श्रीमती कृतिका खत्री, सनातन संस्था, दिल्ली
वातावरण की शुद्धि के लिए प्रतिदिन अग्निहोत्र करने की संकल्पना भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से चली आ रही है। अग्निहोत्र की उपासना से वातावरण शुद्ध होकर एक प्रकार का संरक्षण कवच निर्मित होता है। यहाँ तक कि विकिरण (रेडिएशन) से संरक्षण करने की क्षमता भी अग्निहोत्र में बताई गई है। इसलिए ऋषि-मुनियों ने यज्ञ के प्रथम अवतार स्वरूप अग्निहोत्र करने का उपाय बताया है।
यह करने में अत्यंत सरल, कम समय में पूर्ण होने वाला तथा सूक्ष्म स्तर पर प्रभाव उत्पन्न करने वाला अत्यंत प्रभावी उपाय है। प्रतिदिन अग्निहोत्र करने से वातावरण में हानिकारक जीवाणुओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी आती है, यह बात अब कुछ वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा भी बताई गई है।
अतः प्रतिदिन अग्निहोत्र करना केवल आपातकाल की दृष्टि से ही नहीं, अपितु सामान्य जीवन में भी अत्यंत लाभकारी है। ‘विश्व अग्निहोत्र दिवस’ के अवसर पर सनातन संस्था द्वारा संकलित इस लेख के माध्यम से पाठकों को अग्निहोत्र का परिचय तथा उसके महत्व और लाभों की जानकारी प्राप्त होगी।
अग्निहोत्र क्या है? - अग्निहोत्र अर्थात अग्नि में आहुति अर्पित करके की जाने वाली ईश्वरीय उपासना। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय की जाने वाली सूर्योपासना को ही अग्निहोत्र कहा जाता है।
अग्निहोत्र को कामधेनु के समान फलदायी माना गया है। इसमें समय के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का बंधन नहीं है। अग्निहोत्र के लिए पिरामिड आकार के पात्र में गाय के गोबर से बने उपले, दो चुटकी अखंड चावल और देशी गाय का घी उपयोग किया जाता है। अग्नि प्रज्वलित करने के बाद दो मंत्रों का उच्चारण करके आहुति दी जाती है।
आज मनुष्य का जीवन अत्यंत व्यस्त और तनावपूर्ण हो गया है। ऐसी परिस्थिति में मानवता के कल्याण के लिए ऋषि-मुनियों ने अग्निहोत्र का मार्ग प्रदान किया है। यदि हम इसे श्रद्धा के साथ अपनाते हैं तो निश्चित ही लाभ प्राप्त होगा।
अग्निहोत्र का महत्व - त्रिकालदर्शी संतों ने बताया है कि आने वाला समय अत्यंत संकटपूर्ण हो सकता है। वर्तमान परिस्थिति में तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना की भी चर्चा की जाती है। आज अनेक देशों के पास परमाणु हथियार हैं। यदि इनका उपयोग हुआ तो उससे उत्पन्न विकिरण से बचाव के उपाय आवश्यक होंगे।
अग्निहोत्र को ऐसा आध्यात्मिक उपाय माना गया है जो विकिरण से भी संरक्षण प्रदान करने की क्षमता रखता है। अग्नि के माध्यम से कोई भी व्यक्ति इसे कर सकता है। यही इसकी विशेष महत्ता है।
अग्निहोत्र के लाभ
चैतन्यपूर्ण और औषधीय वातावरण का निर्माण : अग्निहोत्र से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा और औषधीय गुणों का संचार होता है।
अधिक पौष्टिक और स्वादिष्ट अन्न का उत्पादन : अग्निहोत्र के प्रभाव से पौधों को वातावरण से पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। अग्निहोत्र की भस्म भी खेती और पौधों की वृद्धि के लिए लाभकारी होती है। परिणामस्वरूप अधिक पौष्टिक और स्वादिष्ट अन्न, फल, फूल और सब्जियाँ उत्पन्न होती हैं। – होमा थेरेपी, फाइवफोल्ड पाथ मिशन, धुले।
बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव : अग्निहोत्र के वातावरण का बच्चों के मन पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। चिड़चिड़े और जिद्दी बच्चे शांत और समझदार बनते हैं। पढ़ाई में उनकी एकाग्रता बढ़ती है। मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को भी उपचार में बेहतर प्रतिक्रिया मिलती है।
मानसिक शक्ति और इच्छाशक्ति का विकास : नियमित अग्निहोत्र करने वालों में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, मानसिक शांति, आत्मविश्वास और कार्यक्षमता बढ़ती देखी गई है। नशे की आदत वाले लोग भी अग्निहोत्र के वातावरण में धीरे-धीरे उससे मुक्त हो सकते हैं। – डॉ. श्रीकांत श्रीगजानन महाराज राजीमवाले।
तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव : अग्निहोत्र से उत्पन्न धुएँ का मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव पड़ता है। – होमा थेरेपी, फाइवफोल्ड पाथ मिशन।
रोगाणुओं की वृद्धि में कमी : अग्निहोत्र के औषधीय वातावरण में रोगकारक जीवाणुओं की वृद्धि रुकने की बात कुछ शोधकर्ताओं ने बताई है।
सुरक्षात्मक ऊर्जा कवच का निर्माण : अग्निहोत्र करने से आसपास एक प्रकार का सुरक्षा कवच बनने का अनुभव होता है।
प्राणशक्ति की शुद्धि और मानसिक प्रसन्नता : अग्निहोत्र से प्राणशक्ति शुद्ध होती है, जिससे मन तुरंत प्रसन्न और शांत हो जाता है। इस वातावरण में ध्यान, साधना, अध्ययन और चिंतन करना सहज हो जाता है। – डॉ. श्रीकांत श्रीगजानन महाराज राजीमवाले।
अग्निहोत्र को दैनिक साधना के रूप में करना
अग्निहोत्र एक नित्य उपासना है। यह एक व्रत के समान है। ईश्वर ने हमें जीवन दिया है और प्रतिदिन हमारे लिए आवश्यक सब कुछ प्रदान करता है। इसलिए उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए प्रतिदिन अग्निहोत्र करना हमारा कर्तव्य है।
अग्निहोत्र की विधि :
अग्नि प्रज्वलित करना - हवन पात्र के नीचे गोबर के उपले का छोटा टुकड़ा रखें। उसके ऊपर घी लगे उपलों के टुकड़े इस प्रकार रखें कि बीच में हवा के लिए स्थान रहे। एक उपले के टुकड़े को घी लगाकर जलाएं और पात्र में रखें। धीरे-धीरे सभी उपले जलने लगेंगे। अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए हाथ से चलने वाले पंखे का उपयोग किया जा सकता है।
अग्नि जलाने के लिए केरोसिन जैसे ज्वलनशील पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहिए। अग्नि स्वच्छ और बिना धुएँ की होनी चाहिए।
अग्निहोत्र मंत्र :
सूर्योदय के समय :
सूर्याय स्वाहा । सूर्याय इदम् न मम ।
प्रजापतये स्वाहा । प्रजापतये इदम् न मम ॥
सूर्यास्त के समय :
अग्नये स्वाहा । अग्नये इदम् न मम ।
प्रजापतये स्वाहा । प्रजापतये इदम् न मम ॥
मंत्रों का उच्चारण स्पष्ट और मधुर स्वर में करना चाहिए। “सूर्य”, “अग्नि” और “प्रजापति” शब्द ईश्वर के प्रतीक हैं। इन मंत्रों का भाव यह है कि हम परमात्मा को आहुति अर्पित कर रहे हैं और यह सब हमारा नहीं, अपितु ईश्वर का है।
आहुति देते समय मध्यमा और अनामिका अंगुली को अंगूठे से मिलाकर मुद्रा बनानी चाहिए और अंगूठा ऊपर की ओर रखना चाहिए। अग्निहोत्र केवल सूर्योदय और सूर्यास्त के समय ही किया जाना चाहिए।
अग्निहोत्र के बाद की क्रियाएँ
ध्यान : अग्निहोत्र के बाद कुछ समय ध्यान के लिए अवश्य बैठें। कम से कम तब तक बैठें जब तक अग्नि शांत न हो जाए।
भस्म (विभूति) सुरक्षित रखना : अगले अग्निहोत्र से पहले पात्र की भस्म निकालकर कांच या मिट्टी के पात्र में रखें। इसका उपयोग पौधों के लिए खाद तथा औषधि बनाने में किया जा सकता है। – होमा थेरेपी, फाइवफोल्ड पाथ मिशन।
निवेदन - अग्निहोत्र हिंदू धर्म द्वारा मानवता को दी गई एक अमूल्य देन है। इसके नियमित अभ्यास से वातावरण की शुद्धि होती है तथा इसे करने वाले व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि भी होती है। इससे घर, समाज और पर्यावरण की रक्षा होती है।
अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस सहित लगभग 70 देशों में भी अग्निहोत्र को अपनाया गया है और इसके परिणाम वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित किए गए हैं।
अतः सभी नागरिकों से आग्रह है कि वे सूर्योदय और सूर्यास्त के समय श्रद्धा से अग्निहोत्र करें और स्वस्थ, सुरक्षित तथा संतुलित जीवन का लाभ प्राप्त करें।
संदर्भ: सनातन संस्था का ग्रंथ – अग्निहोत्र
Comments are not available.