सदगुरु श्री अखिलेश्वरानंद भैरव -साम्राज्यभिषिक्त ( काली कुल )
“हिमालयो नाम नगाधिराजः” —
दूर होते हुए भी हम सभी को अद्भुत आकर्षण देने वाला *हिमालय* आदियोगी (भगवान शिव) का निवास स्थान माना जाता है। उसकी ओर एक रहस्यमय खिंचाव हमेशा महसूस होता रहता है।
उसकी भव्यता और दिव्यता के बारे में बहुत सारा साहित्य उपलब्ध है।
संस्कृत में *“हिम” का अर्थ बर्फ* और *“आलय” का अर्थ घर* होता है।
लेकिन हिमालय केवल बर्फ का विशाल घर ही नहीं है, बल्कि वह *आध्यात्म और विज्ञान की खदान* है।
वहीं से विश्व के लिए अनेक रहस्य प्रकट हुए हैं।
ज्ञान और विज्ञान का उद्गम भी वहीं से हुआ माना जाता है।
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परंतु सामान्य मनुष्य चाहे कितना भी आकर्षण महसूस करे, फिर भी कई कारणों से वहाँ नहीं जा सकता।
तो क्या उसके लिए कोई मार्ग है?
हाँ, निश्चित रूप से है।
वह मार्ग है — तुकाराम महाराज की गाथा।
हिमालय में उत्पन्न हुए जो गूढ़ ज्ञान और रहस्य हैं, उन्हें तुकाराम महाराज ने *सरल मराठी भाषा में अपने अभंगों के माध्यम से सामान्य लोगों के लिए व्यक्त किया है।*
इसी कारण हम वारकरी लोग सिर पर *“तुकाराम गाथा” और “ज्ञानेश्वरी”* रखकर
*“ज्ञानबा-तुकाराम”* के नाम का गान करते हुए देह-भान भूलकर आनंद से नृत्य करते हैं।
भारतीय दर्शन और तुकाराम
सांख्य, वेदांत, योग, वैशेषिक, मीमांसा, न्याय, बुद्धि-विचार —
ये सभी हमारे दर्शनशास्त्र हैं, जो जीवन और तत्त्वज्ञान के मूल प्रश्नों के उत्तर देते हैं।
यदि इन दर्शनों के विषयों के अनुसार तुकाराम के अभंगों को एकत्र करके देखा जाए,
तो विभिन्न विषयों का अद्भुत ज्ञान हमारे सामने प्रकट हो जाता है।
आज का आधुनिक भौतिक विज्ञान भी उनके सामने मानो *एक बालक जैसा प्रतीत होता है।*
अब बताइए —
“तुकाराम ने संसार को क्या दिया?” यह पूछने के बजाय
“उन्होंने क्या नहीं दिया?” यह पूछना अधिक उचित नहीं होगा?
मित्रों, आप ही में से एक सामान्य वारकरी — यानी मैं —
ज्ञानेश्वरी और तुकाराम गाथा का ऐसा अध्ययन और शोध करने का प्रयास कर रहा हूँ।
आधुनिक बुद्धिवादियों का प्रश्न
कुछ आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त बुद्धिजीवी कहते हैं कि
ये सारे दर्शन तो आध्यात्मिक हैं —
इनका व्यावहारिक जीवन में क्या उपयोग है?
तो उनसे पूछना चाहिए —
वैज्ञानिकों ने वर्षों तक प्रयास करके,
भूमिगत सुरंगें बनाकर,
विभिन्न वैज्ञानिक उपकरण विकसित करके,
अरबों रुपये खर्च करके हाल ही में *“दैवी कण” (God Particle)* की खोज की और अत्यंत आनंदित हुए।
क्या वे पागल थे?
इससे पहले भी खगोलशास्त्र, रसायनशास्त्र, मनोविज्ञान आदि अनेक विज्ञान विकसित हुए हैं।
लेकिन इन सबका मूल स्रोत कहाँ है?
वह तो हमारे आध्यात्मिक ज्ञान से ही निकले हुए प्रवाह हैं।
विभिन्न युगों में ऋषि-मुनियों ने उन्हें विकसित और पूर्ण बनाया।
और इस पूरे ज्ञान को साधारण लोगों के लिए *सरल अभंगों में किसने बताया?*
हमारे तुकोबा (तुकाराम) ने। और ज्ञानदेव ने ज्ञानेश्वरी की ओवियों के माध्यम से।
इसलिए यह पूछना कि इन दोनों संतों ने संसार को क्या दिया —
वास्तव में बहुत ही बालसुलभ प्रश्न है।
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