प्राचीन मर्यादाओं का निरूपण –पुराण

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  • धर्म-पथ
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  • 31 October 2024
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डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी, विद्यावास्पति- अस्तु पुराणों में प्राचीन इतिहास का वर्णन प्राप्त  होता है अत: इतिहास पुराण शब्द का सामासिक प्रयोग ही बहुतायात में प्राप्त हेाता है। ब्रह्माणड पुराण में पुराण ग्रन्थों का निर्वचनित करते हुये कहा है कि जो कुछ पूर्व घटित हुआ है उन घटनाओं को राजाओं क वंशचरित को हम जिन ग्रन्थों में प्राप्त करते हैं वे पुराण नाम से अभिहित हैं— यस्मात्पुरा ह्यभूच्चैतत् पुराणं तेन तत्स्मृतम् (ब्रह्माण्डपुराण 1.1.173) इसी प्रकार पुराण शब्द का निर्वचन करते हुये पद्मपुराण में कहा है कि जो ग्रन्थ प्राचीनकाल की परम्पराओं को प्रकट करते हैं और धर्म—मर्यादाओं का निरूपण जिन ग्रन्थों में हमें प्राप्त होता है वे पुराण कहलाते हैं— पुरा परम्परां वृष्टि पुराणं तेन तत् स्मृतम्।। (पद्मपुरण 5.2.53) पुराणों में पूर्व में बीते हुये कल्पों का इतिहास हमें प्राप्त होता है, अत: मत्स्यपुराण में इससे सम्बन्धित प्रमाण एवं पुराण के निर्वचन प्राप्त होते हैं। मत्स्यपुराण में स्पष्ट लिखा है कि प्राचीन कल्पों पर जिनकी विषयवस्तु आश्रित हो वे ग्रन्थ पुराण हैं— पुरातनस्य कल्पस्य पुराणानि विदुर्बुधा:। (मत्स्यपुराण 53.63) अत: पुराण सम्बन्धी विभिन्न निर्वचनों के आधार पर हम कह सकते है। कि पुराणा नाम से अभिहित किये जाने वाले ग्रन्थों की विषयवस्तु —प्राचीनकाल में प्रसिद्ध राजाओ के इतिहास, ऋषियों के इतिहास एवं वंश वर्णन, ईश्वर के विभिन्न अवतार, एवं भक्तो के चरित्र लौकिक एवं अलौकिक घटनाओं का वर्णन एवं वेद में वर्णित विज्ञान केा ऐतिहासिक घटनाओं, रूपकों के माध्यम से समझाना हैं धार्मिक व्रत, दान, यज्ञ, जप आदि का वर्णन भी हमें पुराणों में प्राप्त होता हैं इन सभी तथ्यों से पुराणों का महत्त्व स्वत: प्रकट हेाता है। एवं यह सिद्ध  भी होता है कि पुराण हमारे​ लिये कितने बहुमूल्य हैं। पुराणों के इन्हीं महत्त्व को जानते हुये याज्ञवल्क्य नेशिक्षा में पुराणों को स्थान दिया हैं याज्ञवल्क्य ने शिक्षा के प्रकार को समझाते हुये उसके अन्तर्गत पुराण को भी 14 प्रकार की शिक्षाओं का एक अंग कहा है— पुरणान्यायमीमांसाशास्त्रांगमिश्रिता:। वेदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश।। (याज्ञवल्क्य स्मृति, वीरमित्रोदय परिभाषा प्रकाश, भाग—1, पृ. 11) विद्या के चौदह प्रकार अथवा स्थल बताए गए हैं ,जो कि इस प्रकार हैं, पुराण, न्याया, मीमांसा धर्मशास्त्र, षडांग और वेद इस प्रकार चौदह प्रकार की विद्या कही गई है। उनमें से एक है पुराण इसे विष्णु पुराण में लिखा है— अंगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविसतर:। धर्मशास्त्रं पुराणां च विद्या ह्येताश्चतुर्द्दश। आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चेति ते त्रय: अर्थशास्त्रं चतुर्थं तु विद्यपा ह्यष्टादशैव ता:।। (वीरमित्रोदय परिभाषा प्रकाश, भाग—1, पृ. 11) विष्णुपुराण में विद्या केा अट्ठारह प्रकार का बातया है, जिसके अन्तर्गत आयुर्देद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, और अर्थशास्त्र को सम्मिलित कर इसे अट्ठारह प्रकार का बताया है। वीरमित्रोयदाकर ने इस पर टीका करते हु ये कहा है कि इत्याष्टादश विद्या उक्त्:। तत्र चतुर्द्दश धर्मप्रधानााश्चतस्र: पुनर्दृष्टार्थप्रधाना:। धर्मममपि अनुषंगेण प्रमियते  इति न धर्मस्य च चतुर्द्दशत्यनेन विरोध:। इन अट्ठारह प्रकार की विद्या में प्रथम चोहद तो धर्म की व्याख्या करते हैं तथा शेष चार अर्थ को समझाते हैं, तथापि ये धर्म के अनुषांगिकहैं, अत: इनका धर्म के साथ किसी प्रकार का विरोध नहीं है, वही पुराण कहलाते हैं। (वीरमित्रोदय परिभाषा प्रकाश, भाग—1, पृ. 11) देवीभागवत के अनुसार —श्रुतिस्मृति तु नेत्रे द्वे पुराणं हृदयं स्मृतम् (देवीभागवत, महापुराण 11.1.29) क्रमश:



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