सृष्टि तत्व के 7 महर्षि का रहस्य

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  • मिस्टिक ज्ञान
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  • 18 August 2026
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श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )-
महर्षि-यहां ७ महर्षि मनुष्य नहीं हैं जो सृष्टि आरम्भ होने के बहुत बाद हुए जब पृथ्वी तथा उस पर मनुष्यों की सृष्टि हो चुकी थी। अतः वे सृष्टि के बारे में नहीं जान सकते हैं-

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न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥ (गीता, १०/२)

को अद्धा वेद क इह प्र वोचत् कुत अजाता कुत इयं विसृष्टिः। 

अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव॥ (नासदीय सूक्त, ऋक्, १०/१२९/६)

ये सृष्टि करने वाले तत्त्व हैं। ऋषि के ७ अर्थ हैं-(१) सृष्टि का मूल तत्त्व जिनसे सृष्टि का क्रम आरम्भ हुआ तथा क्रमशः पितर, देव-दानव आदि हुए-

ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितॄभ्यो देव-दानवाः। देवेभ्यश्च जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः॥ (मनु स्मृति, ३/२०१)

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जगत् का सप्तम आयाम-यह असत् (अनुभव से परे) प्राण है, जो वस्तुओं के बीच आकर्षण का सम्बन्ध है (ऋषि = रस्सी)-

असद्वा ऽइदमग्र ऽआसीत्। तदाहः – किं तदासीदिति। ऋषयो वाव ते ऽग्रे ऽसदासीत्। तदाहुः-के ते ऋषय इति। ते यत्पुरा ऽऽस्मात् सर्वस्माद् इदमिच्छन्तः श्रमेण तपसा ऽरिषन्-तस्माद् ऋषयः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/१)

= आरम्भ में केवल असत् था। वह क्या है? आरम्भ में ऋषि थे। वे ऋषि कौन थे? ये सबसे पहले हुए तथा इस विश्व की इच्छा की, श्रम और तप से खींचा, अतः उनको ऋषि कहा गया।

एक ऋषि का ३ युग्मों में विभाजन-आरम्भ में एक ही प्रकार का ऋषि था जिसे एकर्षि कहते थे। सूर्य (निर्माण का स्रोत) तथा यम (नियन्त्रण, अन्त) के बीच निर्माण सूत्र एकर्षि था। प्राजापत्य (स्रष्टा) होने के कारण इसे पूषा (पोषक) कहते थे।

पूषन्नेकर्षे यम-सूर्य, प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह।

तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि, यो ऽसावसौ पुरुषः सो ऽहमस्मि॥ (ईशावास्योपनिषद्, १६)

प्रथम पङ्क्ति में व्यूह का अर्थ सृष्टि संरचना के ४ प्रकार हैं, जिसके कई अर्थ हैं-

वासुदेव (सृष्टि का वास-स्थान, शून्य आकाश), सङ्कर्षण (परस्पर आकर्षण जिससे ब्रह्माण्ड, तारा आदि का निर्माण हुआ), प्रद्युम्न (तारा, जिनसे प्रकाश निकला), अनिरुद्ध (पृथ्वी पर असीमित प्रकार की सृष्टि)।

ब्रह्मा के ४ मानस पुत्र-सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार। ये पूर्वजों के भी पूर्वज हैं-

सनत्कुमारं च विभुं पूर्वेषामपि पूर्वजम् (मत्स्य पुराण, ४/२७)

एक मूल ऋषि के २ विभाजन हुए। भृगु आकर्षण द्वारा पिण्डों को एकत्र तथा घना करता है। इससे संगठित पिण्ड बने, जिनको पृथ्वी (सीमाबद्ध, पृथ्वी ग्रह भी) या भू (भू सत्तायाम्, होना) कहते हैं। अधिक घने पिण्डों से पदार्थ या तेज निकलता है, जैसे आग से अंगारा। अतः इसे अङ्गिरा कहते हैं।

मूल एक ऋषि का ३ में विभाजन नहीं हुआ, अतः यह अत्रि (अ + त्रि, ३ नहीं, या अत्र = यहां- न लेना, न देना) है। अतः पूषा तथा इसके ३ विभाजन-अत्रि, भृगु, अङ्गिरा से सृष्टि का आरम्भ हुआ।

अर्चिर्षि भृगुः सम्बभूव, अङ्गारेष्वङ्गिराः सम्बभूव। अथ यदङ्गारा अवशान्ताः पुनरुद्दीप्यन्त, तद् बृहस्पतिरभवत्। (ऐतरेय ब्राह्मण, ३/३४)

= अर्चि (अग्नि, घना पिण्ड) से भृगु हुआ, अङ्गारा (आग की लपट) से अङ्गिरा। अङ्गारा शान्त हो कर पुनः चमकने लगे, वह बृहस्पति हुआ।

ये ४ महर्षि पूर्व में थे- १+ ३ = पूषा + अत्रि, भृगु, अङ्गिरा।

इसके बाद ४ महर्षियों के युग्म से १ + ६ = ७ महर्षि हुए।

साकञ्जानां सप्तथमाहुरेकजं षडिद्यमा ऋषयो देवजा इति।

तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः॥ (ऋक्, १/१६४/१५)

= एक से ७ ऋषि हुए, जिनमें ६ यमल हैं। ये इष्ट स्थान पर रह कर अनेक प्रकार के निर्माण करते हैं।

इमामेव गोतम-भरद्वाजौ। अयमेव गोतमः, अयं भारद्वाजः । इमामेव विश्वामित्र-जमदग्नी। अयमेव विश्वामित्रः, अयं जमदग्निः। इमामेव वसिष्ठ-कश्यपौ। अयमेव वसिष्ठः, अयं कश्यपः। वागेवात्रिः। वाचा ह्यन्नमद्यते। अत्तिर्ह वै नाम एतत्यद् अत्रिः इति। सर्वस्य अत्ता भवति, सर्वं अस्य अन्नं भवति, य एवं वेद। (शतपथ ब्राह्मण १४/५/२/६, बृहदारण्यक उपनिषद् २/२/४) 

ये युग्म हैं-गोतम-भरद्वाज, विश्वामित्र-जमदग्नि, वसिष्ठ-कश्यप। जो ३ में विभाजित नहीं हुआ, वह अत्रि है, जो वाक् (शब्द या उसका स्थान आकाश) है। आकाश ही सब ग्रहण करता (अदति = खाता है), अतः यह अत्रि है।

युग्मों का विभाजन-

प्राणो वै वसिष्ठ ऋषिः, यद्वै नु श्रेष्ठस्तेन वसिष्ठः। अथो यद्वस्तृतमो वसति, तेनो एव वसिष्ठः। मनो वै भरद्वाज ऋषिः। अन्नं वाजः। यो वै मनो बिभर्ति, सो ऽन्नं वाजं भरति। तस्मान्मनो भरद्वाज ऋषिः। (शतपथ ब्राह्मण८/१/१/६)

चक्षुर्वै जमदग्नि ऋषिः। यदनेन जगत् पश्यति, अथो मनुते तस्माच्चक्षुर्जमदग्नि ऋषिः। (शतपथ ब्राह्मण, ८/१/२/३)

श्रोत्रं वै विश्वामित्र ऋषिः। यदेनेन सर्वतः शृणोति। अथो यदस्मै सर्वतो मित्रं भवति। तस्माच्छ्रोत्रं विश्वामित्र ऋषिः। (शतपथ ब्राह्मण, ८/१/२/६)

वाग्वै विश्वकर्मा ऋषिः। वाचा हीदं सर्वं कृतम्। तस्माद्वाग्विश्वकर्म ऋषिः। (शतपथ ब्राह्मण, ८/१/२/९)

प्राण वसिष्ठ ऋषि है; क्योंकि यह श्रेष्ठ है या वस्तृतम (श्रेष्ठ स्थान में वास) है।

मन भरद्वाज ऋषि है। अन्न को वाज कहते हैं। मन सभी अङ्गों को नियन्त्रित करता है इस प्रकार अन्न देता है।

चक्षु जमदग्नि है क्योंकि इससे विश्व को देखते या जानते हैं।

कर्ण विश्वामित्र ऋषि है जिससे हम विश्व को सुनते हैं और उसका मित्र बनते हैं।

वाक् विश्वकर्मा ऋषि है, क्योंकि उसी से सृष्टि होती है (वाक् आकाश में है जिससे सृष्टि का आरम्भ हुआ)। 

ऋषि युग्मों में वाक् को अत्रि कहा गया है क्योंकि इसका त्रि विभाजन नहीं होता।

वसिष्ठ का पूरक कश्यप है जो पश्यक (देखने वाला) है।

सूर्यतापिनी उपनिषद् (१/२) कश्यपः पश्यको भवति।



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