सद्गुरु श्री अखिलेश्वरानंद नाथ भैरव
( साम्राज्याभिषिक्त काली कुल )
वर्तमान समय भारतीय संस्कृति के लिए एक संक्रमण काल ही कहा जाना चाहिए; और युगों युगों से समृद्ध हमारी आध्यात्मिक विचारधारा को विश्व कल्याण के लिए और अधिक प्रखर बनाना आवश्यक है। इसी दृष्टि से हमारी दिव्य परंपराओं, पर्वों, उत्सवों, संबंधों आदि सभी विषयों को आज के समय के अनुरूप देखकर, उनके अनुसार उनका विवेचन करना ही इस प्रस्तुति का उद्देश्य है।
आज "श्रीगुरु-पूर्णिमा"है!!! सभी समाचार-पत्रों तथा आध्यात्मिक विशेषांकों में आज "गुरु" का गुणगान किया जा रहा है! एक ही विषय को भिन्न-भिन्न शब्दों में, क्लिष्ट एवं शास्त्रीय उदाहरणों के माध्यम से जब गुरु-महात्म्य की चर्चा की जाती है, तब गुरु का व्यक्तित्व किसी अलग ही दुनिया (लोक) के, एक परिभाषित मानव के रूप में व्यक्त होता हुआ दिखाई देता है!! और संभवतः हम सभी की विचारधारा में "ईश्वर" की कल्पना भी कुछ ऐसी ही होती है, है न? इसी कारण गुरु को "ईश्वर-तत्त्व" का वाचक मानकर उन्हें उससे भी (ईश्वर से भी) ऊँचा स्थान दिया जाता है—क्या यह सत्य नहीं है? परंतु क्या वास्तव में ऐसा कुछ है?
भक्तजन तथा शिष्य-वर्ग—गुरु-भक्ति व्यक्त करते-करते उसी आभामंडल में उलझकर रह जाते हैं। गंध, पुष्प, अक्षत आदि के द्वारा गुरु-पूजन में मग्न हो जाते हैं; और उसके बाद गुरु-तत्त्व को स्वयं से अलग मानते रहते हैं। इसी कारण गुरु एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हो जाते हैं, जहाँ सब कुछ "आदर्श" ही होता है।
थोड़ा विचार करके देखिए। क्या ऐसा नहीं लगता कि हम अपने चरम आदर्शवादी विचारों के कारण गुरु को उनके पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों (जिम्मेदारियों) से अलग प्रकार से समझने लगे हैं? और यदि ऐसा है, तो गुरु और शिष्य के बीच "एकात्म-बोध" का अनुभव कैसे होगा? क्या हमें इस विषय पर विचार करना चाहिए या नहीं?
पाश्चात्य जगत ने भी "गुरु" के लिए एक कामचलाऊ शब्द खोज निकाला है—"मेंटर"। और यह शब्द शैक्षिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि क्षेत्रों में प्रभावी भी सिद्ध हो रहा है। परिणामस्वरूप "गुरु" शब्द के वास्तविक भावार्थ पर ही पर्दा पड़ता जा रहा है। जब हम गुरु को अपने दैनिक जीवन से अलग होकर देखने लगते हैं, तब ऐसा परिणाम होना स्वाभाविक ही है, है न?
तो फिर "गुरु" वास्तव में क्या होते हैं? इस गुरु-तत्त्व का सूक्ष्म विवेचन करने से पूर्व आइए, संक्षेप में थोड़ा इतिहास देख लें।
मार्ग, पंथ, परंपरा आदि की सीमाओं से परे जाकर हमें "गुरु" का वास्तविक परिचय ही नहीं होता। अब मेरा यह कथन सत्य है या असत्य? यह प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपने भीतर परखने का साहस करना चाहिए। तथापि विवेचन की सुविधा के लिए इन्हीं शब्दों का प्रयोग करना आवश्यक है, क्योंकि इससे विषय भी अधिक स्पष्ट होगा और इतिहास भी।
प्रत्येक युग में आचार्य-परंपरा का स्वरूप भिन्न-भिन्न दिखाई देता है।
श्रुत्यस्तु कृते कर्मः त्रेतायां स्मृतिसंभवः।
द्वापरे तु पुराणोक्तः कलौ आगमसंमतः।।
सत्ययुग में सभी वर्णों को अनुशासनबद्ध बनाए रखने की चुनौती गुरु के सामने थी। इसलिए गुरु-शिष्य परंपरा के नियम अत्यंत कठोर थे। समाज के योग्य व्यक्तियों को "नेता" के रूप में चुना जाता था और उनके निर्देशों का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य होता था।
त्रेतायुग में कुछ नियमों और मर्यादाओं की स्थापना करनी पड़ी। उस समय परिवार, समाज, माता-पिता, संबंधी, मित्र आदि सभी के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, इसका शिक्षण दिया गया।
द्वापरयुग को सभ्यता के वैज्ञानिक विकास का युग कहा जा सकता है। इस युग में अंध-भौतिकवाद के कारण पारिवारिक और सामाजिक मर्यादाओं के मानदंड खंडित हो चुके थे। सत्यवती राजसत्ता के मोह में पराशर पर आसक्त हुई। गांधारी और कुंती ने क्षेत्रज्ञ संतान को जन्म दिया। बलशाली पुत्र की प्राप्ति के लिए गंगा ने अपने सात पुत्रों का स्वयं बलिदान कर दिया। सबसे अनुचित स्थिति यह थी कि राजसत्ता की प्राप्ति के लिए युधिष्ठिर ने द्यूत (जुआ) खेला और अपनी पत्नी तक को हार बैठे। इसके बाद महाभारत का युद्ध हुआ।
उसी समय भगवान श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए और शत्रु तथा मित्र—दोनों के ही "वरेण्य" बने। उन्होंने बिना किसी शस्त्र-अस्त्र का प्रयोग किए, अपनी मधुर मुस्कान के माध्यम से उस समय के समस्त वैज्ञानिक शस्त्र-अस्त्रों को निष्प्रभावी करा दिया।
इसके पश्चात हजारों वर्षों की शांति के काल के बाद आचार्य शंकर तथा गुरु गोरक्षनाथ प्रकट हुए। उन्होंने विद्वानों के धार्मिक अहंकार का चूर्ण कर दिया और शांति तथा आनंद की स्थापना के लिए संपूर्ण समाज को अध्यात्म की धारा में प्रवाहित किया।
इस समस्त विवेचन का सार केवल इतना है कि प्रत्येक युग में गुरु और शिष्य उस समय की परिस्थितियों के अनुसार नए स्वरूप में, नई पद्धति से प्रकट होते हैं। गुरु युगानुकूल साधना-उपासना की पद्धति प्रस्तुत करते हैं। (इसी को भगवद्गीता में "ज्ञान सहित विज्ञान" कहा गया है। इसके लिए अध्याय ७ का अवलोकन करें।)
अतः गुरु अथवा शिष्य—किसी को भी एक-दूसरे को केवल प्राचीनता के दर्पण में देखने की आवश्यकता नहीं है, और न ही प्राचीन पद्धतियों को यथावत अपनाना अनिवार्य है।
इसी दृष्टि से संपूर्ण "गुरुकृपायोग" को आज की परिभाषा तथा आज के उपयुक्त आचार-विचारों के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए। ऐसे ही गुरु वास्तव में महान कहलाते हैं। अन्य कोई नहीं।
वर्तमान समय कलियुग का है। निर्धन से लेकर धनवान तक, प्रत्येक व्यक्ति का यही दावा होता है कि वह सत्य बोलता है और सत्य का ही आचरण करता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपने साथ सत्य का प्रमाणपत्र लेकर खड़ा है। किंतु आश्चर्य की बात यह है कि केवल वही व्यक्ति सत्य को प्रकट नहीं करता, जो मौन धारण करके शांत एवं प्रसन्न मुखमुद्रा के साथ खड़ा रहता है। क्योंकि उसने सत्य को देखा है—जाना है—अनुभव किया है!!! ऐसी विभूति केवल और केवल "गुरु"ही हो सकती है, अन्य कोई नहीं। तो फिर गुरु वास्तव में कौन हैं?
उद्यदयास्वनमण्डल-कालाद्दीननित्या।
विद्यारूपः प्राप षडर्थीनरभावम्।।
यस्तीर्थात्मा मण्डलपूर्णाक्षरवर्त्मा।
तं सन्मार्गमत्तमयूरं गुरुमीडे।।
सूर्यमंडल के उदयकाल के प्रथम क्षण से लेकर संपूर्ण दिनभर, छह अर्थों से युक्त विद्यारूप में "नरभाव" को प्राप्त हुए, तथा मंडल के समस्त अक्षरों (पूर्णाक्षरों) के देहस्वरूप ही जो हैं, और जो सद्मार्ग का निर्देशन करते हैं—वे ही गुरु हैं। उन्हें प्रणाम हो।
क्या इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि इसी मानव-देह में गुरु-तत्त्व की व्यापक व्याख्या का संकेत दिया गया है? अब यदि इसका सूक्ष्म और गहन अर्थ देखा जाए, तो उदयकाल के प्रथम क्षण (अर्थात् दिन के प्रारंभ) से लेकर संपूर्ण दिन में "मत्तमयूर" स्थिति तक हमारी निर्धारित श्वास-संख्या (श्वास अर्थात् प्राण का स्वरूप), जो २१,६०० है, वही "गुरु-तत्त्व" है।
इस गुरु-तत्त्व में अ, आ, इ...से लेकर छह रूपों—भ-गण, त-गण, स-गण, म-गण आदि के माध्यम से तथा मत्तमयूर छन्द के अनुसार क-वर्ग, च-वर्ग, त-वर्ग, प-वर्ग और य-वर्ग को सम्मिलित करते हुए "नर" संख्या तक श्वास-गणना २०,५७६ होती है।
इसमें ऋषिगण-समूह ५७६, नाथरूप गुरु ९, तत्त्वरूप १६, नित्यारूप१६, घटीरूप६०, राशिरूप१२, ग्रहरूप९, महाभूतरूप५ (पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश), मातृकारूप ५०, तथा शक्ति-समूह ९१—इन सबको जोड़ने पर यह संख्या २१,६०० होती है।
क्या यही संख्या हमारे "स्व-स्थ" शरीर के श्वसन की संख्या नहीं है? इसी में सूक्ष्म रूप से गुरु की अवस्था का वर्णन किया गया है। और क्या यही प्राण-प्रक्रिया (२१,६००) हमारे शरीर में भी नहीं होती? निश्चय ही होती है। फिर गुरु-तत्त्व की भिन्नता कहाँ रह जाती है?
अतः इसी जागरूकता को बनाए रखते हुए (भक्तिमार्ग की भाषा में इसे "भाव" कहा जाता है), गुरु-उपासना—अर्थात् गुरु द्वारा प्रदत्त साधना—करके तो देखिए।
(इस विषय पर अधिक विस्तृत विवेचन मैं जानबूझकर नहीं कर रहा हूँ।)
अब आप स्वयं ही विचार करके देखिए कि "गुरु कौन हैं?"हमारे ही प्राणों की गति (श्वास-प्रश्वास), रोम-रोम में होने वाले स्पंदन (हलचल), हमारे विचारों का प्रवाह (विचारों का आना-जाना) आदि—इन सभी में गुरु ही तो दृष्टिगोचर होते हैं। आदि और अंत, सृष्टि और प्रलय, जीवन और मृत्यु, सुख और दुःख, विद्या और अविद्या, रात्रि और दिवस, कर्तव्य और अकर्तव्य आदि समस्त द्वंद्वों के मध्य जो शांत, स्थिर और अविचल स्वरूप में स्थित प्रत्यगात्मा है—वही तो गुरु-स्वरूप है। उसी को गुरु कहा जाता है। अब आइए, इसे और भी सूक्ष्म दृष्टि से समझें।
शक्ति "स्वर-वर्ण"है, जबकि पदार्थ"व्यंजन-वर्ण" है। पदार्थ को आकार केवल शक्ति के कारण ही प्राप्त होता है। इसलिए जब इस विशिष्ट तत्त्व का नामकरण "गुरु"किया गया, तब "क" वर्ग का तीसरा बलवान वर्ण "ग", स्वर-वर्ण का तीसरा शक्तिशाली स्वर "उ", तथा अंतःस्थ वर्णों का दूसरा सशक्त वर्ण "र", और पुनः "उ"के संयोग से "गुरु"—इस प्रकार इस तत्त्व का नाम निर्मित हुआ।
ज़रा विचार कीजिए, ऐसा क्यों हुआ होगा?
"क"ब्रह्मा का, "ख"विष्णु का, "ग"गणेश का तथा "र"अग्नि का द्योतक है। "उ"वायु तथा महेश का प्रतीक है। (संदर्भ के लिए किसी भी बीजग्रंथ का अवलोकन किया जा सकता है।)
इनमें "ग"पहले आया, क्योंकि मानव-देह भौतिक स्वरूप में है। इस मानव-देह में "उ"अर्थात् पृथ्वी, आप (जल) और वायु—ये तीनों तत्त्व व्यापक होकर कल्याणकारी बनते हैं। "र"अग्नि का प्रतीक है, और वही रूप तथा गुणों की उत्पत्ति करता है।
"ग"में ही ब्रह्मा रूप "क"तथा विष्णु रूप "ख"समाहित हो गए। इसी प्रकार"र" में पुनः "उ"का समावेश इसलिए हुआ कि इसी मानव-देह के माध्यम से हमें कल्याण की वर्षा करनी है। इसी कारण "गुरु"तत्त्व ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनों से भी श्रेष्ठ माना गया। वही साक्षात् "परब्रह्म"कहलाया।
इसी का गुणगान हम इस प्रकार करते हैं—
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
जहाँ समस्त गुण पूर्णतः लीन हो जाते हैं, वही परब्रह्म की अवस्था है, जो त्रिदेवों से भी श्रेष्ठ है। नाथपंथ में इसी को निरंजन तत्त्व तथा अवधूत अवस्था कहा गया है।
इसी परब्रह्म के भीतर चिद्रूपा पराशक्ति साम्यावस्था में स्थित रहती है। गति ही उसका स्वभाव होने के कारण पूर्ण साम्य और संतुलन बनाए रखना कठिन होता है। अतः जब उसी परब्रह्म में वह स्पंदित होने लगती है (गतिशील होती है), तब महाविस्फोट होता है और ब्रह्म तथा प्रकृति एक-दूसरे से पृथक हो जाते हैं।
इसके पश्चात् दोनों के पारस्परिक कार्य (आघात) प्रारंभ होते हैं और ज्यामितीय अनुपात (Geometric Proportion) के सिद्धांत के अनुसार विविध प्रकार की सृष्टि का उद्भव होने लगता है। उसी को हम विश्व कहते हैं।
इसी अर्थ का एक और श्लोक हम प्रायः कहते हैं—
"अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।"
जो तत्त्व समस्त अखण्ड ब्रह्माण्ड तथा चर-अचर जगत में व्याप्त है, वही गुरु है। यहाँ "पद" का अर्थ "चरण" नहीं, बल्कि "तत्त्व" है। किंतु कालक्रम में उस तत्त्व का विस्मरण हो गया और अज्ञानवश हम गुरु के चरण-स्पर्श को ही सब कुछ समझने लगे।
तो फिर यह तत्त्व (पद) क्या है? आइए, अभी इसका केवल सांकेतिक अर्थ ही समझते हैं।
वह पद है—"महाशून्य"।
इस महाशून्य में कोई भी विकृति नहीं है। इतना ही नहीं, समस्त तत्त्व इसी महाशून्य में सूक्ष्म एवं निष्क्रिय (शांत) रूप में अनुस्यूत (व्याप्त) हैं। जो इस ज्ञान का बोध कराते हैं, वही गुरु हैं। वे महाशून्य में मंत्र-विस्फोट की ऊर्जा के माध्यम से एक तीव्र संवेग उत्पन्न कर देते हैं। साधना के द्वारा हम जितना अधिक उस संवेग को बनाए रखते हैं, उतना ही हमारे कर्म भस्म होने लगते हैं और हम कर्मों के दुष्प्रभाव से मुक्त होने लगते हैं। हम निष्पाप होने लगते हैं। परिणामस्वरूप दिव्य देवत्व की ऊर्जा का संचार हमारे भीतर होने लगता है। मानो हमारे जीवन का कायाकल्प ही होने लगता है।
यही शून्य हमारे रोम-रोम में, प्रत्येक कोशिका में विद्यमान है—वह जागृत होने लगता है।
तो फिर हमें गुरु के प्रति कैसी धारणा रखनी चाहिए? क्या इस संसार से सर्वथा अलग, विलक्षण, विशिष्ट एवं आदर्श व्यक्तित्व के रूप में? अथवा अपने ही बीच, अपने अत्यंत निकट सदैव उपस्थित एक योग्य मार्गदर्शक के रूप में?
इसे समझने के लिए एक छोटा-सा उदाहरण देखिए।
जब हम किसी वाहन में यात्रा करते हैं, तब उसके चालक के संरक्षण में निश्चिंत रहते हैं। चालक यह नहीं देखता कि वाहन में कौन विद्वान है, कौन अशिक्षित है, कौन किसान है। वह सबको समान दृष्टि से देखते हुए मार्ग का संचालन करता है। बस, इतना ही।
इस पर अधिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि विवेचन का आशय अब स्पष्ट हो जाता है।
हमारे गुरु भी इसी मानव-देह में विश्वात्मा के प्रतीक हैं। फिर हम उन्हें अपने भीतर आत्मसात क्यों न करें? यदि हम अपनी व्यक्तिगत विशेषताओं और अहंभाव को साथ लेकर गुरु के समक्ष उपस्थित होंगे, तो हमारे और उनके बीच भेद उत्पन्न होगा। समस्त द्वंद्वों से मुक्त शिष्य ही गुरु को प्रिय होता है—ऐसा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
"यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥"
(गीता १२:१७)
अब यदि ऊपर वर्णित इस समस्त गुरु-महात्म्य में प्रयुक्त कुछ विशिष्ट शब्दों के सांकेतिक अर्थ को समझ लिया जाए, तो गुरु-तत्त्व का बोध और अधिक स्पष्ट हो जाएगा। 💥
"ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः।"
अर्थात् मंत्र के द्रष्टा ही ऋषि हैं।
हम सामान्यतः ग्रहों को केवल भौगोलिक (खगोलीय) पिंडों के रूप में ही जानते हैं। किंतु "ब्रह्माण्डी ते पिंडी" (ब्रह्माण्ड में जो है, वही शरीर में भी है) इस सिद्धांत के अनुसार, यहाँ शरीरस्थ ग्रह-स्थिति का ज्ञान भी आवश्यक है। अब उसी का विवेचन देखते हैं।
वर्णध्वनियों के प्रकट स्वरूप को "मातृका"कहा जाता है। संस्कृत में १६ स्वर और ३४ व्यंजन हैं। इन्हीं वर्णध्वनियों की वैज्ञानिक संरचना को मंत्र कहा जाता है। इन्हीं मंत्रों से विशिष्ट देव-देवताओं के स्वरूप तथा उनके गुणों की सृष्टि होती है। इसी प्रकार १६ नित्याएँ भी हैं। अब "नित्या" का वास्तविक अर्थ देखिए—
"पुनः प्रलीयते यस्यां; नित्या सा परिकीर्तिता।"
(संदर्भ : शक्तियामल तंत्र)
जिस शक्ति की इच्छा से ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सृष्टि होती है तथा पुनः उसी शक्ति में उनका लय हो जाता है, वही शक्ति "नित्या"कहलाती है।
अब शरीरस्थ नवग्रहों की स्थिति भी जान लेते हैं।
ग्रहाणां मण्डलं चैव शृणु वक्ष्यामि पार्वति।
नादचक्रे स्थितः सूर्यः, बिन्दुचक्रे चन्द्रमा॥
लोचनेऽजलः प्रोक्तो, हृदि सोमसुतः स्थितः।
उदरे च गुरुश्चैव, शुक्रे शुक्रस्तथैव च॥
नाभिचक्रे स्थितो मन्दः, मूले राहुः स्थितः सदा॥
पादे नाभौ च केतुश्च; शरीरे ग्रहमण्डलम्।
इस प्रकार मंत्रों के द्वारा ग्रह-स्थिति भी प्रभावित होती है। और यह सब कुछ गुरु-तत्त्व में समाहित है। इसलिए मानव-देहधारी गुरु हमारे मन तथा हमारी समस्त क्रियाओं का पूर्णतः संचालन करते हैं। आवश्यकता केवल पूर्ण विश्वास और श्रद्धा की है। बस।
इसी कारण साधना में गुरु ही "इष्ट"हैं, चाहे गुरु द्वारा कोई भी साधना प्रदान की गई हो।
द्वंद्वों से मुक्त होने में समय तो लगता ही है। जितना अधिक ज्ञान होता है, उतना ही अधिक उसका संकट भी होता है, क्योंकि उसी के कारण हम "लेकिन" और "परंतु" के जाल में उलझे रहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो इसे "बुद्धि का अवरोध"कहा जा सकता है।
यदि देखा जाए तो संपूर्ण विश्व ही माया (परिवर्तनशील स्वरूप) के प्रभाव में है। फिर भी महामाया के प्रभाव से ज्ञानीजन भी शीघ्र मुक्त नहीं हो पाते। अनेक बार तो ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं कि वे शुद्ध ज्ञान की परिधि से ही बाहर चले गए।
शुद्ध ज्ञान का अर्थ ही है—"समत्व-दर्शन"।
इस मायामय संसार में इसकी साधना निश्चय ही कठिन है, किंतु इसे समझने का एक अत्यंत सरल उपाय भी है। वह यह कि यदि हम अपने से कम योग्य गुरु के पास भी श्रद्धापूर्वक जाएँ, तो भी उस मानव-देह के माध्यम से गुरु-तत्त्व प्रकट होकर "श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्"की अवस्था अवश्य प्राप्त हो सकती है। 🙏
भगवती के उपासक तथा रावणपुत्र मेघनाद ने इन्द्र को पराजित किया था, इसलिए वह "इन्द्रजित"कहलाया। वह भी अत्यंत बुद्धिमान था। किंतु अंततः भौतिक ज्ञान तो द्वंद्वों से युक्त ही होता है। उसी ज्ञान के आधार पर उसने ऐसा समर्पण-भाव विकसित किया—
"हे देवी! आपको ही अपने हृदय में धारण करके मैं उचित और अनुचित—दोनों प्रकार के कर्म करूँगा; क्योंकि इसी उद्देश्य से तो आपने मेरा सृजन किया है। अंततः उनके परिणाम तो आपके ही हाथ में हैं।"
इससे क्या अब भी हम यह समझ सकते हैं कि हम कहाँ खड़े हैं? शिष्य के रूप में क्या हम गुरु के समक्ष इसी भाव से उपस्थित होते हैं, या फिर किसी अन्य भाव की खोज करते रहते हैं?
खैर, हम किसी भी भाव या किसी भी जागरूकता के साथ गुरु के समक्ष उपस्थित हों अथवा न हों, अंततः हमारी साधना के परिणाम ही उसके वास्तविक परिचायक होते हैं। अर्थात् परिणाम ही हमारी साधना की पहचान कराते हैं—क्या यही सत्य नहीं है? 👌👍
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