श्रीभैरव तत्त्व

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  • तंत्र शास्त्र
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  • 31 July 2026
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सद्गुरु श्री अखिलेश्वरानंद नाथ भैरव 

( साम्राज्याभिषिक्त काली कुल )

सबसे पहले एक बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि तंत्रमार्ग में शिव, शक्ति, भैरव आदि नाम किसी व्यक्ति या देवता के नहीं,  बल्कि तत्त्वों (Cosmic Principles) के प्रतीक हैं। इन तत्त्वों की प्राप्ति की जो विधियाँ हैं, वही तंत्र कहलाती हैं।

तंत्र कोई धर्म नहीं है, बल्कि शुद्ध विज्ञान है। इसमें किसी प्रकार की अंधश्रद्धा या केवल विश्वास की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि स्वयं प्रयोग करके सत्य का अनुभव करने का साहस चाहिए। इसलिए आपका धर्म कोई भी हो, तंत्रमार्ग सभी के लिए समान रूप से खुला है।

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इसे एक उदाहरण से समझिए—

सापेक्षता (Relativity) का सिद्धांत यदि अल्बर्ट आइंस्टीन ने प्रस्तुत किया, तो इससे वह सिद्धांत केवल यहूदियों का नहीं हो जाता। उसी प्रकार यदि किसी धर्म ने तंत्रमार्ग को अपनाया हो, तो इससे तंत्र स्वयं कोई धर्म नहीं बन जाता।

अब हम मुख्य विषय की ओर बढ़ते हैं।

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तंत्रमार्ग में अत्यंत अनुशासन और पूर्ण शुद्धता अनिवार्य होती है। परिणाम (Results) प्राप्त करने की संपूर्ण प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। मानो तंत्र एक सैन्य संगठन (Military Organization) की भाँति कार्य करता हो।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं—

https://mysticpower.in/bhavishya-darshan.php

मान लीजिए कि आप किसी कंपनी में एक विभाग के प्रमुख हैं। आपको किसी दूसरे विभाग से कोई कार्य करवाना है। आपको यह भी पता है कि वह कार्य कौन-सा कर्मचारी करेगा।

यदि आप सीधे उस कर्मचारी को आदेश देंगे, तो क्या वह आपकी बात मानेगा? संभवतः नहीं।

लेकिन यदि आप पहले उस विभाग के प्रमुख से बात करेंगे और वही प्रमुख उस कर्मचारी को कार्य सौंपेंगे, तभी आपका कार्य संपन्न होगा।

तंत्र में भी ठीक यही व्यवस्था है। पहले संबंधित अधिकारी की अनुमति और उसके बाद ही कार्य।

तंत्रमार्ग में ऐसा पर्यवेक्षक (Supervisor) भैरव कहलाता है।

गणेश तत्त्व के पश्चात सबसे पहले भैरव तत्त्व की अनुमति प्राप्त करनी होती है। उसके बाद ही साधक तांत्रिक साधना एवं उपासना का अधिकारी बनता है।

 

भैरव का तात्त्विक स्वरूप

यह सम्पूर्ण चराचर विश्व जिस मूल स्रोत से उत्पन्न हुआ है, वह केवल एकमेव परम तत्त्व है। उसका पूर्ण वर्णन संभव नहीं है। समझने की सुविधा के लिए उसे ब्रह्म कहा जाता है।

वास्तव में वह निर्गुण और निराकार है। (यहाँ हम दार्शनिक दृष्टि से विषय को समझ रहे हैं।)

ऐसा तत्त्व मन और वाणी दोनों की सीमा से परे होता है।

अब प्रश्न उठता है कि भैरव तत्त्व वास्तव में क्या है?

 

वाणी के चार स्तर

शास्त्रों में वाणी के चार स्तर बताए गए हैं—

  • वैखरी
  • मध्यमा
  • पश्यन्ती
  • परा

हम जो सामान्य बोलते हैं, वह वैखरी वाणी है।

परम सत्य का ज्ञान परा वाणी में प्रकट होता है।

किन्तु यदि वह केवल परा अवस्था में ही रहे, तो सामान्य मनुष्य उसे कैसे समझ पाएगा?

इसलिए जब वही परा वाणी लोककल्याण के लिए नीचे उतरती है, तब वही दिव्य ज्ञान वैखरी वाणी के माध्यम से व्यक्त होकर इस संसार में महान ग्रंथों और दिव्य रचनाओं के रूप में प्रकट होता है।

इसका अत्यंत सुंदर उदाहरण है—

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा परा से वैखरी में अवतरित की गई भावार्थ दीपिका, जिसे आज हम ज्ञानेश्वरी के नाम से जानते हैं।

 

अब आगे समझिए—

जो परा वाणी वैखरी के माध्यम से दिव्य ज्ञान को प्रकट करती है, उसी को वेदों में "रुद्र" कहा गया है और तंत्रमार्ग में उसी का वर्णन "भैरव" नाम से किया गया है।

श्रुतियाँ इस स्वरूप का संकेत केवल तीन शब्दों में करती हैं—

सत् – चित् – आनंद।

यह केवल एक संकेत है।

इसी सत्य का विस्तृत विवेचन तथा उसकी प्राप्ति की संपूर्ण साधना-पद्धति तंत्र विज्ञान में वर्णित है।

यहाँ पुनः ध्यान रखने योग्य बात यह है कि ये सभी संकेत उसी निष्कल, निराकार ब्रह्म के हैं, जो सगुण रूप में अनुभूत होता है।

उस ब्रह्म का जो प्रकाश और चेतना है, उसी को पूर्णहन्ता अथवा चिति जैसे नामों से अभिव्यक्त किया गया है।

सबसे पहली साधना जो करनी चाहिए, वह है अपने भीतर भैरव तत्त्व अर्थात उसकी दिव्य ऊर्जा की स्थापना करना।

अब प्रश्न यह है कि इस साधना में क्या करना होता है?

उत्तर है— कुछ विशेष करना नहीं होता, बल्कि "न करना" ही करना होता है। 😊

अर्थात् अपनी ऊर्जा का अनावश्यक व्यय रोककर उसका संचय करना ही अपने भीतर भैरव तत्त्व की स्थापना करना है। यही उसकी शक्ति को अपने अस्तित्व में समाहित करने का मार्ग है।

अब यहाँ फिर थोड़ा तात्त्विक विवेचन आवश्यक है।

 

पाँच इन्द्रियाँ और भैरव तत्त्व

हम इस सृष्टि का अनुभव मुख्यतः पाँच प्रकार से करते हैं—

  • श्रवण (सुनना)
  • दृष्टि (देखना)
  • स्पर्श
  • रसना (स्वाद)
  • घ्राण (सुगंध या गंध का अनुभव)

संस्कृत में कहा गया है—

"श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।"

इन सभी इन्द्रियों का अधिपति भैरव तत्त्व माना गया है।

इन पाँचों इन्द्रियों पर सजगता और संयम स्थापित करना ही भैरव तत्त्व की ओर अग्रसर होना है।

 

साधना कैसे करें?

इसके लिए कोई कठिन क्रिया करने की आवश्यकता नहीं है।

केवल समय-समय पर अपनी इन्द्रियों और अपने व्यवहार के प्रति सजग रहना है।

आइए इसे एक सरल उदाहरण से समझते हैं।

हम प्रतिदिन कितना बोलते हैं?

बहुत अधिक।

क्या बोलने में ऊर्जा का व्यय होता है?

निस्संदेह होता है।

तो इस ऊर्जा को बचाना ही साधना का पहला चरण है।

कैसे?

जब भी कुछ बोलने जाएँ, एक क्षण रुककर स्वयं से पूछें—

"यदि मैं अभी यह बात न कहूँ, तो क्या कोई हानि होगी?"

आप स्वयं आश्चर्यचकित रह जाएँगे कि लगभग 90% स्थितियों में उत्तर होगा— "नहीं।"

इसका अर्थ क्या हुआ?

कि हमारी लगभग 90% ऊर्जा अनावश्यक बोलने में व्यर्थ चली जाती है।

ऐसी स्थिति में परा वाणी कैसे प्रकट होगी?

अतः इस ऊर्जा का संरक्षण और संचय करना ही साधना की पहली सीढ़ी है।

 

केवल वाणी ही नहीं

इसी प्रकार हमें यह भी देखना चाहिए—

  • क्या सुनना आवश्यक है?
  • क्या देखना आवश्यक है?
  • किन स्पर्शों और अनुभवों को ग्रहण करना उचित है?
  • किन विषयों से अपनी इन्द्रियों को बचाना चाहिए?

जब हम विवेकपूर्वक अपनी पाँचों इन्द्रियों का उपयोग करते हैं, तब पंचमहाभूतों की शक्ति हमारे भीतर संतुलित होने लगती है।

यही अभ्यास साधक को शीघ्र ही भैरव तत्त्व के निकट ले जाता है।

 

महापुरुषों का संकेत

स्वामी विवेकानंद कहा करते थे—

"यदि भगवद्गीता का वास्तविक अनुभव करना चाहते हो, तो पहले मैदान में जाकर फुटबॉल खेलो।"

अर्थात केवल ग्रंथ पढ़ना पर्याप्त नहीं, जीवन में शक्ति, जागरूकता और कर्म का अनुभव भी आवश्यक है।

इसी प्रकार साईं बाबा कहा करते थे—

"खिलती हुई एक छोटी-सी कली भी तुम्हें गीता का अर्थ वैसे समझा सकती है, जैसा केवल रटने से कभी नहीं समझा जा सकता।"

अर्थात् आध्यात्मिक सत्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त होता है।

 

मैं जो स्पष्ट करना चाहता था, वह कितनी सीमा तक स्पष्ट हो पाया है, यह तो आप ही बता सकते हैं।

नमो आदेश! आदेश!! आदेश!!! 

 



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