्मा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को सभी विद्याओं का आधार ब्रह्मविद्या पढ़ाया। यह मूल वेद एक ही था जिसे ब्रह्म वेद या अथर्व वेद कहा गया। बाद में भरद्वाज ने इसे ४ वेद तथा ६ अंगों में विभाजित किया। एक मूल अथर्व से ३ वेद-ऋक्, यजु, साम निकले पर अविभाज्य मूल भी बचा रहा। अतः त्रयी का अर्थ ४ वेद है-१ मूल + ३ शाखा। इसका प्रतीक पलास है जिसकी शाखा से ३ पत्ते निकलते हैं। इसका प्रयोग वेदारम्भ संस्कार में होता है।
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४ वेद-ऋक्, यजुः, साम, अथर्व।
६ अंग-शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, व्याकरण, निरुक्त, छन्द।
ऋग्वेद की २१ संहिता में ४ उपलब्ध हैं-शाकल्य (प्रचलित), शांखायन, वाष्कल, आश्वलायन।
हर संहिता के ब्राह्मण (व्याख्या), आरण्यक (प्रयोग) तथा उपनिषद थे। ऋग्वेद का केवल ऐतरेय ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद उपलब्ध हैं। अन्य कई उपनिषद हैं।
यजुर्वेद दो प्रकार का है। प्राचीन कृष्ण यजुर्वेद की ८६ शाखा विश्व के ७ द्वीपों में ६ द्वीपों में प्रचलित थी। पुष्कर द्वीप (दक्षिण अमेरिका) में हिरण्याक्ष ने वेद नष्ट कर दिया था। शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखा केवल भारत में प्रचलित थीं।
अभी शुक्ल यजुर्वेद की २ शाखाएं उपलब्ध हैं-वाजसनेयि, काण्व। वाजसनेयि शाखा का शतपथ ब्राह्मण है जिसे याज्ञवल्क्य ने लिखा था। इसमें १०० अध्याय १४ काण्ड में हैं। अन्तिम काण्ड को बृहदारण्यक उपनिषद कहते हैं। काण्व शाखा का ब्राह्मण काण्व शतपथ ब्राह्मण है।
कृष्ण यजुर्वेद की ४ शाखा उपलब्ध हैं। तैत्तिरीय शाखा की संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद-सभी उपलब्ध हैं। मैत्रायणी संहिता का अपूर्ण ब्राह्मण , पूर्ण आरण्यक तथा उपनिषद उपलब्ध हैं। कठ (काठक), कपिष्ठल संहिता तथा कठोपनिषद् उपलब्ध हैं।
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सामवेद की तत्त्व रूप में १००० तथा शब्द रूप में १३ शाखा हैं, जिनमें ३ उपलब्ध हैं-जैमिनीय (प्रचलित), कौथुमी (इसके ऋषि को एनी बेसण्ट ने महात्मा कूट-हूमि लिखा है, जिनसे उनका साक्षात्कार हुआ था), राणायनीय। इसके कई ब्राह्मण ग्रन्थ उपलब्ध हैं-छान्दोग्य उपनिषद तथा ब्राह्मण (पञ्चविंश), षड्विंश, आर्षेय, ताण्ड्य महाब्राह्मण, जैमिनीय आर्षेय।
मूल ११३१ उपनिषद में २३८ उपलब्ध हैं। ११ मुख्य उपनिषद पर वेदान्त आचार्यों शङ्कराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य ने टीका की है-ईश, केन, कठ, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, प्रश्न, श्वेताश्वतर, छान्दोग्य, बृहदारण्यक।
किसी ऋषि का वचन सूक्त है जिसमें कई मन्त्र होते हैं। हर मन्त्र एक छन्द है, जो २६ प्रकार के हैं। छन्द के ४ चरण हैं, प्रत्येक चरण में १ से २६ तक अक्षर होते हैं। छन्द की कुल अक्षर संख्या में एक कम होने से उसे निचृत् (लिच्चड़, कंजूस), २ अक्षर कम होने पर विराट् कहते हैं। १ अक्षर अधिक होने पर भूरिक् (भूयसी = १०० या हजार से १ अधिक), स्वराट् कहते हैं।
वेद एक समय का अनुभव या दर्शन है। सृष्टि क्रम, परिवर्तन तथा इतिहास जानने के लिए बार-बार अध्ययन करना पड़ता है। इसे पुराण कहते हैं। इतिहास के हर संस्करण में नयी घटना जोड़ी जाती है, सभी विषयों के पाठ्य पुस्तकों में भी यही होता है। पुरा + नवति = पुराण, अर्थात् पुराने का नवीन संस्करण। स्वायम्भुव मनु से पूर्व भी पुराण था जिससे उनको पता चला कि उनके पूर्व की सृष्टि कैसे हुई थी। इसके आधार पर वेद की रचना की।
पुराणं सर्व शास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्। अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः॥ (मत्स्य पुराण, ५३/२)
सूर्या चन्द्रमसौ धाता यथा-पूर्वं अकल्पयत् (ऋक्, १०/१९०/३)
१८ पुराण या महापुराण हैं। १८ उपपुराण हैं। इनके अतिरिक्त कुछ स्थानीय पुराण भी हैं-एकलिंग, नीलाद्रि महोदय आदि।
१८ महापुराणों को स्मरण करने का सूत्र देवीभागवत पुराण में है-
म-द्वयं, भ-द्वयं चैव, ब्र-त्रयं, व-चतुष्टयम्।
अनाप लिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक् पृथक्॥
द्वितीय पंक्ति में 'अनाप' ३ पुराणों का निर्देश करता है। इनमें विविध विषय हैं, जिससे अनाप-शनाप हुआ है।
म-द्वयं= मत्स्य, मार्कण्डेय।
भ-द्वयं = भागवत, भविष्य।
ब्र-त्रयं= ब्रह्म, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मवैवर्त।
व-चतुष्टय= विष्णु, वायु, वामन, वराह।
अनाप = अग्नि, नारद, पद्म।
लिंग = लिङ्ग, गरुड।
कूस्का = कूर्म, स्कन्द।
२८वें व्यास कृष्ण द्वैपायन के बाद भी पुराणों के २ संस्करण हुए-
(१) नैमिषारण्य में शौनक की महाशाला में ८८,००० मुनियों द्वारा। (३१००-२८०० ईपू-१००० वर्ष की योजना थी-भागवत पुराण, १/१/४)
(२) संवत् प्रवर्तक विक्रमादित्य (८२ ईपू से १९ ई तक)-बेताल भट्ट की अध्यक्षता में विशाला नगरी में। (महाशाला या विशाला का अर्थ है विशेष पाठशाला)। एक विशाला उज्जैन का एक भाग था, एक अन्य विशाला पटना से उत्तर थी। बद्रीनाथ शङ्कराचार्य ने में ब्रह्म सूत्र का भाष्य लिखा था- वह भी बद्री विशाल है। सम्भवतः अन्य विशाला भी थी। वर्तमान पुराणों में राजाओं की सूची विक्रमादित्य पूर्व के गुप्त काल तक ही है। विक्रमादित्य संवत् के आरम्भ के अयनांश के अनुसार ही उत्तरायण आदि का वर्णन है।
आगम तन्त्र को कहते हैं जो व्यावहारिक ज्ञान है तथा गुरु से ही सीखा जा सकता है। इंजीनियरिंग, शिल्प आदि भी तन्त्र हैं। विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों को भी तन्त्र कहा गया है। दर्शन रूप में शैव तथा शाक्त आगम हैं। वैष्णव आगम रूप में पाञ्चरात्र हैं।
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